<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177</id><updated>2011-09-15T21:29:15.921-07:00</updated><title type='text'>अश्विनी</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>64</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-109026043756377786</id><published>2008-10-24T06:07:00.000-07:00</published><updated>2008-10-24T06:38:46.476-07:00</updated><title type='text'>छत्तीसगढ़ की पाँच दिवसीय दीपावली</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_a3axkWLu5LM/SQHPVEo23iI/AAAAAAAAAOQ/NvEbF_XKMfM/s1600-h/Shubh+Deewali.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 132px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_a3axkWLu5LM/SQHPVEo23iI/AAAAAAAAAOQ/NvEbF_XKMfM/s200/Shubh+Deewali.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5260713800674762274" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;a style="font-size: 18px; font-family: Arial,Helvetica,Sans-Serif;" href="http://feeds.feedburner.com/%7Er/KesarwaniSamaj/%7E3/427762917/blog-post_7944.html" target="_blank"&gt;छत्तीसगढ़ की पाँच दिवसीय दीपावली&lt;/a&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी   केशरवानी&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ मै पाँच दिन तक चलने वाले इस त्यौहार का आरम्भ धनतेरस यानि धन्वन्तरी त्रयोदस से होता है । &lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;मान्यता&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; है की इस दिन भगवान् धन्वन्तरी अपने हाँथ में अमृत कलश लिए प्रकट हुए थे। समुद्र मंथन में जो चौदह रत्न निकले थे, भगवान् धन्वन्तरी उनमे से एक है। वे आरोग्य और समृद्धि के देव है । स्वास्थ्य और सफाई से इनका गहरा सम्बन्ध होता है। इसलिए इस दिन सभी अपने घरों की सफाई करते है और लक्ष्मी जी के आगमन की तयारी करतें है। इस दिन लोग यथाशक्ति सोना- चांदी और बर्तन इत्यादि खरीदते है।दूसरे दिन कृष्ण चतुर्दशी होता है। इस दिन को नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान् श्रीकृष्ण नरकासुर का वध करके, उनकी क़ैद से हजारों राजकुमारियों को मुक्ति दिलाकर उनके जीवन में उजाला किए थे। राजकुमारि&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;यों&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; ने इस दिन दीपों की श्रृंख्ला जलाकर, अपने जीवन में खुशियों को समाहित किया था।तीसरे दिन आता है दीपावली। दीपों का त्यौहार..... लक्ष्मी पूजन का त्यौहार। असत्य पर सत्य की, अन्धकार पर प्रकाश की, और अधर्म पर धर्म की विजय का त्यौहार है दीपावली। इस त्यौहार को मनाने के पीछे अनेक लोक मान्यताएं जुड़ी हुई है। भगवान् श्रीरामचंद्र जी के चौदह वर्ष बनवास काल की समाप्ति और अयोध्या आगमन पर उनके स्वागत में दीप जलाना, अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस का इस दिन जन्म हुआ था और इसी दिन उन्होंने जल समाधि ली थी। अहिंसा की प्रतिमूर्ति और जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने इसी दिन निर्वाण किया था। सिख धर्म के प्रवर्तक श्री गुरुनानक देव जी का जन्म इसी दिन हुआ था। इस सत्पुरुषों के उच्च आदर्शों और अमृतवाणी से हमे सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। इसी अमावास को भगवान् विष्णु जी ने धन की देवी लक्षी जी का वरण किया था। इसीलिए इस दिन सारा घर दीपों के प्रकाश से जगमगा उठता है। पटाखे और आतिशबाजी की गूँज उनके स्वागत में होती है। इस दिन धन की देवी माँ लक्ष्मी की पूजा अर्चना करके प्रसन्न किया जाता है, और घर को श्री संपन्न करने की उनसे प्रार्थना की जाती है। :-&lt;br /&gt;जय जय लक्षी ! हे रमे ! रम्य !हे देवी ! सदय हो, शुभ वर दो ! प्रमुदित हो, सदा निवास करो सुख संपत्ति से पूरित कर दो,हे जननी ! पधारो भारत मेंकटु कष्ट हरो, कल्याण करो भर जावे कोषागार शीघ्र दुर्भाग्य विवश जो है खाली घर घर &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_a3axkWLu5LM/SQHPVj48vOI/AAAAAAAAAOY/Plnu6Nr538o/s1600-h/aatishbaji.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 200px; height: 148px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_a3axkWLu5LM/SQHPVj48vOI/AAAAAAAAAOY/Plnu6Nr538o/s200/aatishbaji.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5260713809063754978" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;में&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; जगमग दीप जले आई है देखो दीपावली.... !&lt;br /&gt;चौथे दिन आती है गोवर्धन पूजा। यह दिन छत्तीसगढ़ में बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इसे छोटी दीपावली भी कहा जाता है। मुंगेली क्षेत्र में इस दिन को पान बीडा कहतें है और अपने घरों में मिलने आए लोगों का स्वागत पान बीडा देकर करतें है। इस दिन गोबर्धन पहाड़ बनाकर उसमे श्रीकृष्ण और गोप गोपियाँ बनाकर उनकी पूजा की जाती है।पाँचवे दिन आता है भाई दूज का पवित्र त्यौहार। यमराज के वरदान से बहन इस दिन अपने भाई का स्वागत करके मोक्ष की अधिकारी बनती है। पाँच दिन तक चलने वाले इस त्यौहार को लोग बड़े धूमधाम और आत्मीय ढंग से मनाते है।यह सच है की दीपावली के आगमन से खर्च में बढोत्तरी हो जाती है और पाँच दिन तक मनाये जाने वाले इस त्यौहार के कारण आपका पाँच माह का बजट फेल हो जाता है। उचित तो यही होगा की आप इसे अपने बजट के अनुसार ही मनाएं । हर वर्ष आने वाला दीपावली अपने चक्र के अनुसार इस वर्ष भी आया है और भविष्य में भी आयेगा पर इससे घबराएँ नहीं और सादगीपूर्ण और सौहार्द के वातावरण में मनाएं । दूरदर्शिता से काम ले, इतनी फिजूलखर्ची ना करें की आपका दिवाला ही निकल जाए और ना ही इतनी कंजूसी करें की दीपावली का आनंद ही न मिल पाए..।&lt;br /&gt;हे दीप मालिके ! फैला दो आलोक तिमिर सब मिट जाए&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी   केशरवानी, राघव - डागा कालोनी - चाम्पा, (छत्तीसगढ़)&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-109026043756377786?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/109026043756377786/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=109026043756377786' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/109026043756377786'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/109026043756377786'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/10/blog-post_24.html' title='छत्तीसगढ़ की पाँच दिवसीय दीपावली'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_a3axkWLu5LM/SQHPVEo23iI/AAAAAAAAAOQ/NvEbF_XKMfM/s72-c/Shubh+Deewali.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-52864819126245589</id><published>2008-10-08T07:40:00.000-07:00</published><updated>2008-10-08T07:54:13.405-07:00</updated><title type='text'>छत्तीसगढ़ में दशहरा की अद्भूत परंपराएं</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;छत्तीसगढ़ में दशहरा की अद्भूत परंपराएं&lt;/strong&gt;                  &lt;/p&gt;&lt;p&gt; प्रो. अश्विनी केशरवानी &lt;/p&gt;&lt;p&gt;दशहरा भारत का एक प्रमुख लोकप्रिय त्योहार है। इसे देश के कोने कोने में हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। वास्तव में यह त्योहार असत्य के उपर सत्य का और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। श्रीराम सत्य के और रावण असत्य के प्रतीक हैं। विजय प्राप्त करने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है और हमें शक्ति मां भवानी की पूजा-अर्चना से मिलती है। इसके लिए अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमीं तक मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं और दसमीं को दस सिर वाले रावण के उपर विजय प्राप्त करते हैं। कदाचित् इसी कारण दशहरा को ``विजयादशमी`` कहा जाता है। वास्तव में रावण अजेय योद्धा के साथ साथ प्रकांड विद्वान भी थे। उन्होंने अपने बाहुबल से देवताओं, किन्नरों, किरातों और ब्रह्मांड के समस्त राजाओं को जीतकर अपना दास बना लिया था। मगर वे अपनी इंद्रियों को नहीं जीत सके तभी तो वे काम, क्रोध, मद और लोभ के वशीभूत होकर कार्य करते थे। यही उन्हें असत्य के मार्ग में चलने को मजबूर करते थे। इसी के वशीभूत होकर उन्होंने माता सीता का हरण किया और श्रीराम के हाथों मारे गये। श्रीराम की विजय की खुशी में ही लोग इस दिन को ``दशहरा`` कहने लगे और प्रतिवर्ष रावण के प्रतीक का दहन कर दशहरा मनाने लगे। अधिकांश स्थानों में रावण दहन के पूर्व `गढ़ भेदन` करने और पुरस्कृत करने की परंपरा है। कुछ स्थानों में रावण की आदमकद सीमेंट की प्रतिमा बनाकर लोग उसकी पूजा करते हैं और मनौती मानते हैं।  आज हम गांव गांव और शहर में इस दिन रावण की आदमकद प्रतिमा बनाकर जलाकर दशहरा मनाते हैं। इस दिन रावण की प्रतिमा को जलाकर घर लौटने पर मां अपने पति, बेटे और नाती-पोतों तथा रिश्तेदारों की आरती उतारकर दही और चांवल का तिलक लगाती है और मिष्ठान खाने के लिए पैसे देती है। कई घरों में नारियल देकर पान-सुपारी खिलाने का रिवाज है। इस दिन अपने मित्रों, बड़े बुजुर्गों, छोटे भाई-बहनों, माताओं आदि सबको ``सोनपत्ति`` देकर यथास्थिति आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। लोग अपने मित्रों से गले मिलकर रावण मारने की बधाई देते हैं। कहीं कहीं दशहरा के पहले `रामलीला` का मंचन होता है और रामराज्य की कल्पना की जाती है। छत्तीसगढ़ में दशहरा मनाने की अलग अलग परंपरा है आइये एक नजर डालें :- संबलपुर के राजा ने हरि और गुजर को लकड़ी की तलवार से भैंस की बलि एक ही वार से दिये जाने पर उनके शौर्य से प्रसन्न होकर सक्ती की जमींदारी प्रदान की थी। दशहरे के दिन आज भी सक्ती पैलेश में लकड़ी के तलवार की पूजा होती है। सारंगढ़ में शिवरीनारायण रोड में नगर से 4 कि।मी. दूरी पर खेलभाठा में दशहरा के दिन गढ़ भेदन किया जाता है। यहां चिकनी मिट्ठी का प्रतीकात्मक गढ़ (मिट्ठी का ऊंचा टीला) बनाया जाता है और उसके चारों ओर पानी भरा होता है। गढ़ के सामने राजा, उसके सामंत और अतिथियों के बैठने के लिए स्टेज बनाया जाता था, जिसके अवशेष यहां आज भी मौजूद है। विभिन्न ग्रामों से दशहरा मनाने आये ग्रामीण जन इस गढ़ भेदन में प्रतियोगी होते थे। वे इस मिट्ठी के गढ़ में चढ़ने का प्रयास करते और फिसल कर पानी में गिर जाते हैं। पानी में भीगकर पुन: गढ़ में चढ़ने के प्रयास में गढ़ में फिसलन हो जाता था। बहुत प्रयत्न के बाद ही कोई गढ़ के शिखर में पहुंच पाता था और विजय स्वरूप गढ़ की ध्वज को लाकर राजा को सौंपता था। करतल ध्वनि के बीच राजा उस विजयी प्रतियोगी को तिलक लगाकर नारियल और धोती देकर सम्मानित करते थे। फिर राजा की सवारी राजमहल में आकर दरबारेआम में बदल जाती थी जहां दशहरा मिलन होता था। ग्रामीणजन अपने राजा को इतने करीब से देखकर और उन्हें सोनपत्ती देकर, उनके चरण वंदन कर आल्हादित हो उठते थे। सहयोगी सामंत, जमींदार और गौटिया नजराना पेश कर अपने को धन्य मानते थे। अंत में मां समलेश्वरी देवी की पूजा अर्चना करके खुशी खुशी घर को लौटते थे। चंद्रपुर में जमींदार परिवार के द्वारा भैंस (पड़वा) की नवमीं को बलि देकर दशहरा मनाया जाता है। अंबिकापुर में दशहरा के दिन राजा की सवारी देवी दर्शन कर नगर भ्रमण करती हुई राजमहल परिसर में पहुंचकर ``मिलन समारोह`` में परिवर्तित हो जाता था। उस समय राज परिवार के सभी सदस्य, अन्य सामंत, जमींदार, ओहदेदार विराजमान होते थे। ग्रामीणजन सोनपत्ती देकर उन्हें बधाई देते थे। बस्तर का दशहरा अन्य स्थानों से भिन्न होता है क्योंकि यहां दशहरा में दशानन रावण का वध नहीं बल्कि बस्तर की अधिष्ठात्री दंतेश्वरी माई की विशाल शोभायात्रा निकलती है। इसीप्रकार शिवरीनारायण में दशहरा को विजियादशमी के रूप में मनाया जाता है। मठ के महंत शाम को बाजे-गाजे के साथ जनकपुर जाकर सोनपत्ती की पूजा करके वापस लौटते हैं और गादी चौरा पूजा करते हैं। महंत के द्वारा पूजा-अर्चना की जाती है तत्पश्चात् वे गादी में विराजमान होते हैं। उपस्थित जन समुदाय महंत जी को भेंट देकर सम्मानित करते हैं। वास्तव में यह एक तांत्रिक परंपरा है। प्राचीन काल में यहीं पर तांत्रिकों से स्वामी दयाराम दास ने शास्त्रार्थ करके पराजिक किया और इस क्षेत्र को छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। तब से यहां प्रतिवर्ष गादी चौरा पूजा उनके प्रभाव को शांत करने के लिए किया जाता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;राघव, डागा कालोनी, चांपा (छ.ग.) &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-52864819126245589?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/52864819126245589/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=52864819126245589' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/52864819126245589'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/52864819126245589'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/10/blog-post_08.html' title='छत्तीसगढ़ में दशहरा की अद्भूत परंपराएं'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-7175122347926281671</id><published>2008-10-07T04:45:00.000-07:00</published><updated>2008-10-07T05:07:54.374-07:00</updated><title type='text'>देवी उपासना का महापर्व नवरात्र</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_a3axkWLu5LM/SOtQ05my1BI/AAAAAAAAALI/t3q2KP4X_T0/s1600-h/ma+danteshwari.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5254382260004770834" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_a3axkWLu5LM/SOtQ05my1BI/AAAAAAAAALI/t3q2KP4X_T0/s200/ma+danteshwari.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;देवी उपासना का महापर्व नवरात्र&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;नवरात्र- नौ दिनों तक देवी उपासना का महापर्व है। गांव और शहरों में जगह जगह शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा की आकर्षक प्रतिमा भव्य पंडालों में स्थापित कर उसकी पूजा-अर्चना की जाती है। ग्राम देवी, देवी मंदिरों और ठाकुरदिया में जवारा बोई जाती है, मनोकामना ज्योति प्रज्वलित की जाती है .. हजारों लीटर तेल और घी इसमें खप जाता है। लोगों का विश्वास है कि मनोकामना ज्योति जलाने से उनकी कामना पूरी होती है और उन्हें मानसिक शांति मिलती है। इस अवसर पर देवी मंदिरों तक आने-आने के लिए विशेष बस और ट्रेन चलायी जाती है। इसके बावजूद दर्शनार्थियों की अपार भीड़ सम्हाले नहीं सम्हलता, मेला जैसा दृश्य होता है। कहीं कहीं नवरात्र मेला लगता है। गांव में तो नौ दिनों तक धार्मिक उत्सव का माहौल होता है। शहरों में भी मनोरंजन के अनेक आयोजन होते हैं। कोलकाता और बिलासपुर का दुर्गा पूजा प्रसिद्ध है। दूर दूर से लोग यहां आते हैं। छत्तीसगढ़ में शिवोपासना के साथ शक्ति उपासना प्राचीन काल से प्रचलित है। कदाचित इसी कारण शिव भी शक्ति के बिना शव या निष्क्रिय बताये गये हैं। योनि पट्ट पर स्थापित शिवलिंग और अर्द्धनारीश्वर स्वरूप की कल्पना वास्तव में शिव-शक्ति या प्रकृति-पुरूष के समन्वय का परिचायक है। मनुष्य की शक्तियों को प्राप्त करने की इच्छा शक्ति ने शक्ति उपासना को व्यापक आयाम दिया है। मनुष्य के भीतर के अंधकार और अज्ञानता या पैशाचिक प्रवृत्तियों से स्वयं के निरंतर संघर्ष और उनके उपर विजय का संदेश छिपा है। परिणामस्वरूप दुर्गा, काली और महिषासुर मिर्दनी आदि देवियों की कल्पना की गयी जो भारतीय समाज के लिए अजस्र शक्ति की प्ररणास्रोत बनीं। शैव धर्म के प्रभाव में बृद्धि के बाद शक्ति की कल्पना को शिव की शक्ति उमा या पार्वती से जोड़ा गया और यह माना गया कि स्वयं उमा, पार्वती या अम्बा समय समय पर अलग अलग रूप ग्रहण करती हैं। शक्ति समुच्चय के विभिन्न रूपों में महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती प्रमुख बतायी गयी हैं। देवी माहात्म्य में महालक्ष्मी रूप में देवी को चतुर्भुजी या दशभुजी बताया गया है और उनके हाथों में त्रिशूल, खेटक, खड्ग, शक्ति, शंख, चक्र, धनुष तथा एक हाथ में वरद मुद्रा व्यक्त करने का उल्लेख मिलता है। देवी के वाहन के रूप में सिंह (दुर्गा, महिषमिर्दनी, उमा), गोधा (गौरी, पार्वती), पद्म (लक्ष्मी), हंस (सरस्वती), मयूर (कौमारी), प्रेत या शव (चामुण्डा) गर्दभ (शीतला) होते हैं। छत्तीसगढ़ में राजा-महाराजा और जमींदार देवी की प्रतिष्ठा अपने कुल देवी के रूप में कराया था जो आज शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है। उनकी कुल देवियां उन्हें न केवल शक्ति प्रदान करती थीं बल्कि उनका पथ प्रदर्शन भी करती थी। छत्तीसगढ़ के राजा-महाराजा और जमींदारों की निष्ठा या तो रत्नपुर या फिर संबलपुर के शक्तिशाली महाराजा के प्रति थी। कदाचित् यही कारण है कि यहां या तो रत्नपुर की महामाया देवी या फिर संबरपुर की समलेश्वरी देवी विराजित हैं। कुछ स्थानीय देवियां भी हैं जैसे- सरगुजा की सरगुजहीन देवी, दंतेवाड़ा की दंतेश्वरी देवी, कोसगढ़ की कोसगई देवी, अड़भार की अष्टभुजी देवी, चंद्रपुर की चंद्रहासिनी देवी प्रमुख है इसके अलावा डोंगरगढ़ की बमलेश्वरी देवी, कोरबा की सर्वमंगला, शिवरीनारायण की अन्नपूर्णा, खरौद की सौराइन दाई, केरा, पामगढ़ और दुर्ग की चण्डी देवी, बालोद की गंगा मैया, खल्लारी की खल्लाई देवी, खोखरा और मदनपुर की मनका दाई, मल्हार की डिडनेश्वरी देवी, जशपुर की काली माई, रायगढ़ की बुढ़ी माई, चैतुरगढ़ की महिषासुर मिर्दनी, रायपुर की बंजारी देवी शक्ति उपासना के केंद्र बने हुए हैं। अनेक स्थानों पर ``शक्ति चौरा`` भी बने हुए हैं। शाक्त परंपरा में आदि भवानी को मातृरूप में पूजने की सामाजिक मान्यता है। माताओं और कुंवारी कन्या का शाक्त धर्म में बहुत ऊंचा स्थान है। शादी-ब्याह जैसे मांगलिक अवसरों में देवी-देवताओं को आदरपूर्वक न्यौता देने के लिए देवालय यात्रा का विधान है। इसीप्रकार अकाल, महामारी, भुखमरी आदि को दैवीय प्रकोप मानकर उसकी शांति के लिए धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं। तत्कालीन साहित्य में ``बलि`` दिये जाने का उल्लेख मिलता है। आज भी कहीं कहीं पशु बलि दिया जाता है। बहरहाल, शक्ति संचय, असुर और नराधम प्रवृत्ति के लिए मां भवानी की उपासना और पूजा-अर्चना आवश्यक है। इससे सुख, शांति और समृिद्ध मिलती है। ऐसे ममतामयी मां भवानी को हमारा शत् शत् नमन..। या देवी सर्व भूतेषु, शक्तिरूपेण संस्थित:। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। आलेख, लेखन एवं प्रस्तुति,&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी केशरवानीराघव, डागा कालोनी, चांपा-495671 (छ.ग.)&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-7175122347926281671?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/7175122347926281671/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=7175122347926281671' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/7175122347926281671'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/7175122347926281671'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='देवी उपासना का महापर्व नवरात्र'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_a3axkWLu5LM/SOtQ05my1BI/AAAAAAAAALI/t3q2KP4X_T0/s72-c/ma+danteshwari.gif' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-8982798396034013054</id><published>2008-09-03T05:45:00.000-07:00</published><updated>2008-09-03T05:53:07.505-07:00</updated><title type='text'>छत्तीसगढ़ में गणेश उत्सव की प्राचीन परम्परा</title><content type='html'>&lt;strong&gt;छत्तीसगढ़ में गणेश उत्सव की प्राचीन &lt;/strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;परम्परा&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;प्रो.  अश्विनी केशरवानी &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;विघ्ननाशक  और&lt;/span&gt; गणेश या गणपति की सििद्ध विनायक के रूप में पूजन की परंपरा प्राचीन है किंतु पार्वती अथवा गौरीनंदन गणेश का पूजन बाद में प्रारंभ हुआ। ब्राह्मण धर्म के पांच प्रमुख सम्प्रदायों में गणेश जी के उपासकों का एक स्वतंत्र गणपत्य सम्प्रदाय भी था जिसका विकास पांचवीं से आठवीं शताब्दी के बीच हुआ। वर्तमान में सभी शुभाशुभ कार्यों के प्रारंभ में गणेश जी की पूजा की जाती है। लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजन चंचला लक्ष्मी पर बुिद्ध के देवता गणेश जी के नियंत्रण के प्रतीक स्वरूप की जाती है। दूसरी ओर समृिद्ध के देवता कुबेर के साथ उनके पूजन की परंपरा सििद्ध दायक देवता के रूप में मिलती है। गणेश जी के अनेक नाम निम्नानुसार हैं :- सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्ण, लंबोदर, विकट, विघ्न विनाशक, विनायक, धुम्रकेतु, गणेशाध्यक्ष, भालचन्द्र और गजानन। सििद्ध सदन एवं गजवदन विनायक के उद्भव का प्रसंग ब्रह्मवैवत्र्य पुराण के गणेश खंड में मिलता है। इसके अनुसार पार्वती जी ने पुत्र प्राप्ति का यज्ञ किया। उस यज्ञ में देवता और ऋषिगण आये और पार्वती जी की प्रार्थना को स्वीकार कर भगवान विष्णु ने व्रतादि का उपदेश दिया। जब पार्वती जी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तब त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ अनेक देवता उन्हें आशीर्वाद देने पहुंचे। सूर्य पुत्र शनिदेव भी वहां पहुंचे। लेकिन उनका मस्तक झुका हुवा था। क्योंकि एक बार ध्यानस्थ शनिदेव ने अपनी पत्नी के शाप का उल्लेख करते हुए अपना सिर उठाकर बालक को देखने में अपनी असमर्थता व्यक्त की थी। लेकिन पार्वती जी ने नि:शंक होकर गणेश जी को देखने की अनुमति दे दी। शनिदेव की दृष्टि बालक पर पड़ते ही बालक का सिर धड़ से अलग हो गया। ...और कटा हुआ सिर भगवान विष्णु में प्रविष्ट हो गया। तब पार्वती जी पुत्र शोक में विव्हल हो उठीं। भगवान विष्णु ने तब सुदर्शन चक्र से पुष्पभद्रा नदी के तट पर सोती हुई हथनी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़कर उसे जीवित कर दिया। तब से उन्हें ``गणेश´´ के रूप में जाना जाता है। गणेश चतुर्थी को पूरे देश में गणेश जी प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है। गणेश जी ही ऐसे देवता हैं जिनकी घरों में और सार्वजनिक रूप से प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है। चतुर्थी से लेकर अनंत चौदस तक उत्सव जैसा माहौल होता है। सभी स्थानों में आर्कस्ट्रा, नाच-गाना, गम्मत आदि अनेक कार्यक्रम कराये जाते हैं। छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं होता। पहले रायपुर में गणेश पूजन और सांस्कृतिक कार्यक्रम बृहद स्तर पर होता था। लोग यहां के आयोजन को महाराष्ट्र के गणेश पूजन से तुलना करतते थे और दूर दूर से यहां गणेश पूजन देखने आते थे। लेकिन अब छत्तीसगढ़ के प्राय: सभी स्थानों में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होने लगा है।  छत्तीसगढ़ प्राचीन काल से त्यौहारों और पर्वो में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए विख्यात् रहा है। यहां के राजे-रजवाड़ों में सार्वजनिक गणेश पूजन और आयोजन से उत्सव जैसा माहौल हुआ करता था। रायगढ़ का गणेश पूजन पूरे छत्तीसगढ़ में ही नहीं बल्कि पूरे देश में विख्यात् था। छत्तीसगढ़ के पूर्वी छोर पर उड़ीसा राज्य की सीमा से लगा आदिवासी बाहुल्य जिला मुख्यालय रायगढ़ स्थित है। दक्षिण पूर्वी रेल लाइन पर बिलासपुर संभागीय मुख्यालय से 133 कि. मी. और राजधानी रायपुर से 253 कि. मी. की दूरी पर स्थित यह नगर उड़ीसा और बिहार प्रदेश की सीमा से लगा हुआ है। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य, नदी-नाले, पर्वत श्रृंखला और पुराताित्वक सम्पदाएं पर्यटकों के लिए आकर्षण के केंद्र हैं। रायगढ़ जिले का निर्माण 01 जनवरी 1948 को ईस्टर्न स्टेट्स एजेन्सी के पूर्व पांच रियासतों क्रमश: रायगढ़, सारंगढ़, जशपुर, उदयपुर और सक्ती को मिलाकर किया गया था। बाद में सक्ती रियासत को बिलासपुर जिले में सिम्मलित किया गया। केलो, ईब और मांड इस जिले की प्रमुख नदियां है। इन पहािड़यों में में प्रागैतिहासिक कान के भिित्त चित्र सुरक्षित हैं। आजादी और सत्ता हस्तांतरण के बाद बहुत सी रियासतें इतिहास के पन्नों में कैद होकर गुमनामी के अंधेरे में खो गये। लेकिन रायगढ़ रियासत के राजा चक्रधरसिंह का नाम भारतीय संगीत कला और साहित्य के क्षेत्र में असाधारण योगदान के लिए हमेशा याद किया जाता रहेगा। राजसी ऐश्वर्य, भोग विलास और झूठी प्रतिष्ठा की लालसा से दूर उन्होंने अपना जीवन संगीत, नृत्यकला और साहित्य को समर्पित कर दिया। इसके लिए उन्हें कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अधीन रहना पड़ा। लेकिन 20 वीं सदी के पूर्वार्द्ध में रायगढ़ दरबार की ख्याति पूरे भारत में फैल गयी। यहां के निष्णात् कलाकार अखिल भारतीय संगीत प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर पुरस्कृत होते रहे। इससे पूरे देश में छत्तीसगढ़ जैसे सुदूर वनांचल राज्य की ख्याति फैल गयी।गणेश मेले की शुरूवात :- रायगढ़ में ``गणेश मेले´´ की शुरूवात कब हुई इसका कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिलता। मुझे मेरे घर में रायगढ़ के राजा विश्वनाथ सिंह का 8 सितंबर 1918 को लिखा एक आमंत्रण पत्र माखनसाव के नाम मिला है जिसमें उन्होंने गणेश मेला उत्सव में सिम्मलित होने का अनुरोध किया गया है। इस परम्परा का निर्वाह राजा भूपदेवसिंह भी करते रहे। पंडित मेदिनी प्रसाद पांडेय ने `गणपति उत्सव दर्पण` लिखा है। 20 पेज की इस प्रकािशत पुस्तिका में पांडेय जी ने गणेश उत्सव के अवसर पर होने वाले कार्यक्रमों को छंदों में समेटने का प्रयास किया है। गणेश चतुर्थी की तिथि तब स्थायी हो गयी जब कुंवर चक्रधरसिंह का जन्म गणेश चतुर्थी को हुआ। बालक चक्रधरसिंह के जन्म को चिरस्थायी बनाने के लिए `चक्रधर पुस्तक माला` के प्रकाशन की शुरूवात की थी। इस पुस्तक माला के अंतर्गत पंडित पुरूषोत्तम प्रसाद पांडेय के कुशल संपादन में पंडित अनंतराम पांडेय की रचनाओं का संग्रह `अनंत लेखावली` के रूप में नटवर प्रेस रायगढ़ से प्रकािशत किया गया था। कहते हैं रायगढ़ रियासत के राजा जुझारसिंह ने अपने शौर्य और पराक्रम से राज्य को सुदृढ़ किया, राजा भूपदेवसिंह ने उसे श्री सम्पन्न किया और राजा चक्रधरसिंह ने उसे संगीत, कला, नृत्य और साहित्य की त्रिवेणी के रूप में ख्याति दिलायी।नान्हे महाराज से चक्रधर सिंह तक का सफर :- दरअसल रायगढ़ दरबार को संगीत, नृत्य और कला के क्षेत्र में ख्याति यहां बरसों से आयोजित होने वाले गणेश मेला उत्सव में मिली। बाद में यह जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। क्योंकि इस दिन (19 अगस्त सन् 1905 को) रायगढ़ के आठवें राजा भूपदेवसिंह के द्वितीय पुत्र रत्न के रूप में चक्रधरसिंह का जन्म हुआ। वे तीन भाई क्रमश: श्री नटवरसिंह, श्री चक्रधरसिंह और श्री बलभद्रसिंह थे। चक्रधरसिंह को सभी ``नान्हे महाराज´´ कहते थे। उनका लालन पालन यहां के संगीतमय और साहिित्यक वातावरण में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा रायगढ़ के मोती महल में हुई। आठ वर्ष की आयु में सन् 1914 में उन्हें रायपुर के राजकुमार कालेज में दखिल कराया गया। नौ वर्ष तक वहां के कड़े अनुशासन में विद्याध्ययन करने के बाद सन 1923 में प्रशासनिक ट्रेनिंग के लिए छिंदवाड़ा चले गये। कुशलता पूर्वक वहां की प्रशासनिक ट्रेनिंग पूरा करके रायगढ़ लौटने पर उनका विवाह बिंद्रानवागढ़ के जमींदार की बहन से हुआ। जिनके गर्भ से श्री ललित कुमार सिंह, श्री भानुप्रताप सिंह, मोहिनी देवी और गंधर्वकुमारी देवी का जन्म हुआ। 15 फरवरी 1924 को राजा नटवरसिंह की असामयिक मृत्यु हो गयी। चूंकि उनका कोई पुत्र नहीं था अत: रानी साहिबा ने चक्रधरसिंह को गोद ले लिया। इस प्रकार श्री चक्रधरसिंह रायगढ़ रियासत की गद्दी पर आसीन हुए। 04 मार्च सन् 1929 में सारंगढ़ के राजा जवाहरसिंह की पुत्री कुमारी बसन्तमाला से राजा चक्रधरसिंह का दूसरा विवाह हुआ जिसमें शिवरीनारायण के श्री आत्माराम साव सिम्मलित हुए। मैं उनका वंशज हूं और मुझे इस विवाह का निमंत्रण पत्र मेरे घर में मिला। उनके गर्भ से सन 1932 में कुंवर सुरेन्द्रकुमार सिंह का जन्म हुआ। उनकी मां का देहांत हो जाने पर राजा चक्रधरसिंह ने कवर्धा के राजा धर्मराजसिंह की बहन से तीसरा विवाह किया जिनसे कोई संतान नहीं हुआ।नृत्य, संगीत और साहित्य की त्रिवेणी के रूप में :- राजा बनने के बाद चक्रधरसिंह राजकीय कार्यों के अतिरिक्त अपना अधिकांश समय संगीत, नृत्य, कला और साहित्य साधना में व्यतीत करने लगे। वे एक उत्कृष्ट तबला वादक, कला पारखी और संगीत प्रमी थे। यही नहीं बल्कि वे एक अच्छे साहित्यकार भी थे। उन्होंने संगीत के कई अनमोल ग्रंथों, दर्जन भर साहिित्यक और उर्दू काव्य तथा उपन्यास की रचना की। उनके दरबार में केवल कलारत्न ही नहीं बल्कि साहित्य रत्न भी थे। सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री भगवतीचरण वर्मा, पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, श्री रामेश्वर शुक्ल ``अंचल´´, डॉ. रामकुमार वर्मा और पं. जानकी बल्लभ शास्त्री को यहां अपनी साहिित्यक प्रतिभा दिखाने और पुरस्कृत होने का सौभाग्य मिला। अंचल के अनेक लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकार जिनमें पं. अनंतराम पांडेय, पं. मेदिनीप्रसाद पांडेय, पं. पुरूषोत्तम प्रसाद पांडेय, पं. लोचनप्रसाद पांडेय, डॉ. बल्देवप्रसाद मिश्र और ``पद्मश्री´´ पं. मुकुटधर पांडेय आदि प्रमुख थे, ने यहां साहिित्यक वातावरण का सृजन किया। सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. बल्देवप्रसाद मिश्र रायगढ़ दरबार में दीवान रहे। श्री आनंद मोहन बाजपेयी उनके निजी सचिव और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी उनके पथ प्रदर्शक थे। इनके सानिघ्य में राजा चक्रधर सिंह ने कई पुस्तकों की रचना की। उनमें बैरागढ़िया राजकुमार, अल्कापुरी और मायाचक्र (सभी उपन्यास), रम्यरास, रत्नहार, रत्नमंजूषा (सभी काव्य), काव्य कानन (ब्रज काव्य), जोशे फरहत और निगारे फरहत (उर्दू काव्य) आदि प्रमुख है। इसके अलावा नर्तन सर्वस्वम, तालतोयनिधि, रागरत्नमंजूषा और मुरजपरन पुष्पाकर आदि संगीत की अनमोल कृतियों का उन्होंने सृजन किया है।रायगढ़ कत्थक घराने के साक्षी :-    जयपुर घराने के पंडित जगन्नाथ प्रसाद पहले गुरू थे जिन्होंने यहां तीन वर्षो तक कत्थक नृत्य की शिक्षा दी। इसके पश्चात् पं. जयलाल सन् 1930 में यहां आये और राजा चक्रधर सिंह के मृत्युपर्यन्त रहे। कत्थक के प्रख्यात् गुरू और लखनऊ घराने से सम्बद्ध पं. कालिकाप्रसाद के तीनों पुत्र अच्छन महाराज, लच्छू महाराज और शंभू महाराज यहां बरसों रहे। बिंदादीन महाराज के शिष्य सीताराम जी भी यहां रहे। उस्ताद कादर बख्श, अहमद जान थिरकवा जैसे सुप्रसिद्ध तबला वादक यहां बरसों रहे। इसके अतिरिक्त मुनीर खां, जमाल खां, करामत खां और सादिक हुसैन आदि ने भी तबले की शिक्षा देने रायगढ़ दरबार में आये थे। कत्थक गायन के लिये हाजी मोहम्मद, अनाथ बोस, नन्हें बाबू, धन्नू मिश्रा और नासिर खां भी यहां रहे। इसके अलावा राजा बहादुर ने अपने दरबार में देश-विदेश के चोटी के निष्णात कलाकारों और साहित्यकारों को यहां आमंत्रित करते थे। उनके कुशल निर्देशन में यहां के अनेक बाल कलाकारों को संगीत, नृत्यकला और तबला वादन की शिक्षा मिली और वे देश विदेश में रायगढ दरबार की ख्याति को फैलाये। इनमें कार्तिकराम, कल्याणदास, फिरतूदास और बर्मनलाल की जोड़ी ने कत्थक के क्षेत्र में रायगढ़ दरबार की ख्याति पूरे देश में फैलाये। निश्चित रूप से ``रायगढ़ कत्थक घराना´´ के निर्माण में इन कलाकारों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। शासन द्वारा प्रतिवर्ष गणेश चतुर्थी से `चक्रधर समारोह` का आयोजन किया जाता है। इस समारोह में देश के कोने कोने से कलाकारों का आमंत्रित कर सांस्कृतिक कार्यक्रम कराये जाते हैं।चांपा में रहस से गम्मत तक का सफर :-इसी प्रकार चांपा में भी गणेश उत्वस मनाये जाने का उल्लेख मिलता है जिसका बिखरा रूप आज भी यहां अनेत चौदस को देखा जा सकता है। चाम्पा, छत्तीसगढ़ प्रदेश के जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत दक्षिण पूर्वी रेल्वे का एक महत्वपूर्ण जंक्शन है जो 22 अंश उत्तरी अक्षांश और 82.43 अंश पूर्वी देशांश पर स्थित है। समुद्र सतह से 500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हसदो नदी के तट पर बसा यह नगर अपने प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। कोरबा रोड में मड़वारानी की पहािड़यां, मदनपुर की झांकियां, बिछुलवा नाला, केरा झरिया, हनुमानधारा और पीथमपुर के छोटे-बड़े मंदिर चाम्पा को दर्शनीय बनाते हैं। यहां का रामबांधा देव-देवियों के मंदिरों से सुशोभित और विशाल वृक्षों से परिवेिष्ठत और राजमहल का मनोरम दृश्य है। यहां मित्रता के प्रतीक समलेश्वरी देवी और जगन्नाथ मठ उिड़या संस्कृति की साक्षी हैं। डोंगाघाट स्थित श्रीराम पंचायत, वीर बजरंगबली, राधाकृष्ण का भव्य मंदिर, तपसी बाबा का आश्रम, मदनपुर की महामाया और मनिकादेवी, हनुमानधारा में हनुमान मंदिर, पीथमपुर का कलेश्वरनाथ का मंदिर और कोरबा रोड में मड़वारानी का मंदिर छत्तीसगढ़ी संस्कृति कर जीता जागता उदाहरण है। चांपा जमींदारी का अपना एक उज्जवल इतिहास है। यहां के जमींदार शांतिप्रिय, प्रजावत्सल और संगीतानुरागी थे। धार्मिक और उत्सवप्रिय तो वे थे ही, कदाचित् यही कारण है कि चांपा में नवरात्रि में समलेश्वरी, मदनपुर में महामाया देवी और मनिका माई, रथ द्वितीया में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की रथयात्रा, जन्माष्टमी में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, रासलीला और गणेश चतुर्थी से गणेश पूजा उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता रहा है। गणेश पूजा उत्सव रायगढ़ के गणेश मेला के समान होेता है जो पूरे छत्तीसगढ़ में अनूठा होता है। यहां का ``रहस बेड़ा´´ उस काल की कलाप्रियता का साक्षी है। पहले गणेश उत्सव रहसबेड़ा में ही होता था। यूं तो रहसबेड़ा चांपा के आसपास अनेक गांव में है जहां भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला का मंचन होता है। लेकिन जमींदारी का सदर मुख्यालय होने के कारण यहां का रहसबेड़ा कलाकारों को एक मंच प्रदान करता था जहां कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करके पुरस्कृत होता था। यहां पर अनेक प्रकार के गम्मत, रामलीला, रासलीला, नाटक, नृत्य आदि का आयोजन किया जाता था। आज इस प्रकार के आयोजन गली-मुहल्ले, चौराहों में बेतरतीब ढंग से होता है। आपपास के गांवों से हजारों लोग इसे देखने आते हैं। भीड़ इतनी अधिक होती है कि पैदल चलना दूभर हो जाता है। खासकर अनंत चौदस को तो रात भर अन्यान्य कार्यक्रम होते हैं। चाम्पा में गणेश उत्सव की शुरूवात जमींदार श्री नारायण सिंह के शासन काल में शुरू हुआ। वे संगीतानुरागी, धर्मप्रिय और प्रजावत्सल थे। उन्होंने ही यहां जगन्नाथ मंदिर का निर्माण आरंभ कराया जिसे उनके पुत्र प्रेमसिंह ने पूरा कराया। इनके शासनकाल में ही यहां रायगढ़ के गणेश मेला के बाद सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ का दूसरा बड़ा गणेश उत्सव होता था। नारायण सिंह के बाद प्राय: सभी जमींदारों ने इस उत्सव को जारी रखा। उस काल के गणेश उत्सव का बखान लोग आज भी करते नहीं अघाते। महल परिसर में गणेश जी की भव्य प्रतिमा की प्रतिष्ठा की जाती थी। इसके अलावा सोनारपारा, देवांगनपारा के चौराहों में गणेश जी की प्रतिमा रखी जाती थी। आसपास के गांवों की गम्मत पार्टी, नृत्य मंडली, रामलीला और रासलीला की मंडली यहां आती थी। अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। लगभग 15 दिन तक उत्सव का माहौल होता था। उस समय यहां दुर्ग, राजनांदगांव, रायपुर, कमरीद, बलौदा, अकलतरा, नरियरा, कोसा, कराईनारा, रायखेड़ा, गौद, पिसौद और शिवरीनारायण आदि अनेक स्थानों से सांस्कृतिक मंडलियां यहां आती थी। कमरीद के बिजली बेलन गम्मत मंडली के प्रमुख धरमलाल गीतकार ही नहीं बल्कि एक अच्छे कलाकार भी थे। वे अक्सर गाते थे :-  ` ए हर नोहे कछेरी,  हाकि मन बैठे बैठे खेलत हेगरि...।´  इस प्रकार उनकी गीतों में व्यंग्य का पुट होता था। दादू सिंह का रासलीला और गम्मत यहां बहुत सराहे जाते थे। नरियरा के ठाकुर विशेश्वरसिंह, रायगढ़ के भीखमसिंह, पंडित कार्तिकराम और बर्मनलाल जैसे चोटी के कलाकार, कत्थक नर्तक, तबला वादक और संगीतकार यहां शिरकत करने आते थे। इस आयोजन का पूरा खर्च जमींदार अपने खजाने से वहन करते थे। चाम्पा के जमींदार श्री रामशरणसिंह के शासनकाल में यहां का गणेश उत्सव चरम सीमा पर था। इस आयोजन में इतना खर्च हुआ कि सन् 1926 में चाम्पा जमींदारी को ``कोर्ट ऑफ वार्ड्स´´ घोषित कर दिया गया। उन्होंने ही यहां `रहस बेड़ा´ का निर्माण कराया था। अनंत चतुर्दशी को विसर्जन पूजा के बाद नगर की सभी गणेश प्रतिमाएं महल में लायी जाती थी और एक साथ बाजे-गाजे और करमा नृत्य मंडली के नृत्य के साथ पूरे नगर का भ्रमण करती हुई डोंगाघाट पहुंचकर हसदो नदी में विसर्जित कर दी जाती थी। आज भी यहां बहुत संख्या में नृत्य मंडली, गम्मत पार्टी, आर्केष्ट्रा और छत्तीसगढ़ी नाचा आदि का आयोजन होता है। इस आयोजन से आवागमन पूरी तरह से अवरूद्ध हो जाता है। स्थानीय सांस्कृतिक, सामाजिक संस्थाएं और प्रशासन के संयुक्त प्रयास से इसका व्यवस्थित रूप से आयोजन एक सार्थक प्रयास होग....।&lt;br /&gt;रचना, लेखन, फोटो एवं प्रस्तुति,&lt;br /&gt;          प्रो। अश्विनी केशरवानीराघव,&lt;br /&gt;डागा कालोनी, चाम्पा-495671 (३६ गढ़ )&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-8982798396034013054?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/8982798396034013054/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=8982798396034013054' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/8982798396034013054'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/8982798396034013054'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='छत्तीसगढ़ में गणेश उत्सव की प्राचीन परम्परा'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-832753290241163840</id><published>2008-07-10T02:18:00.000-07:00</published><updated>2008-07-13T00:30:39.112-07:00</updated><title type='text'>भारतेन्दु युगीन साहित्यकार गोविंद साव</title><content type='html'>&lt;a style="font-weight: bold;" href="http://aarambha.blogspot.com/2008/06/blog-post_17.html"&gt;भारत&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SHXVGj90huI/AAAAAAAAAKA/Vj17PjU8Yf0/s1600-h/Ashwini+kesharwani+VI+pidi.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5221313651716425442" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left;" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SHXVGj90huI/AAAAAAAAAKA/Vj17PjU8Yf0/s200/Ashwini+kesharwani+VI+pidi.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;ेन्दु&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; युगीन साहित्यकार गोविंद साव&lt;br /&gt;भारतेन्दु युगीन साहित्यकार गोविंद सावप्रो. अश्विनी केशरवानीछत्तीसगढ़ में भारतेन्दु युगीन कवि, आलोचक और उपन्यासकार ठाकुर जगमोहनसिंह का साहित्यिक वातावरण &lt;atomicelement id="ms__id17"&gt;&lt;/atomicelement&gt;बनाने में महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने सन~ 1880 से 1882 तक धमतरी में और सन~ 1882 से 1887 तक शिवरीनारायण में तहसी&lt;span&gt;&lt;span&gt;लदार&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; और मजिस्ट्रेट के रूप में कार्य किया है। यही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के &lt;span class=""&gt;बिखरे&lt;/span&gt; साहित्यकारों को जगन्मोहन मंडल बनाकर एक सूत्र में पिरोया और उन्हें लेखन की सही दिशा भी दी। जगन्मोहन मंडल कांशी के भारतेन्दु मंडल की तर्ज में बनी एक साहित्यिक संस्था थी। इसके माध्यम से छत्तीसगढ़ के साहित्यकार शिवरीनारायण में आकर साहित्य साधना करने लगे। उस काल के अन्यान्य साहित्यकारों के शिवरीनारायण में आकर साहित्य साधना करने का उल्लेख तत्कालीन साहित्य में हुआ है। इनमें रायगढ़ के पं. अनंतराम पांडेय, रायगढ़-परसापाली के पं. मेदिनीप्रसाद पांडेय, बलौदा के पं. वेदनाथ श्‍वर्मा, बालपुर के मालगुजार पं. पुरूसोत्तम प्रसाद पांडेय, बिलासपुर के जगन्नाथ प्रसाद भानु, धमतरी के काव्योपाध्याय हीरालाल, बिलाईगढ़ के पं. पृथ्वीपाल तिवारी और उनके अनुज पं. गणेश तिवारी और शिवरीनारायण के पं. मालिकराम भोगहा, पं. हीराराम त्रिपाठी, गोविंदसाव, महंत अर्जुनदास, महंत गौतमदास, पं. विश्‍वेस्‍वर वर्मा, पं. ऋषि श्‍वर्मा और दीनानाथ पांडेय आदि प्रमुख थे। शिवरीनारायण में जन्में, पले बढ़े &lt;span&gt;&lt;span&gt;और&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; बाद में सरसींवा निवासी कवि शुकलाल प्रसाद पांडेय ने छत्तीसगढ़ गौरव में ऐसे अनेक साहित्यकारों का नामोल्लेख किया है :-नारायण, गोपाल मिश्र, माखन, दलगंजन।बख्तावर, प्रहलाद दुबे, रेवा, जगमोहन।हीरा, गोविंद, उमराव, विज्ञपति, भोरा रघुवर।विष्णुपुरी, दृगपाल, साव गोविंद, बज गिरधर।विश्वनाथ, बिसाहू, उमर नृप लक्षमण छत्‍तीस कोट कवि।हो चुके दिवंगत ये सभी प्रेम, मीर, मालिक सुकवि।।इस प्रकार उस काल में शिवरीनारायण सांस्कृतिक के साथ ही साहित्यिक तीर्थ भी बन गया था। द्विवेदी युग के अनेक साहित्यकारों- पं. लोचनप्रसाद पांडेय, पं. शुकलाल पांडेय, नरसिंहदास वैष्‍णव, सरयूप्रसाद तिवारी मधुकर, ज्वालाप्रसाद, रामदयाल तिवारी, प्यारेलाल गुप्त, छेदीलाल बैरिस्टर, पं. रविशंकर शुक्ल, सुंदरलाल आदि ने शिवरीनारायण की सांस्कृतिक-साहित्यिक भूमि को प्रणाम किया है। मेरा जन्म इस पवित्र नगरी में ऐसे परिवार में हुआ है जो लक्ष्मी और सरस्वती पुत्र थे। पं. शुकलाल पांडेय ने छत्तीसगढ़ गौरव में मेरे पूर्वज गोविंदसाव को भारतेन्दु युगीन कवि के रूप में उल्लेख किया है-रामदयाल समान यहीं हैं अनुपम वाग्मी।हरीसिंह से राज नियम &lt;span&gt;&lt;span&gt;के&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; ज्ञाता नामी।गोविंद साव समान यहीं हैं लक्ष्मी स्वामी।हैं गणेश से यहीं प्रचुर प्रतिभा अनुगामी।श्री धरणीधर पंडित सदृश्‍य यहीं बसे विद्वान हैं।हे महाभाग छत्तीसगढ़ ! बढ़ा रहे तब मान हैं।।हालांकि गोविंद साव की कोई रचना आज उपलब्ध नहीं है लेकिन शिवरीनारायण के साहित्यिक परिवेश में उन्होंने कोई न कोई रचना अवश्‍य लिखी होगी। मुझे साहित्यिक अभिरूचि उनकी विरासत में मिला है। मैं भगवान शबरीनारायण, हमारे कुलदेव महेश्‍वरनाथ महादेव और कुलदेवी माता शीतला का आशीर्वाद तथा चित्रोत्पलागंगा के संस्कार को प्रमुख मानता हूं। उन्हीं के आशीर्वाद से आज प्रदेश के साहित्य जगत में मैं अपनी पहचान बना सकने में समर्थ हो सका हूं। शिवरीनारायण का साहित्यिक परिवेश ठाकुर जगमोहनसिंह की ही देन थी। उन्होंने यहां दर्जन भर पुस्तकें लिखी और प्रकाशित करायी। शबरीनारायण जैसे सांस्कृतिक और धार्मिक स्थल के लोग, उनका रहन-सहन और व्यवहार उन्हें सज्जनाष्टक आठ सज्जन व्यक्तियों का परिचय लिखने को बाध्य किया। भारत जीवन प्रेस बनारस से सन~ 1884 में सज्जनाष्टक प्रकाशित हुआ। वे यहां के मालगुजार और पुजारी पंडित यदुनाथ भोगहा से अत्याधिक प्रभावित थे। भोगहा जी के पुत्र मालिकराम भोगहा ने तो ठा&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SHmtpz9sSYI/AAAAAAAAAKY/daHQKOEi8Ss/s1600-h/Devalal+kesharwani+V+pidi.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://bp2.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SHmtpz9sSYI/AAAAAAAAAKY/daHQKOEi8Ss/s200/Devalal+kesharwani+V+pidi.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5222396176748005762" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;कुर&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; जगमोहनसिंह को केवल अपना साहित्यिक गुरू ही नहीं बनाया बल्कि उन्हें अपना सब कुछ समर्पित कर दिया। उनके संरक्षण में भोगहा जी ने हिन्दी, अंगेजी, बंगला, उड़िया और उर्दू और मराठी साहित्य का अध्ययन किया, अनेक स्थानों की यात्राएं की और प्रबोध चंद्रोदय, रामराज्यवियोग और सती सुलोचना जैसे उत्कृष्ट नाटकों की रचना की जिसका सफलता पूर्वक मंचन भी किया गया। इसके मंचन के लिए उन्होंने यहां एक नाटक मंडली भी बनायी थी। माखन वंश के श्री बलभद्र साव के सुपुत्र और श्री सूरजदीन साव के अनुज श्री विद्याधर साव के नेतृत्व में यहां एक ष्‍केशरवानी नवयुवक नाटक मंडली बना था जिसके माध्यम से न केवल माखन वंश के नवयुवकों बल्कि नगर के नवोदित कलाकारों मंच मिला और अनेक नाटकों का सफलता पूर्वक मंचन किया गया। ठाकुर जगमोहनसिंह ने सज्जनाष्‍टक में माखन साव के बारे में लिखा है :-माखन साहु राहु दारिद कहं अहै महाजन भारी।दीन्हो घर माखन अरू रोटी बहुविधि तिनहो मुरारी।।लच्छपती मुइ शरन जनन को टारत सकल कलेशा।द्रव्यहीन कहं है कुबेर सम रहत न दुख को लेशा।दुओधाम प्रथमहि करि निज पग कांवर आप चढ़ाई।चार बीस शरदहु के बीते रीते गोलक नैना।लखि अंसार संसार पार कहं मुंदे दृग तजि नैना।।छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित मालगुजारों में माखनसाव की गिनती होती थी। इस उद्धरण से स्पष्‍ट है कि वे एक महाजन थे जिनके घर में लक्ष्मी जी और कुबेर जी का वास था। वे न केवल धीर-गंभीर और प्रजाप्रिय थे बल्कि धार्मिक और भक्तवत्सल भी थे। उन्होंने महानदी के तट पर अपने कुलदेव महेश्‍वरनाथ महादेव का एक भव्य मंदिर का संवत~ 1890 में निर्माण कराया था। इस मंदिर के बारे में ठाकुर जगमोहनसिंह ने अपने खंडकाव्य प्रलय में लिखा है :-बाढ़त सरित बारि छिन-छिन में। चढ़ि सोपान घाट वट दिन मे।शिवमंदिर जो घाटहिं सौहै। माखन साहु रचित मन मोहै।।84।।चटशाला जल भीतर आयो। गैल चक्रधर गेह बहायो।पुनि सो माखन साहु निकेता।। पावन करि सो पान समेता।।87।।उनकी धार्मिकता और भक्ति को डां. भालचंद राव तैलंग ने ष्‍ष्‍छत्तीसगढ़ी, हल्बी, भतरी बोलियों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययनष्‍ष्‍ के अर्थतत्व पृ. 200 मे उल्लेख किया है। विशेष घटना के कारण ष्‍ष्‍खिचकेदारष्‍ष्‍ को परिभाषित करते हुए उन्होंने लिखा है-ष्‍ष्‍रतनपुर का मंदिर जहां पहले माखन साव ने एक साधु को खिचड़ी परोसी थी और जहां पकी हुई खिचड़ी से भरी पत्तल को फोड़कर शिवजी प्रकट हुए थे। इस उद्धरण को रामलाल वर्मा द्वारा लिखित रायरतनपुर महात्म्य पृ 22 से लिया गया है।ऐसे पवित्र आत्मा माखन साव के अनुज श्री गोविंद साव के जगन्नाथपुरी की यात्रा और मनौती के रूप में जन्में उनके एकलौते पुत्र जगन्नाथ साव की धर्मप्रियता पर भी किसी को संदेह नहीं है। कदाचित~ यही कारण है कि आज भी गोविंदसाव के वंशजों का मुंडन संस्कार जगन्नाथपुरी में किये जाने का विधान है। मेरे पिता जी, मेरा और मेरे बच्चों का मुंडन संस्कार भी पुरी में हुआ था। जगन्नाथ साव के एक मात्र पुत्र पचकौड़ साव हुए। माखन वंश में उनकी विद्वता की साख थी और इस वंश के लंबरदार आत्माराम भी उनकी दबंगता से प्रभावित थे। उन्हें साजापाली और दौराभाटा में खेती-किसानी का दायित्व सौंपा गया था जिसे उन्होंने अपने चचेरे भाई महादेव साव के सहयोग से बखूबी निभाया। शिवरीनारायण में महादेव-पचकौड़ साव के नाम से व्यापार होता था और जब गांवों में व्यापार की शुरूवात हुई तब 05 वर्ष बाद शिवरीनारायण का खाता बंद कर साजापाली-दौराभाठा में महादेव-पचकौड़ साव के नाम से खाता शुरू किया गया जो मालगुजारी उन्मूलन तक चलता रहा। गलत बातों का वे दबंगता से विरोध करते थे साथ ही मांगने पर उचित सलाह भी देते थे। आजादी के कुछ महिने बाद 17.10.&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SHXVGPe3V1I/AAAAAAAAAJw/-ro-caopXEA/s1600-h/Raghav+sao,+Malgujar+IV+pidi.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5221313646217877330" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left;" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SHXVGPe3V1I/AAAAAAAAAJw/-ro-caopXEA/s200/Raghav+sao,+Malgujar+IV+pidi.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;1947 को उन्होंने स्वर्गारोहण किया। पचकौड़ साव के एक मात्र पुत्र राघव साव का जन्म चैत्र शुक्ल 2, संवत~ 1972 को रात्रि 10 बजकर 33 मिनट को हुआ। उनका राशि नाम दुर्गाप्रसाद &lt;atomicelement id="ms__id260"&gt;&lt;/atomicelement&gt;रखा गया था। परिवार की धार्मिकता का संस्कार उन्हें मिला और इसी परिवेश में परवरिश होने के कारण धार्मिकता उनके जीवन का एक अंग हो गया। उन्होंने अपने जीवन में लगभग दो घंटे पूजा अवश्‍य किया करते थे। चारों धाम-बद्रीनाथ, द्वारिकाधाम, रामेश्‍वरम~ और जगन्नाथपुरी की पूरी यात्रा उन्होंने की थी। गया श्राद्ध, प्रयाग और काशी श्राद्ध करने के साथ गंगासागर और बाबाधाम की यात्रा भी उन्होंने की। जीवन भर वे सात्विक रहे- सादा जीवन और उच्च विचार को उन्होंने अपनाया।...और इलाहाबाद के महाकुंभ में एक माह का कल्पवास करने के बाद अपने भरे पूरे परिवार को शुक्रवार, दिनांक 24.11.1989 को दोपहर एक बजे 74 वर्ष जीवन का सुख भोगकर स्वर्गारोहण किया। उन्होंने मुझे रामायण और महाभारत की कहानियां सुनाकर धार्मिक वृत्ति से न केवल जोड़ा बल्कि मुझे रचनात्मक लेखन की प्रेरणा दी। मुझे इस दिशा में प्रेरित करने वाले माखन वंश के अंतिम लंबरदार श्री सूरजदीन साव भी थे। सर्व प्रथम विश्‍व हिंदु परिषद द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता में गीता के प्रसंगों पर निबंध लिखकर पुरस्कृत होकर लेखन की मैंने शुरूवात की। इस निबंध के लेखन में मुझे मेरे दादा श्री राधवप्रसाद के साथ ही श्री सूरजदीन साव का पूर्ण सहयोग मिला। वृद्ध प्रपितामह के साहित्यिक विरासत और महानदी का संस्कार पाकर मेरी लेखनी अविचल चलने लगी।ऐसा पहली बार हुआ और गोविंदसाव के &lt;span class=""&gt;वंश&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SHXVGeZxPcI/AAAAAAAAAJ4/pQlE5zXQzPI/s1600-h/Devalal,+Sewaklal,+Hemlal+V+pidi.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5221313650223037890" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left;" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SHXVGeZxPcI/AAAAAAAAAJ4/pQlE5zXQzPI/s200/Devalal,+Sewaklal,+Hemlal+V+pidi.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; में एक-एक पुत्र की परंपरा टूटी और राघवप्रसाद के चार पुत्र क्रमश: देवालाल, सेवकलाल, होलीदास और हेमलाल हुए। होलीदास तो बचपन में ही काल कवलित हो गए लेकिन शेष तीनों पुत्रों ने अपने वंश को बढ़ाने में सफल हुए। देवालाल के एक मात्र पुत्र अश्‍वीनी कुमार और पुत्री मीना बाई हुई। सेवकलाल के दो पुत्र संजय कुमार और नरेन्द्र कुमार तथा चार पुत्री मंजुलता, अंजुलता, स्नेहलता और मधुलता हुई। हेमलाल के दो पुत्र अतीत और अमित कुमार और एक मात्र पुत्री अल्पना हुई। इस प्रकार राघवप्रसाद के तीन पुत्र और पांच पौत्र हुए और उनकी वंश परंपरा बढ़ी। राघवप्रसाद के ज्येष्‍ठ पुत्र के रूप में देवालाल का 05. 07. 1934 को जन्म हुआ। उनकी प्राथमिक शिक्षा शिवरीनारायण में और हाई स्कूल की शिक्षा सारंगढ़ और बिलासपुर में हुई। उच्च शिक्षा न कर पाने का उन्हें अफसोस अवश्‍य हुआ था लेकिन मात्र 17 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने घर-परिवार की जिम्मेदारी उठा लिए थे। अपने भाई-बहनों की शिक्षा दीक्षा से लेकर उनके विवाह और नौकरी लगाने तक तथा उनके बच्चों के भी विवाह आदि में पूरा सहयोग देकर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। देवालाल धीर, गंभीर और सुलझे हुए व्यक्ति थे। कदाचित~ उनके इसी व्यक्तित्व के कारण वे न केवल माखन वंश के बल्कि समाज और शिवरीनारायण, बेलादूला और साजापाली में अत्यंत लोकप्रिय थे। उन्होंने न जाने कितने परिवार को टूटने से बचाया और टूटे परिवार को जोड़ा है। वे अपनी पीढ़ी के एक मात्र व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी पैत्रिक वृत्ति महाजनी को अपनाया। उन्होंने शिवरीनारायण के विकास में अमूल्य योगदान दिया है। आज की पीढ़ी उनके योगदान को शायद न समझ सके। लेकिन यह सत्य है कि शिवरीनारायण में गाम पंचायत के सफलतम सरपंच जहां माखन वंश के श्री तिजाउप्रसाद थे वहीं उनकी इस सफलता के पीछे यहां के उदितनारायण सुलतानिया, देवालाल केशरवानी, गोवर्धन शर्मा, सेवकराम श्रीवास और मोहम्मद अहमद खां का विशेष योगदान था। उनके कार्यकाल में ही यहां शिक्षा का विस्तार हुआ, अनेक स्कूल भवन बने, बिजली और सड़कें बनी, सब्जी बाजार लगने की शुरूवात हुई और जनपद पंचायत जांजगीर से साप्ताहिक मवेशी बाजार और छत्तीसगढ़ के महाकुंभ कहाने वाले मेले की व्यवस्था गाम पंचायत की मिली। इस नगर में चिकित्सा सुविधा के लिए देवालाल ने मंत्रियों और अधिकारियों से मिलकर अपने बहनोई श्री बलदाउ प्रसाद केशरवानी को प्रेरित कर जहां ष्‍प्रयाग प्रसाद केशरवानी शासकीय चिकित्सालयष्‍ की स्थापना करायी और डाक्टरों के रहने-खाने की सुविधा उपलब्ध करायी। इस चिकित्सालय में विद्युत व्यवस्था उन्होंने अपने दादा श्री पचकौड़ साव की स्मृति में कराया था। शासकीय प्राथमिक कन्या शाला को मात्र अपने मित्र श्री गणेश प्रसाद नारनोलिया से शर्त लगाकर खुलवाया था जो आज शासकीय मिडिल कन्या स्कूल के रूप में संचालित है। मध्यप्रदेश शासन के मंत्रियों सर्वश्री डा. रामाचरण राय, श्री वेदराम, श्री बिसाहूदास महंत, श्री चित्रकांत जायसवाल, श्री बी. आर. यादव, भंवरसिंह पोर्ते, डा. कन्हैयालाल शर्मा, श्री रेशमलाल जांगड़े, श्रीधर मिश्रा, मुख्य मंत्री श्री श्‍यामाचरण शुक्ल, और केंदिय मंत्री श्री विद्याचरण शुक्ल से उनकी गहरी पहचान थी। आये दिन उनका कार्यक्रम शिवरीनारायण में कराकर नगर को विकास के मार्ग में ले जाना उनका ध्येय था। खरौद को नगर पालिका बनाये जाने पर नगरवासियों के अनुरोध पर उन्होंने मंत्रियों से अपनी पहचान का लाभ उठाकर शिवरीनारायण को भी नगरपालिका दर्जा तीन बनवाने में सफलता हासिल की। महानदी के रेत में महाराष्‍ट्र के किसानों को तरबूज बोने के लिए उन्होंने बुलवाया जिससे पंचायत की आमदनी बढ़ी। पूरे छत्तीसगढ़ में एकलौता शिवरीनारायण नगर था जहां बिजली के खम्भों में मरकरी बल्ब लगे थे। यही नहीं बल्कि उन्होंने शबरीनारायण मंदिर के गर्भगृह में ष्‍केशरवानी महिला समाजष्‍ द्वारा संकल्पित चांदी के पत्तर से बना दरवाजा को सन 1960 में जीवन मिस्त्री के सहयोग से कलकत्ता से बनवाया था। अपने कुलदेव महेश्‍वरनाथ मंदिर में भोगराग की व्यवस्था करायी। सारंगढ़ और शिवरीनारायण में केशरवानी धर्मशाला के निर्माण में अर्थसंचय में उनका &lt;span class=""&gt;अमूल्य&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SHXVG9tFrXI/AAAAAAAAAKQ/-WvBxS2x2jg/s1600-h/Seorinarayan++Ki+Haweli.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5221313658625568114" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left;" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SHXVG9tFrXI/AAAAAAAAAKQ/-WvBxS2x2jg/s200/Seorinarayan++Ki+Haweli.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; सहयोग था। अपने भाईयों, बहनों को उन्होंने न केवल सत्पथ पर चलने की प्रेरणा दी बल्कि समाज के लिए भी एक मिशाल स्थापित की। अपने परिवार के श्री सूरजदीन साव, श्री विद्याधर साव, श्री तिजाउ प्रसाद, श्री साधराम साव, श्री रामचंदसाव, श्री ईतवारी साव, श्री गिरीचंद साव, श्री मुरीतराम साव, श्री जगदीश प्रसाद, श्री गौटियाराम के प्रिय पात्र रहे वहीं श्री पराउराम, श्री गोरेलाल, श्री शोभाराम के गहरे मित्र रहे। जीवन भर सत्पथ रहकर नि:स्वार्थ सेवा भाव से कार्य करते हुए जीवन के अंतिम समय में उन्होंने भगवत्भजन में अपना मन लगाया... और 67 वर्ष की अवस्था में भौतिक सुख सुविधा का परित्याग कर 16. 04. 2001 को पंच तत्व में विलीन हो गये।राघव साव के द्वितीय पुत्र सेवकलाल ने जहां बैंकिंग सेवा में अपना जीवन सफर तय किया वहीं तृतीय पुत्र हेमलाल ने व्यापार को अपनाया जिसे उन्होंने पुत्र अतीत कुमार के सहयोग से संचालित कर रहे हैं। सेवकलाल के दोनों पुत्र संजय और नरेन्द कुमार टेंट हाउस के व्यापार में संलग्न हैं। देवालाल के पुत्र अश्विनी कुमार शासकीय महाविद्यालय चांपा में प्राध्यापक हैं। उन्होंने अपनी अभिरूचि के अनुसार छत्तीसगढ़ के इतिहास, पुरातत्व और परंपराओं के उपर लिखकर प्रादेशिक और राष्‍ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित किया और अपने वंश को गौरवान्वित किया है। &lt;atomicelement id="ms__id413"&gt;&lt;/atomicelement&gt;धर्मयुग, अणुवत और नवनीत हिन्दी डाइजेस्ट जैसे राष्‍ट्रीय पत्रिका में बाल मनोविज्ञान विषय पर और कादम्बिनी, दैनिक हिन्दुस्तान में स्वतंत्र स्तम्भ लेखन किया। देश और प्रदेश के सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी है। वे जांजगीर-चांपा जिले और प्रदेश के गिने चुने राष्‍ट्रीय लेखकों में से एक हैं। अपने क्षेत्र के उपर लिखकर अपने जन्म को सार्थक बनाने का प्रयास उन्होंने किया है। शिवरीनारायण, पीथमपुर के उपर शोध गंथ लिखकर वहां के माहात्म्य को प्रकाशित कर सद~कार्य किया है। छत्तीसगढ़ के बिखरे और खंडहर होते मंदिरों और लुप्त हो रही परंपराओं पर कलम चलाकर लोगों का ध्यान आकर्ष्‍शित किया है। छत्तीसगढ़ के भारतेन्दु कालीन गुमनाम साहित्यकारों को प्रकाश में लाने का उनका सराहनीय प्रयास है। उनके इस रचनात्मक और सार्थक लेखन के लिए विभिन्न संगठनों से सम्मानित होकर अपने वंश को गौरवान्वित करने वाले अकेले हैं। आज वे छत्तीसगढ़ राज्य केशरवानी &lt;atomicelement id="ms__id432"&gt;&lt;/atomicelement&gt;वैश्‍य सभा के अध्यक्ष रहे और सम्प्रति प्रदेश सभा के संरक्षक हैं। प्रदेश के अनेक नगर सभाओं के द्वारा उन्हें ष्‍समाज के गौरवष्‍ के रूप में सम्मानित होने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है। उनकी धर्मपत्नी कल्याणी देवी भी एक स्वतंत्र लेखिका हैं और लायनेस क्लब चांपा और नगर केशरवानी महिला सभा की अध्यक्ष, प्रदेश केशरवानी महिला सभा की कोषाध्यक्ष और अखिल भारतीय केशरवानी वैश्‍य महिला महासभा की राष्‍ट्रीय महामंत्री हैं। उनके दो पुत्र प्रांजल कुमार कम्प्यूटर साफ~टवेयर इंजीनियर के रूप में &lt;a href="http://bp3.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SHXVGifKfMI/AAAAAAAAAKI/YowF943x8qo/s1600-h/Pranjal+kesharwani+VII+pidi.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5221313651319405762" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left;" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SHXVGifKfMI/AAAAAAAAAKI/YowF943x8qo/s200/Pranjal+kesharwani+VII+pidi.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;टाटा कंसलटेन्सी सर्विसेस मुम्बई में पदस्थ है वहीं अंजल कुमार नेट प्वाइंट के संचालक है। हेमलाल के दो पुत्रों में अतीत कुमार जहां अपने पिता जी के साथ व्यापार में संलग्न हैं वहीं अमित कुमार मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके अपने पिता के साथ उनके व्यवसाय में संलग्न है। सेवकलाल के पुत्र संजय कुमार के दो पुत्री सृष्टि और साक्षी और एक पुत्र सृजन कुमार है वहीं नरेन्द कुमार के दो पुत्र पियुष और प्रीतुल है। दोनों भाई टेंट व्यवसाय कर रहे हैं।रचना, लेखन एवं प्रस्तुति,प्रो. अश्विनी केशरवानीराघव, डागा कालोनी,चांपा-495671 छ.ग&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-832753290241163840?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/832753290241163840/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=832753290241163840' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/832753290241163840'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/832753290241163840'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/07/blog-post_10.html' title='भारतेन्दु युगीन साहित्यकार गोविंद साव'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SHXVGj90huI/AAAAAAAAAKA/Vj17PjU8Yf0/s72-c/Ashwini+kesharwani+VI+pidi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-1021480782073398207</id><published>2008-07-04T02:31:00.002-07:00</published><updated>2008-07-06T08:34:18.310-07:00</updated><title type='text'>क्या सोंचते हैं हम बच्चों का रिजल्ट देखकर</title><content type='html'>&lt;strong&gt;क्या सोंचते हैं हम बच्चों का रिजल्ट देखकर&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;प्रो. अिश्वनी केशरवानीपिछले दिनों मै अपने एक मित्र के घर गया तो देखा कि उनका दस वषीZय बेटा प्रियतोष स्कूल से आया था और वह सिर झुकाये खड़ा हो गया जैसे उससे कुछ अपराध किया हो। उसकी मम्मी ने पूछा- ``क्या बात है´´ ? प्रियतोष ने डरते-डरते परीक्षा परिणाम अपनी मम्मी के हाथ में दे दिया। देखते ही वे गुस्से से कांपने लगी- ``ये माक्र्स आये हैं तुम्हारे ? किसी में चालीस, किसी में पचास, और किसी में अड़तालीस, बस ? तुम्हें पढ़ाकर मैं अपना दिमाग खराब करती थी। वहां जाकर न जाने तुम्हें क्या हो जाता है। भगवान ने तुम्हें अच्छा-खासा दिमाग दिया है, पर तुम उसका इस्तेमाल ही नही करो तो मैं इसमें क्या कर सकती हूं। डांट सुनते ही प्रियतोष रोने लगा, लेकिन उसकी मम्मी का गुस्सा कम नहीं हुआ और तड़ से एक चांटा प्रियतोष के गाल पर पड़ गया। ``... अब रोते क्यों हो ? रोज तो आकर कहते थे कि पेपर अच्छा हुआ है। और इतने खराब नंबर!´´ चांटा पड़ते ही प्रियतोष का रोना बढ़ गया हिचकियों के बीच वह कहने लगा-´´... तो क्या करता, तुमसे कहता कि पेपर बिगड़ गया तो और डांटती। तुम्हीं तो रात के बारह बजे तक पढ़ाती थी। तब मैं पढ़ता नहीं था क्या? अच्छे माक्र्स नहीं आये तो, मैं क्या करूं? स्कूल में टीचर डांटती है और घर पर तुम´´ और प्रियतोष रोते-रोते बेहाल हो गया। हिचकियों से असकी सांस रूकने लगी। उसकी जवाब सुनकर उसकी मां स्तंभित रह गयीं।&lt;br /&gt;इस पूरी घटना के दौरान में मूक दर्शक बना खड़ा रहा। शुरू से ही मैं प्रियतोष और उसकी मां को देख रहा हूं।ं प्रियतोष के स्कूल जाने से लेकर आज तक। जब प्रियतोष ढाई साल का था, उसकी मम्मी उसे जो कुछ सिखाती, उसे वह बहुत जल्दी सीख जाता था। कालोनी के बच्चों को रोज स्कूल जाते देखकर वह भी स्कूल जाने को मचल जाता। उसके स्कूल जाने के प्रति उत्सुकता और कुछ अपनी महत्वाकांक्षा के बीच आखिरकार उसकी उम्र तीन वर्ष बता कर उसे एल. के. जी. में दाखिल करवाया गया। तब उसके पापा-मम्मी बहुत खुश थे। रोज समय निकालकर दोनों उसे पढ़ाते। धीरे-धीरे सब कुछ बदल गया। प्रियतोष स्कूल से आया नहीं कि उसकी मम्मी उसे पढ़ाने बैठ जाती। न उसे खेलने दिया जाता, न टी. वी. देखने। उसके जिद करने पर या तो कोई ऊंची सीख मिलती या फिर मार, इिम्तहान के समय ही नहीं, अक्सर उसकी मम्मी उसे पढ़ाती थी। जब खुद नही पढ़ा पाती तो उसके पापा पढ़ाने बैठ जाते। औसत से भी ऊंचा बौिद्धक स्तर था प्रियतोष का। याददाश्त में भी कोई कमी नही थी, फिर भी स्कूल से जब भी प्रोगेस रिपोर्ट आती तो घर में रोना-धोना अवश्य होता। पता नहीं दोष किसका था ? भारी भरकम पाठ्यक्रम का, स्कूल के स्तर का या घर में पढ़ने-पढ़ाने के लिए मां-पिता के रवैये का ? प्रियतोष के पहले तो अच्छे नंबर आये। मगर उसके माता-पिता चाहते थे कि उसके नंबर में आशातीत वृिद्ध होनी चाहिए और इसके लिए वे स्कूल से आने के बाद उसे खाने-खेलने का समय भी न देते और पढ़ने-पढ़ाने पर जोर देते। धीरे-धीरे प्रियतोष का दिल पढ़ाई से उचटने लगा। मां के सामने वह पढ़ने का नाटक करने लगा। और आज उसी का परिणाम सामने था।&lt;br /&gt;आज प्राय: सभी घरों में बच्चों की पढ़ाई को लेकर इस प्रकार की समस्या एक चुनौती बनी हुई है। एक ऐसी चुनौती, जिसे पार पाने के साधन क्या हैं, हमें पता नही है। हर अभिभावक के सामने कुछ प्रश्न है, जिनका उत्तर ढूंढना आसान नही है। केवल स्कूल की पढ़ाई के बल पर बच्चे इम्तहान पास नहीं कर सकते। खुद रोज पढ़ाये तो डर यह है कि बच्चे पूरी तरह मम्मी-पापा के ऊपर निर्भर हो कर न रह जाये। फिर हर अभिभावक बिना प्रशिक्षण पाये अच्छी मां या अच्छा पिता तो बन सकता ह,ै लेकिन एक अच्छा अध्यापक बनने के लिए प्रशिक्षण जरूरी होता है।&lt;br /&gt;मुझे एक घटना याद आ रही है हमारे पड़ोस में एक दंपती स्थानांतरित हो कर आये। उनका एक लड़का था, उसे स्थानीय स्कूल में दाखिल करा दिया, बच्चे की सजग, पढ़ी-लिखी आधुनिका युवा मां रोज नन्हे बेटे के स्कूल से आते ही उसका बस्ता खोलती और उसे कुछ खिलाने पिलाने के बाद बैठ जाती होम वर्क कराने। एक हता ही हुआ था कि एक दिन शाम को उसके बेटे के स्कूल की टीचर उनके घर पहुंच गयी। बिना कोई भूमिका बांधे वे पूछने लगी ``क्या आप अपने बेटे को रोज होमवर्क कराती हैं ?´´ ``जी हां´´ मुस्करा कर सगर्व कहा उन्होंने उन्हें आशा थी की टीचर उनकी जिम्मेदारी के अहसास की प्रशंसा करेगी, लेकिन हुआ इसके विपरीत। टीचर बड़ी गंभीरता से कहने लगी- ``देखिए´´ छोटे बच्चों को पढ़ाना हमारा काम है। हमें इसके लिए ट्रेनिंग दी जाती है। गलत तरीके से पढ़ाने का नतीजा जानती हैं आप ? आपका बच्चा सदा के लिए किताबों से चिढ़ सकता है। उसकी जिज्ञासु प्रवृत्ति नष्ट हो सकती है। उसकी प्रतिभा कुंठित हो सकती है। आपका कर्तव्य केवल इतना है कि आप निश्चित समय पर बेटे को पढ़ने के लिए अवश्य बैठा दें। उसकी पढ़ाई में हस्तक्षेप न करें, यदि उसे कोई कठिनाई हो तो उसे दूर करने में सहायता अवश्य करें।´´&lt;br /&gt;उक्त घटना ने मुझे प्रभावित किया और मैं इस विषय पर विचार करने लगा। आजकल स्कूल विशेषकर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों के बच्चों की पढ़ाई उनके ऊपर और उनके मां-बाप पर एक बोझ है, जिसे कम करने की जिम्मेदारी कम-से-कम अभी तो अभिभावक के हिस्से में आती है। यहां विचार करने की बात यह है कि आखिर ये समस्याएं बनती क्यों हैं ?&lt;br /&gt;बच्चों का पाठ्यक्रम जिस तेजी से बढ़ा है, उसी तेजी से कक्षाओं में बच्चों की संख्या भी बढ़ी है, लेकिन इन दोनों में तालमेल बैठाने के लिए हर टीचर को प्रशिक्षा प्राप्त नहीं हो पाता। कोर्स खत्म करने को ही अधिक महत्व दिया जाता है। बच्चों ने विषय को समझ लिया या नहीं, उसका अभ्यास हुआ या नहीं, इस विषय पर ध्यान नहीं दिया जाता। अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में बच्चों को दाखिला दिलाने की होड़ इसलिए बढ़ती जा रही है, क्योंकि इन्हीं स्कूलों से पढ़े बच्चे जीवन में अधिक सफल होते नजर आते हैं। अंग्रेजी माध्यम होने के कारण हर बच्चे पर दोहरा बोझ होता है- एक तो नयी भाषा सीखने और सीख कर उसे लिखने का। इसमें मां-बांप को पढ़ाना आवश्यक हो जाता है।&lt;br /&gt;बच्चों को पढ़ाते वक्त अपना बौिद्धक स्तर बच्चों से ज्यादा न रखें। अगर आप उच्च स्तर से बच्चों की कठिनाइयों को दूर करने लगेंगे, तो वह गड़बड़ा जायेगा। अत: सावधानी रखें। पढ़ाते समय बच्चे से उसकी पढ़ाई के बारे में पूछे- आज क्या पढ़ाया गया स्कूल में, उसे कौन सा पाठ या कौन सी बात समझ में नहीं आयी। इसके साथ-साथ यह भी जानने की कोशिश करें कि किसी विषय को नहीं समझ पाने के पीछे कुछ भावनात्मक कारण तो नहीं है ? कई बार भावनात्मक कारणों से भी बच्चे पढ़ने से कतराने लगते हैं। एक बार मेरी बिटिया तृप्ति गुस्से में अपने विज्ञान टीचर को कोसते हुए कह रही लगी- ``पता नही ऐसे टीचर को स्कूल में क्यों रखा जाता है? भले मैं कितना भी अच्छा पढ़-लिख लूं ,मगर परीक्षा में उनकी बेटी से कम ही नंबर मिलते हैं। इससे पढने को मन नही करता ...`` मुझे उसकी बातों ने सोचने के लिए मजबूर कर दिया। मैंने उसके स्कूल के प्रधानाचार्य से मिलकर वस्तुस्थिति पर बात की। प्रधानाचार्य ने दोनों बच्चों की कापी स्वयं चेक की और इस बार तृप्ति को सफलता मिली। यानी ऐसी समस्याओं के लिए बच्चों के टीचर और उनके प्रधानाचार्य से मिलते रहना चाहिए।&lt;br /&gt;बच्चों को नियमित रूप से पढ़ाना चाहिए इससे वह अपने पाठ को अच्छे से समझेगा। मगर ऐसा कभी न करें जो ज्यादतीपूर्ण और बच्चे के अनुकूल न हो। ऐसे अभिभावक बच्चोें को ढंग से समझााने के बजाय गुस्सा होकर मारने-पीटने लगते हैं। जिससे बच्चों का मानसिक विकास नहीं हो पाता और बच्चे की प्रतिभा कुंठित होने लगती है। अत: पढ़ाई का समय निर्धारित करते समय बच्चे की रूचि का भी ध्यान रखें। बच्चों को प्यार से पढ़ाना चाहिए। आपने यदि डांटते हुए पढ़ाना शुरू किया, तो बच्चे को आपके पास बैठने में डर लगेगा, वह सहमा रहेगा। खुलकर अपनी कठिनाइयों को बता नहीं पायेगा। इसी प्रकार यदि किसी कारण से आपका मूड ठीक नहीं है, तो उस दिन बच्चे को न पढ़ायें। अगर आप चिड़चिड़े मन से पढ़ाने लगेंगे, तो आपके मन की सारी खीज बेकसूर बच्चे पर उतरेगी।&lt;br /&gt;बच्चे के मनोबल को बनाये रखने के लिए प्रोत्साहन जरूरी है। इसलिए कठिन पाठ पढ़ाते समय उससे कहिए कि कठिन पाठ को समझने में थोड़ी कठिनाई तो होती ही है। अत: घबराने के बजाय मन लगाओ, सब समझ में आ जायेगा। आपके इस प्रकार धीरज बांधने से उसका मनोबल बना रहेगा। कुछ मांएं ऐसे समय में अपनी शान बघारने लगती हैं। पिछले दिनों ऐसी ही एक महिला से मेरी मुलाकात हुई, जो अपने बच्चे को पढ़ाते समय हमेशा कहती थीं- ``मैं तो हमेशा फस्र्ट आती थी। कोई भी पाठ एक बार में ही समझ में आ जाता था और एक तू है, एकदम बुद्धू।`` उनके लगातार इस प्रकार कहते रहने से उसकी बच्ची का आत्मविश्वास डगमगा गया।&lt;br /&gt;बच्चों को पढ़ाते समय कभी-कभी उनका दोस्त बन जाइए। आपको भी आनंद आयेगा और बच्चों को भी। कल्याणी यही करती हैं। बाजार से विभिन्न पशु-पक्षियों, फूलों, ए.बी.सी.डी. और गिनती का चार्ट और नक्शा ला कर उन्होंने एक कमरे में टांग दिया है। जब भी खाली समय मिलता है, बच्चों की रूचि के अनुसार पढ़ा देती हैं। तृप्ति और टीसू इसे एक खेल समझ कर पढ़ते रहते हैं।&lt;br /&gt;एन.सी.इ.आर.टी. के चाइल्ड स्टडी यूनिट के प्रोफेसर उपदेश बेवली का कहना है कि ``हमारी शिक्षा प्रणाली का सबसे बड़ा दोष यह है कि हम सिर्फ अंतिम लक्ष्य की प्रिाप्त को ही महत्व देते हैं, शिक्षण विधि को नही´´ आवश्यकता इस बात की है कि हम सही शिक्षण विधि अपनायें। अधिकांश अभिभावक बच्चोें को गलत ढंग से पढ़ाते है, जिससे बच्चा बिना समझे विषय को रटने की कोशिश करता है। इससे बाद में पढ़ने के प्रति अरूचि पैदा होने लगती है। बच्चों को प्रारंभिक दिनों में प्रत्यक्ष दर्शन के द्वारा सिखाना चाहिए जो कुछ भी सिखाये खेल-खेल में सिखायें ताकि उसे समझकर सीखने का अवसर मिले। अपने आस-पास के वातावरण में ही उसे बहुत सी वस्तुएं दिखा कर तमाम बातें समझायी जा सकती है। इससे बच्चे की चिंतन शक्ति का विकास होता है। अभिभावकों को चाहिए कि घर में इस तरह वातावरण बनायें, जिससे बच्चे की पढ़ने में रूचि बढ़े। इसके लिए प्रशंसा व प्रोत्साहन से बढ़ कर कोई उपाय नही है।&lt;br /&gt;रचना, आलेख एवं प्रस्तुति,&lt;br /&gt;प्रो. अिश्वनी केशरवानी&lt;br /&gt;राघव, डागा कालोनी,चांपा-495671 (छत्तीसगढ़)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-1021480782073398207?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/1021480782073398207/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=1021480782073398207' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/1021480782073398207'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/1021480782073398207'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/07/blog-post_7220.html' title='क्या सोंचते हैं हम बच्चों का रिजल्ट देखकर'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-5643968794994808072</id><published>2008-07-04T02:31:00.001-07:00</published><updated>2008-07-09T07:52:07.269-07:00</updated><title type='text'>शिवरीनारायण की रथयात्रा</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SG3zOvpzVaI/AAAAAAAAAI4/P_42kTlUQtA/s1600-h/Sheorinarayan+me+Rathyatra.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219094977827788194" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SG3zOvpzVaI/AAAAAAAAAI4/P_42kTlUQtA/s200/Sheorinarayan+me+Rathyatra.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;a href="http://rachanakar.blogspot.com/2007/06/blog-post_30.html"&gt;शिवरीनारायण की रथयात्रा&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;atomicelement id="ms__id4"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp0.blogger.com/_t-eJZb6SGWU/RoyeToK4D9I/AAAAAAAABDo/3oVbxAnh_Mk/s1600-h/sabrinarayan+mandir.JPG"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/atomicelement&gt;&lt;br /&gt;- प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;महानदी, शिवनाथ और जोंक नदी के त्रिधारा संगम के तट पर स्थित प्राचीन, प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण और ''छत्तीसगढ़ की जगन्नाथपुरी`` के नाम से विख्यात शिवरीनारायण बिलासपुर से ६४ कि. मी., राजधानी रायपुर से बलौदाबाजार से होकर १२० कि. मी., जांजगीर जिला मुख्यालय से ६० कि. मी., कोरबा जिला मुख्यालय से ११० कि. मी. और रायगढ़ जिला मुख्यालय से सारंगढ़ होकर ११० कि. मी. की दूरी पर अवस्थित है। अप्रतिम सौंदर्य और चतुर्भुजी विष्णु की मूर्तियों की अधिकता के कारण स्कंद पुराण में इसे श्री पुरूषोत्तम और श्री नारायण क्षेत्र कहा गया है। हर युग में इस नगर का अस्तित्व रहा है और सतयुग में बैकुंठपुर, त्रेतायुग में रामपुर और द्वापरयुग में विष्णुपुरी तथा नारायणपुर के नाम से विख्यात यह नगर मतंग ऋषि का गुरूकुल आश्रम और शबरी की साधना स्थली भी रहा है। भगवान श्रीराम और लक्ष्मण शबरी के जूठे बेर यहीं खाये थे और उन्हें मोक्ष प्रदान करके इस घनघोर दंडकारण्य वन में आर्य संस्कृति के बीज प्रस्फुटित किये थे। शबरी की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के &lt;span class=""&gt;लि&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SG3zOv9dJGI/AAAAAAAAAJA/-mJ77Mtttuo/s1600-h/Jagnnath+Mandir+Sheorinarayan.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219094977910219874" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SG3zOv9dJGI/AAAAAAAAAJA/-mJ77Mtttuo/s200/Jagnnath+Mandir+Sheorinarayan.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;ए&lt;/span&gt; 'शबरी-नारायण` नगर बसा है। भगवान श्रीराम का नारायणी रूप आज भी यहां गुप्त रूप से विराजमान हैं। कदाचित् इसी कारण इसे ''गुप्त तीर्थधाम`` कहा गया है। याज्ञवलक्य संहिता और रामावतार चरित्र में इसका उल्लेख है। भगवान जगन्नाथ की विग्रह मूर्तियों को यहीं से पुरी (उड़ीसा) ले जाया गया था। प्रचलित किंवदंती के अनुसार प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ यहां विराजते हैं। इस दिन उनका दर्शन मोक्षदायी होता है।&lt;br /&gt;&lt;atomicelement id="ms__id9"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp0.blogger.com/_t-eJZb6SGWU/RoyeToK4D8I/AAAAAAAABDg/axi4dudHu-U/s1600-h/jagarnathj+ji+(Small).jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/atomicelement&gt;&lt;br /&gt;स्कंद पुराण में शबरीनारायण (वर्तमान शिवरीनारायण) को ''श्रीसिंदूरगिरिक्षेत्र`` कहा गया है। प्राचीन काल में यहां शबरों का शासन था। द्वापरयुग के अंतिम चरण में श्रापवश जरा नाम के शबर के तीर से श्रीकृष्ण घायल होकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं। वैदिक रीति से उनका दाह संस्कार किया जाता है। लेकिन उनका मृत शरीर नहीं जलता। तब उस मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित कर दिया जाता है। आज भी बहुत जगह मृत शरीर के मुख को औपचारिक रूप से जलाकर समुद्र अथवा नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। इधर जरा को बहुत पश्चाताप होता है और जब उसे श्रीकृष्ण के मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित किये जाने का समाचार मिलता है तब वह तत्काल उस मृत शरीर को ले आता है और इसी श्रीसिंदूरगिरि क्षेत्र में एक जलस्रोत के किनारे बांस के पेड़ के नीचे रखकर उसकी पूजा-अर्चना करने लगा। आगे चलकर वह उसके सामने बैठकर तंत्र मंत्र की साधना करने लगा। इसी मृत शरीर को आगे चलकर ''नीलमाधव`` कहा गया। इसी नीलमाधव को १४ वीं शताब्दी के उड़िया कवि सरलादास ने पुरी में ले जाकर स्थापित करने की बात कही है। डॉ. जे. पी. सिंहदेव और डॉ. एल. पी. साहू ने ''कल्ट ऑफ जगन्नाथ`` और ''कल्चरल प्रोफाइल ऑफ साउथ कोसला`` में लिखते हैं-''भगवान नीलमाधव की मूर्ति को शबरीनारायण से पुरी लाने वाला पुरी के राजपुरोहित विद्यापति नहीं थे बल्कि उन्हें तांत्रिक इंद्रभूति ने संभल पहाड़ी की एक गुफा में ले जाकर उसके सम्मुख बैठकर तंत्र मंत्र की साधना किया करता था। यहीं उन्होंने ''वज्रयान बुद्धिज्म`` की स्थापना की। उन्होंने तिब्बत जाकर लामा सम्प्रदाय की भी स्थापना की थी। बंगाल की राजकुमारी लक्ष्मींकरा जो बाद में पटना के राजा जैलेन्द्रनाथ से विवाह की, वह इंद्रभूति की बहन थी। इंद्रभूति के वंशज तीन पीढ़ी तक नीलमाधव के सम्मुख बैठकर तंत्र मंत्र की साधना करते रहे बाद में उस मूर्ति को पुरी में ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। पहले जगन्नाथ पुरी के इस मंदिर में तांत्रिकों का कब्जा था जिसे आदि गुरू शंकराचार्य ने उनसे शास्त्रार्थ करके उनके प्रभाव से मुक्त कराया।&lt;br /&gt;इधर जरा अपने नीलमाधव को न पाकर खूब विलाप करने लगा और अन्न जल त्याग कर मृत्यु का वरण करने के लिए उद्यत हो गया तभी भगवान नीलमाधव अपने नारायणी रूप का उन्हें दर्शन कराया और यहां गुप्त रूप से विराजित होने का वरदान दिये। उन्होंने यह भी वरदान दिया कि प्रतिवर्ष माघपूर्णिमा को जो कोई मेरा दर्शन करेगा वह मोक्ष को प्राप्त कर सीधे बैकुंठधाम को जाएगा। तब से यह गुप्तधाम कहलाया। आज भी यहां भगवान नारायण का मोक्षदायी स्वरूप विद्यमान है और उनके चरण को स्पर्श करता ''रोहिणी कुंड`` विद्यमान है जिसकी महिमा अपार है। प्राचीन कवि श्री बटुकसिंह ने रोहिणी कुंड को एक धाम माना है-''रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर`` जबकि सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा ने शबरीनारायण माहात्म्य में मुक्ति पाने का एक साधन बताया है :-&lt;br /&gt;रोहिणि कुंडहि स्पर्श कर चित्रोत्पल जल न्हाय।&lt;br /&gt;योग भ्रश्ट योगी मुकति पावत पाप बहाय।।&lt;br /&gt;तथ्य चाहे जो हो, पुरी के जगन्नाथ मंदिर और शबरीनारायण मंदिर में बहुत कुछ समानता है। दोनों मंदिर तांत्रिकों के कब्जे में था जिसे क्रमश: आदि गुरू शंकराचार्य और स्वामी दयाराम दास ने शास्त्रार्थ करके तांत्रिकों के प्रभाव से मुक्त कराया। शबरीनारायण में नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों का कब्जा था। चूंकि शबरीनारायण से होकर जगन्नाथपुरी जाने का मार्ग था। पथिकों को यहां के तांत्रिक शेर बनकर डराते और अपने प्रभाव से मारकर खा जाते थे। इसलिए इस मार्ग में जाने में यात्री गण भय खाते थे। एक बार स्वामी दयाराम दास ग्वालियर से तीर्थाटन के लिए घूमते हुए रत्नपुर पहुंचे। उनकी विद्वता और पांडित्य से रत्नपुर के राजा अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें शबरीनारायण के मंदिर और मठ की व्यवस्था करने का दायित्व सौंपा। स्वामी दयाराम दास जब शबरीनारायण पहुंचे तब वहां के तांत्रिक उन्हें भी डराने के लिए शेर बनकर झपटे लेकिन ऐसा चमत्कार हुआ कि शेर के रूप में तांत्रिक उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके। बाद में तांत्रिकों के गुरू कनफड़ा बाबा के साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ जिसमें कनफड़ा बाबा को पराजय का सामना करना पड़ा और डर के मारे वे जमीन के भीतर प्रवेश कर गये। इस प्रकार शबरीनारायण के मठ और मंदिर नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों के प्रभाव से मुक्त हुआ, जगन्नाथ पुरी जाने वाले यात्रियों को तांत्रिकों के भय से मुक्ति मिली और यहां रामानंदी सम्प्रदाय के वैष्णवों का बीजारोपण हुआ। यहां के मठ के स्वामी दयाराम दास पहले महंत हुए और तब से आज तक इस वैष्णव मठ में १४ महंत हो चुके हैं जो एक से बढ़कर एक धार्मिक, अध्यात्मिक और ईश्वर भक्त हुए। उनकी प्रेरणा से अनेक मंदिर, महानदी के किनारे घाट और मंदिर की व्यवस्था के लिए जमीन दान में देकर कृतार्थ ही नहीं हुए बल्कि इस क्षेत्र में भक्ति भाव की लहर फैलाने में मदद भी की। जिस स्थान पर कनफड़ा बाबा जमीन के भीतर प्रवेश किये थे उस स्थान पर स्वामी दयाराम दास ने एक ''गांधी चौरा`` का निर्माण कराया। प्रतिवर्ष माघ शुक्ल तेरस और आश्विन शुक्ल दसमी (दशहरा) को शिवरीनारायण के महंत इस गांधी चौरा में बैठकर पूजा-अर्चना करते हैं और प्रतीकात्मक रूप से यह प्रदर्शित करते हैं कि वैष्णव सम्प्रदाय तांत्रिकों के प्रभाव से बहुत उपर है। शिवरीनारायण के दक्षिणी द्वार के एक छोटे से मंदिर के भीतर तांत्रिकों के गुरू कनफड़ा बाबा की पगड़ीधारी मूर्ति है और बस्ती के बाहर एक ''नाथ गुफा'' के नाम से एक मंदिर है जिससे इस तथ्य की पुष्टि होती है।&lt;br /&gt;शबरीनारायण में मठ के भीतर संवत् १९२७ में महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से भटगांव के जमींदार श्री राजसिंह ने जगन्नाथ मंदिर की नींव डाली जिसे उनके पुत्र श्री चंदनसिंह ने पूरा कराया और उसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की विग्रह मूर्तियों की स्थापना करायी। संवत् १९२७ में ही उन्होंने महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से महानदी के तट पर योगियों के निवासार्थ एक भवन का निर्माण कराया। इसे ''जोगीडीपा`` कहते हैं। रथयात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी यहां एक सप्ताह विश्राम करते हैं। इस कारण इसे ''जनकपुर`` भी कहा जाता है। पहले रथयात्रा में पंडित कौशलप्रसाद द्विवेदी के घर की मूर्तियों को रथ में निकाला जाता था। बाद में जब मठ की मूर्तियों को निकाला जाने लगा तब दो रथ में दोनों जगहों की मूर्तियां निकाली जाने लगी। आज केवल मठ की मूर्तियां ही रथ में निकाले जाते हैं।&lt;br /&gt;रथयात्रा यहां का एक प्रमुख त्योहार है। प्राचीन काल से यहां रथयात्रा का आयोजन मठ के द्वारा किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार महंत गौतमदास ने यहां रथयात्रा की शुरूआत की और महंत लालदास ने उसे सुव्यवस्थित किया। मठ के मुख्तियार पंडित कौशलप्रसाद तिवारी को हमेशा स्मरण किया जायेगा। उन्होंने ही यहां रामलीला, रासलीला, नाटक, रथयात्रा, और माघी मेला को सुव्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। रथयात्रा के लिए जगन्नाथ पुरी की तरह यहां भी प्रतिवर्ष लकड़ी का रथ निर्माण कराया जाता था जिसे बाद में बंद कर दिया गया और एक लोहे का रथ बनवाया गया है जिसमें आज रथयात्रा निकलती है। शिवरीनारायण और आसपास के हजारों-लाखों श्रद्धालु यहां आकर रथयात्रा में शामिल होकर और रथ खींचकर पुण्यलाभ के भागीदार होते हैं। जगह-जगह रथ को रोककर पूजा-अर्चना की जाती है। प्रसाद के रूप में नारियल, लाई और गजामूंग दिया जाता है। मेला जैसा दृश्य होता है। इस दिन को सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में बड़ा पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन बेटी को बिदा करने, बहू को लिवा लाने, नये दुकानों की शुरूआत और गृह प्रवेश जैसे महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न कराये जाते हैं। इस दिन अपने स्वजनों, परिजनों और मित्रों के घर मेवा-मिष्ठान भिजवाने की परम्परा है। बच्चे नये कपड़े पहनते हैं और उन्हें खर्च करने के लिए पैसा दिया जाता है। उनके लिए यह एक विशेष दिन होता है। सद्भाव के प्रतीक रथयात्रा आज भी यहां श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। शिवरीनारायण को ''छत्तीसगढ़ की जगन्नाथ पुरी`` कहा जाता है। राजिम में भगवान साक्षी गोपाल विराजमान हैं और ऐसी मान्यता है कि शिवरीनारायण के बाद राजिम की यात्रा और भगवान साक्षी गोपाल का दर्शन करना आवश्यक है अन्यथा उनकी यात्रा निरर्थक होता है। इसी लिए प्राचीन कवि श्री बटुसिंह शिवरीनारायण माहात्म्य में गाते हैं-&lt;br /&gt;मास अषाढ़ रथ दुतीया, रथ के किया बयान।&lt;br /&gt;दर्शन रथ को जो करे, पावे पद निर्वान ।।&lt;br /&gt;जिस प्रकार जगन्नाथ पुरी को ''स्वर्गद्वार'' कहा जाता है और कोढ़ियों का उद्धार होता है। उसी प्रकार शिवरीनारायण की भी महत्ता है। कवि बटुकसिंह श्रीशिवरीनारायण-सिंदूरगिरि माहात्म्य में लिखते हैं :-&lt;br /&gt;क्वांर कृष्णों सुदि नौमि के होत तहां स्नान।&lt;br /&gt;कोढ़िन को काया मिले निर्धन को धनवान।।&lt;br /&gt;शिवरीनारायण में बिलासपुर रोड में एक पुराना कोढ़ी खाना है और यहां एक लेप्रोसी विशेषज्ञ के रूप में डॉ. एम. एम. गौर की नियुक्ति भी हुई थी। बाद में उन्हीं के सलाह पर प्रयागप्रसाद केशरवानी चिकित्सालय की स्थापना की गयी थी। शिवरीनारायण से पांच कि.मी. की दूरी पर स्थित दुरपा गांव को अंग्रेज सरकार द्वारा ''लेप्रोसी गांव'' घोषित किया गया था। इस गांव में आना-जाना पूर्णत: प्रतिबंधित था। शिवरीनारायण से ७० कि.मी. पर चांपा में सोंठी कुष्ठ आश्रम है। इसी प्रकार बिलासपुर रायपुर रोड में बैतलपुर में भी एक कुष्ठ आश्रम है, जहां कोढ़ियों का इलाज होता है और अनेक प्रकार के उद्योग उनके द्वारा चलाये जाते हैं। उनके बच्चों के रहने और पढ़ने आदि का पूरा इंतजाम किया जाता है। सरकार इस संस्था को हर प्रकार का सहयोग प्रदान करती है। ऐसे मुक्तिधाम को पुरी क्षेत्र कहा गया है :-&lt;br /&gt;शिवरीनारायण पुरी क्षेत्र शिरोमणि जान।&lt;br /&gt;याज्ञवल्क्य व्यासादि ऋषि निजमुख करत बखान।।&lt;br /&gt;ऐसे पवित्र और तीर्थ नगर शिवरीनारायण को नारायण धाम के रूप में जाना जाता है। यहां भगवान विश्णु के चतृर्भुजी मूर्तियों की अधिकता है। यहां एक प्राचीन वैष्णव मठ भी है। कदाचित इसी कारण इसे विष्णुकांक्षी तीर्थ नगर कहा जाता है। चित्रोत्पला गंगा (महानदी) के तट पर अवस्थित शिवरीनारायण में प्राचीनता के अवशेष मिलते हैं। सभी युग में इस नगर का अस्तित्व था और इसे अनेक नामों से जाना जाता था। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा ने शिवरीनारायण माहात्म्य में लिखते हैं :-&lt;br /&gt;नारायण के कलाश्रित जानिय धामहि एक&lt;br /&gt;प्रथम विष्णुपुरि नाम पुनि रामपुरि हूं नेक&lt;br /&gt;चित्रोत्पल नदि तीर महि मंडित अति आराम&lt;br /&gt;बस्यो यहां बैकुंठपुर नारायणपुर धाम&lt;br /&gt;भासति तहं सिंदूरगिरि श्रीहरि कीन्ह निवास&lt;br /&gt;कुंड रोहिणी चरण तल भक्त अभीष्ट प्रकास।&lt;br /&gt;****-****&lt;br /&gt;रचना, लेखन एवं प्रस्तुति:&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;राघव, डागा कालोनी, चांपा-४९५६७१&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-5643968794994808072?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/5643968794994808072/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=5643968794994808072' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/5643968794994808072'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/5643968794994808072'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/07/blog-post_04.html' title='शिवरीनारायण की रथयात्रा'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp0.blogger.com/_a3axkWLu5LM/SG3zOvpzVaI/AAAAAAAAAI4/P_42kTlUQtA/s72-c/Sheorinarayan+me+Rathyatra.jpg' height='72' 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href="http://lh6.google.com/raviratlami/R0kRXXeLtEI/AAAAAAAACIY/HDr7Mqb5pSE/Ashwini%20kesharwani%20(WinCE)[6]"&gt;&lt;/a&gt;भव्य ललाट, त्रिपुंड चंदन, सघन काली मूँछें और गांधी टोपी लगाये साँवले, ठिगने व्यक्तित्व के धनी पंडित शुकलाल पांडेय छत्तीसगढ़ के द्विवेदी युगीन साहित्यकारों में से एक थे.. और पंडित प्रहलाद दुबे, पंडित अनंतराम पांडेय, पंडित मेदिनीप्रसाद पांडेय, पंडित मालिकराम भोगहा, पंडित हीराराम त्रिपाठी, गोविंदसाव, पंडित पुरूषोत्तम प्रसाद पांडेय, वेदनाथ शर्मा, बटुकसिंह चौहान, पंडित लोचनप्रसाद पांडेय, काव्योपाध्याय हीरालाल, पंडित सुंदरलाल शर्मा, राजा चक्रधरसिंह, डॉ. बल्देवप्रसाद मिश्र और पंडित मुकुटधर पांडेय की श्रृंखला में एक पूर्ण साहित्यिक व्यक्ति थे। वे केवल एक व्यक्ति ही नहीं बल्कि एक संस्था थे। उन्होंने संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू और छत्तीसगढ़ी भाषा में बहुत सी रचनाएं लिखीं हैं। उनकी कुछ रचनाएं जैसे छत्तीसगढ़ गौरव, मैथिली मंगल, छत्तीसगढ़ी भूल भुलैया ही प्रकाशित हो सकी हैं और उनकी अधिकांश रचनाएं अप्रकाशित हैं। उनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ियापन की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है। छत्तीसगढ़ गौरव में ''हमर देस'' की एक बानगी देखिये :-&lt;br /&gt;ये हमर देस छत्तिसगढ़ आगू रहिस जगत सिरमौर।&lt;br /&gt;दक्खिन कौसल नांव रहिस है मुलुक मुलुक मां सोर।&lt;br /&gt;रामचंद सीता अउ लछिमन, पिता हुकुम से बिहरिन बन बन।&lt;br /&gt;हमर देस मां आ तीनों झन, रतनपुर के रामटेकरी मां करे रहिन है ठौर॥&lt;br /&gt;घुमिन इहां औ ऐती ओती, फैलिय पद रज चारो कोती।&lt;br /&gt;यही हमर बढ़िया है बपौती, आ देवता इहां औ रज ला आंजे नैन निटोर॥&lt;br /&gt;राम के महतारी कौसिल्या, इहें के राजा के है बिटिया।&lt;br /&gt;हमर भाग कैसन है बढ़िया, इहें हमर भगवान राम के कभू रहिस ममिओर॥&lt;br /&gt;इहें रहिन मोरध्वज दानी, सुत सिर चीरिन राजा-रानी।&lt;br /&gt;कृष्ण प्रसन्न होइन बरदानी, बरसा फूल करे लागिन सब देवता जय जय सोर॥&lt;br /&gt;रहिन कामधेनु सब गैया, भर देवै हो लाला ! भैया !!&lt;br /&gt;मस्त रहे खा लोग लुगैया, दुध दही घी के नदी बोहावै गली गली अउ खोर॥&lt;br /&gt;सबो रहिन है अति सतवादी, दुध दही भात खा पहिरै खादी।&lt;br /&gt;धरम सत इमान के रहिन है आदी, चाहे लाख साख हो जावै बनिन नी लबरा चोर॥&lt;br /&gt;पगड़ी मुकुट बारी के कुंडल, चोंगी बंसरी पनही पेजल।&lt;br /&gt;चिखला बुंदकी अंगराग मल, कृष्ण-कृषक सब करत रहिन है गली गली मां अंजोर॥&lt;br /&gt;''छत्तीसगढ़ी भूल भुलैया'' जो ''कॉमेडी ऑफ इरर'' का अंग्रेजी अनुवाद है, की भूमिका में पांडेय जी छत्तीसगढ़ी दानलीला के रचियता पंडित सुन्दरलाल शर्मा के प्रति आभार व्यक्त करते हुए छत्तीसगढ़ी में लिखने का आह्वान करते हैं। उस समय पढ़ाई के प्रति इतनी अरूचि थी कि लोग पेपर और पुस्तक भी नहीं पढ़ते थे। पांडेय जी तब की बात को इस प्रकार व्यक्त करते हैं- ''हाय ! कतेक दुख के बात अय ! कोन्हो लैका हर कछू किताब पढ़े के चिभिक करे लागथे तो ओखर ददा-दाई मन ओला गारी देथे अउ मारपीट के ओ बिचारा के अतेक अच्छा अअउ हित करैया सुभाव ला नष्ट कर देथे। येकरे बर कहेबर परथे कि इहां के दसा निचट हीन हावै। इहां के रहवैया मन के किताब अउ अखबार पढ़के ज्ञान अउ उपदेस सीखे बर कोन्नो कहे तो ओमन कइथे-&lt;br /&gt;हमन नइ होवन पंडित-संडित तहीं पढ़ेकर आग लुवाट।&lt;br /&gt;ले किताब अउ गजट सजट ला जीभ लमा के तईहर चाट॥&lt;br /&gt;जनम के हम तो नांगर जोत्ता नई जानन सोरा सतरा।&lt;br /&gt;भुखा भैंसा ता ! ता ! ता !! यही हमर पोथी पतरा !!!&lt;br /&gt;''भूल भुलैया'' सन् 1918 में लिखा गया था तब हिन्दी में पढ़ना लिखना हेय समझा जाता था। पंडित शुकलाल पांडेय अपनी पीड़ा को कुछ इस प्रकार व्यक्त करते हैं-''जबले छत्तिसगढ़ के रहवैया मन ला हिन्दी बर प्रेम नई होवे, अउ जबले ओमन हिन्दी के पुस्तक से फायदा उठाय लाइ नई हो जावे, तबले उकरे बोली छत्तीसगढ़ीच हर उनकर सहायक है। येकरे खातिर छत्तीसगढ़ी बोली मां लिखे किताब हर निरादर करे के चीज नो हे। अउ येकरे बर छत्तीसगढ़ी बोली मां छत्तीसगढिया भाई मन के पास बडे बड़े महात्मा मन के अच्छा अच्छा बात के संदेसा ला पहुंचाए हर अच्छा दिखतय। हिन्दी बोली के आछत छत्तीसगढ़ी भाई मन बर छत्तीसगढ़ी बोली मां ये किताब ला लिखे के येही मतलब है कि एक तो छत्तीसगढ़ ला उहां के लैका, जवान, सियान, डौका डौकी सबो कोनो समझही अउ दूसर, उहां के पढ़े लिखे आदमीमन ये किताब ला पढ़के हिन्दी के किताब बांच के अच्छा अच्छा सिक्षा लेहे के चिभिक वाला हो जाही। बस, अइसन होही तो मोर मिहनत हर सुफल हो जाही...'' वे आगे लिखते हैं- ''मैं हर राजिम (चंदसूर) के पंडित सुन्दरलाल जी त्रिपाठी ला जतके धन्यवाद देवौं, ओतके थोरे हे। उनकर छत्तीसगढ़ी दानलीला ला जबले इहां के पढ़ैया लिखैया आदमी मन पढ़े लागिन हे, तब ले ओमन किताब पढ़े मा का सवाद मिलथे अउ ओमा का सार होथे, ये बात ला धीरे धीरे जाने लगे हावै। येही ला देख के मैं हर विलायत देस के जग जाहीर कवि शेक्सपियर के लिखे ''कॉमेडी ऑफ इरर'' के अनुवाद ल ''भूल भुलैया'' के कथा छत्तीसगढ़ी बोली के पद्य मां लिख डारे हावौं।''&lt;br /&gt;पंडित शुकलाल पांडेय के शिक्षकीय जीवन में उनकी माता का जितना आदर रहा है उतना ही धमधा के हेड मास्टर पंडित भीषमलाल मिश्र का भी था। भूल भुलैया को उन्हीं को समर्पित करते हुए वे लिखते हैं :-&lt;br /&gt;तुहंला है भूल भुलैया नीचट प्यारा।&lt;br /&gt;लेवा महराज येला अब स्वीकारा॥&lt;br /&gt;भगवान भगत के पूजा फूल के साही।&lt;br /&gt;भीलनी भील के कंदमूल के साही॥&lt;br /&gt;निरधनी सुदामा के जो चाउर साही।&lt;br /&gt;सबरी के पक्का पक्का बोइर खाई॥&lt;br /&gt;कुछ उना गुना झन, हाथ ल अपन पसारा।&lt;br /&gt;लेवा महराज, येला अब स्वीकारा॥&lt;br /&gt;ऐसे प्रतिभाशाली कवि प्रवर पंडित शुकलाल पांडेय का जन्म महानदी के तट पर स्थित कला, साहित्य और संस्कार की त्रिवेणी शिवरीनारायण में संवत् 1942 (सन् 1885) में आषाढ़ मास में हुआ था। उनके पिता का नाम गोविंदहरि और माता का नाम मानमति था। मैथिली मंगल खंडकाव्य में वे लिखते हैं :-&lt;br /&gt;प्रभुवर पदांकित विवुध वंदित भरत भूमि ललाम को,&lt;br /&gt;निज जन्मदाता सौरिनारायण सुनामक ग्राम को।&lt;br /&gt;श्री मानमति मां को, पिता गोविंदहरि गुणधाम को,&lt;br /&gt;अर्पण नमन रूपी सुमन हो गुरू प्रवर शिवराम को॥&lt;br /&gt;उनका लालन पालन और प्राथमिक शिक्षा शिवरीनारायण के धार्मिक और साहित्यिक वातावरण में धर्मशीला माता के सानिघ्य में हुआ। उनके शिक्षक पं. शिवराम दुबे ने एक बार कहा था-''बच्चा, तू एक दिन महान कवि बनेगा...।'' उनके आशीर्वाद से कालांतर में वह एक उच्च कोटि का साहित्यकार बना।&lt;br /&gt;सन् 1903 में नार्मल स्कूल रायपुर में प्रशिक्षण प्राप्त कर वे शिक्षक बने। यहां उन्हें खड़ी बोली के सुकवि पं. कामताप्रसाद गुरू का सानिघ्य मिला। उनकी प्रेरणा से वे खड़ी बोली में पद्य रचना करने लगे। धीरे धीरे उनकी रचना स्वदेश बांधव, नागरी प्रचारिणी, हितकारिणी, सरस्वती, मर्यादा, मनोरंजन, शारदा, प्रभा आदि प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी। सन् 1913 में सरस्वती के मई के अंक में ''प्राचीन भारत वर्ष'' शीर्षक से उनकी एक कविता प्रकाशित हुई। तब पूरे देश में राष्ट्रीय जनजागरण कोर् कत्तव्य माना जाता था। देखिये उनकी एक कविता :-&lt;br /&gt;हे बने विलासी भारतवासी छाई जड़ता नींद इन्हें,&lt;br /&gt;हर कर इनका तम हे पुरूषोत्तम शीघ्र जगाओ ईश उन्हें।&lt;br /&gt;पंडित जी मूलत: कवि थे। उनकी गद्य रचना में पद्य का बोध होता है। इन्होंने अन्यान्य पुस्तकें लिखी हैं। लेकिन केवल 15 पुस्तकें ही प्रकाश में आ सकी हैं, जिनमें 12 पद्य में और शेष गद्य में है। उनकी रचनाओं में मैथिली मंगल, छत्तीसगढ़ गौरव, पद्य पंचायत, बाल पद्य पीयुष, बाल शिक्षा पहेली, अभिज्ञान मुकुर वर्णाक्षरी, नैषद काव्य और उर्दू मुशायरा प्रमुख है। छत्तीसगढ़ी में उन्होंने भूल भुलैया, गींया और छत्तीसगढ़ी ग्राम गीत लिखा है। गद्य में उन्होंने राष्ट्र भक्ति से युक्त नाटक मातृमिलन, हास्य व्यंग्य परिहास पाचक, ऐतिहासिक लेखों का संग्रह, चतुर चितरंजन आदि प्रमुख है। उनकी अधिकांश रचनाएं अप्रकाशित हैं और उनके पौत्र श्री रमेश पांडेय और श्री किशोर पांडेय के पास सुरक्षित है।&lt;br /&gt;''छत्तीसगढ़ गौरव'' पंडित शुकलाल पांडेय की प्रकाशित अनमोल कृति है। मध्यप्रदेश साहित्य परिषद भोपाल द्वारा सन् 1972 में इसे प्रकाशित किया गया है। इसकी भूमिका में पंडित मुकुटधर जी पांडेय लिखते हैं:-'' इसमें छत्तीसगढ़ के इतिहास की शृंखलाबद्ध झांकी देखने को मिलती है। प्राचीन काल में यह भूभाग कितना प्राचुर्य पूर्ण था, यहां के निवासी कैसे मनस्वी और चरित्रवान थे, इसका प्रमाण है। छत्तीसगढ़ की विशेषताओं का इसे दर्पण कहा जा सेता है। इसकी गणना एक उच्च कोटि के आंचलिक साहित्य में की जा सकती है। ''हमर देस'' में छत्तीसगढ़ के जन जीवन की जीवन्त झांकी उन्होंने प्रस्तुत की है। देखिये उनकी यह कविता :-&lt;br /&gt;रहिस कोनो रोटी के खरिया, कोनो तेल के, कोनो वस्त्र के, कोनो साग के और,&lt;br /&gt;सबे जिनिस उपजात रहिन है, ककरों मा नई तकत रहिन है।&lt;br /&gt;निचट मजा मा रहत रहिन है, बेटा पतो, डौकी लैका रहत रहिन इक ठौर।&lt;br /&gt;अतिथि अभ्यागत कोन्नो आवें, घर माटी के सुपेती पावे।&lt;br /&gt;हलवा पूरी भोग लगावें, दूध दही घी अउ गूर मा ओला देंव चिभोर।&lt;br /&gt;तिरिया जल्दी उठेनी सोवे, चम्मर घम्मर मही विलोवे,&lt;br /&gt;चरखा काते रोटी पावे, खाये किसान खेत दिशि जावे चोंगी माखुर जोर।&lt;br /&gt;धर रोटी मुर्रा अउ पानी, खेत मा जाय किसान के रानी।&lt;br /&gt;खेत ल नींदे कहत कहानी, जात रहिन फेर घर मा पहिरे लुगरा लहर पटोर।&lt;br /&gt;चिबक हथौरी नरियर फोरे, मछरी ला तीतुर कर डारैं।&lt;br /&gt;बिन आगी आगी उपजारैं, अंगुरि गवा मा चिबक सुपारी देवें गवें मा फोर।&lt;br /&gt;रहिस गुपल्ला वीर इहें ला, लोहा के भारी खंभा ला।&lt;br /&gt;डारिस टोर उखाड़ गड़े ला, दिल्ली के दरबार मा होगे सनासट सब ओर।&lt;br /&gt;आंखी, कांन पोंछ के ननकू, पढ़ इतिहास सुना संगवारी तब तैं पावे सोर।&lt;br /&gt;जब मध्यप्रदेश का गठन हुआ तब सी.पी. के हिन्दी भाषी जिलों में छत्तीसगढ़ के जिले भी सम्मिलित थे। छत्तीसगढ़ गौरव के इस पद्य में छत्तीसगढ़ का इतिहास झलकता है :-&lt;br /&gt;सी.पी. हिन्दी जिले प्रकृति के महाराम से,&lt;br /&gt;थे अति पहिले ख्यात् महाकान्तार नाम से।&lt;br /&gt;रामायण कालीन दण्डकारण्य नाम था।&lt;br /&gt;वन पर्वत से ढका बड़ा नयनाभिराम था।&lt;br /&gt;पुनि चेदि नाम विख्यात्, फिर नाम गोड़वाना हुआ।&lt;br /&gt;कहलाता मध्यप्रदेश अब खेल चुका अगणित जुआ॥&lt;br /&gt;तब छत्तीसगढ़ की सीमा का विस्तार कुछ इस प्रकार था :-&lt;br /&gt;उत्तर दिशि में है बघेल भू करता चुम्बन,&lt;br /&gt;यम दिशि गोदावरी कर पद प्रक्षालन।&lt;br /&gt;पूर्व दिशा की ओर उड़ीसा गुणागार है,&lt;br /&gt;तथा उदार बिहार प्रान्त करता बिहार है।&lt;br /&gt;भंडारा बालाघाट औ चांदा मंडला चतुर गण,&lt;br /&gt;पश्चिम निशि दिन कर रहे आलिंगन हो मुदित मन॥&lt;br /&gt;ऐसे सुरक्षित छत्तीसगढ़ राज्य में अनेक राजवंश के राजा-महाराजाओं को एकछत्र राज्य वर्षो तक था। कवि अपनी कृति इनका बड़ा ही सजीव चित्रण किया है। देखिये उसकी एक बानगी :-&lt;br /&gt;यहां सगर वंशीय प्रशंसी, कश्यप वंशी,&lt;br /&gt;हैहहवंशी बली, पांडुवंशी अरिध्वंशी,&lt;br /&gt;राजर्षितुल्यवंशीय, मौर्यवंशी सुख वर्ध्दन,&lt;br /&gt;शुंगकुल प्रसू वीर, कण्ववंशी रिपु मर्दन,&lt;br /&gt;रणधीर वकाटक गण कुलज, आंध्र कुलोद्भव विक्रमी।&lt;br /&gt;अति सूर गुप्तवंशी हुए बहुत नृपति पराक्रमी॥&lt;br /&gt;था डाहल नाम पश्चिम चेदि का।&lt;br /&gt;यहीं रहीं उत्थान शौर्य की राष्ट्र वेदिका।&lt;br /&gt;उसकी अति ही रन्ध्र राजधानी त्रिपुरी थी।&lt;br /&gt;वैभव में, सुषमा में, मानों अमर पुरी थी।&lt;br /&gt;रघुवंश नृपतियों से हुआ गौरवमय साकेत क्यों।&lt;br /&gt;त्रिपुरी नरपतियों से हुई त्रिपुरी भी प्रख्यात् त्यों॥&lt;br /&gt;कहलाती थी पूर्व चेदि ही ''दक्षिण कोसल''&lt;br /&gt;गढ़ थे दृढ़ छत्तीस नृपों की यहीं महाबल।&lt;br /&gt;इसीलिए तो नाम पड़ा ''छत्तीसगढ़'' इसका।&lt;br /&gt;जैसा इसका भाग्य जगा, जगा त्यों किसका।&lt;br /&gt;श्रीपुर, भांदक औ रत्नपुर थे, इसकी राजधानियां।&lt;br /&gt;चेरी थी श्री औ शारदा दोनों ही महारानियां॥&lt;br /&gt;नदियां तो पुण्यतोया, पुण्यदायिनी और मोक्षदायी होती ही हैं, जीवन दायिनी भी हैं। कदाचित् इसीलिए नदियों के तट पर बसे नगर ''प्रयाग'' और ''काशी'' जैसे संबोधनों से पूजे जाते हैं। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ में महानदी के तट पर स्थित अनेक नगर स्थित हैं जिन्हें ऐसे संबोधनों से सुशोभित किये जाते हैं। देखिये कवि की एक बानगी :-&lt;br /&gt;हरदी है हरिद्वार, कानपुर श्रीपुर ही है।&lt;br /&gt;राजिम क्षेत्र प्रयाग, शौरिपुर ही काशी है।&lt;br /&gt;शशिपुर नगर चुनार, पद्मपुर ही पटना है।&lt;br /&gt;कलकत्ता सा कटक निकट तब बसा घना है।&lt;br /&gt;गाती मुस्काती नाचती और झूमती जा रही,&lt;br /&gt;हे महानदी ! तू सुरनदी की है समता पा रही॥&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में इतना मनमोहक दृश्य हैं तो यहां कवि कैसे नहीं होंगे ? भारतेन्दु युगीन और उससे भी प्राचीन कवि यहां रहे हैं जो प्रचार और प्रचार के अभाव में गुमनाम होकर मर खप गये...आज उसका नाम लेने वाला कोई नहीं है। ऐसी कवियों के नाम कवि ने गिनायें हैं :-&lt;br /&gt;नारायण, गोपाल मिश्र, माखन, दलगंजन।&lt;br /&gt;बख्तावर, प्रहलाद दुबे, रेवा, जगमोहन।&lt;br /&gt;हीरा, गोविंद, उमराव, विज्ञपति, भोरा रघुवर।&lt;br /&gt;विष्णुपुरी, दृगपाल, साव गोविंद ब्रज गिरधर।&lt;br /&gt;विश्वनाथ, बिसाहू, उमर, नृप लक्ष्मण छत्तीस कोट कवि।&lt;br /&gt;हो चुके दिवंगत ये सभी प्रेम मीर मालिक सुकवि॥&lt;br /&gt;तेजनाथ भगवान, मुहम्मद खान मनस्वी।&lt;br /&gt;बाबू हीरालाल, केशवानंद यशस्वी।&lt;br /&gt;श्री शिवराज, शिवशंकर, ईश्वर प्रसाद वर।&lt;br /&gt;मधु मंगल, माधवराव औ रामाराव चिंचोलकर।&lt;br /&gt;इत्यादिक लेखक हो चुके छत्तीसगढ़ की भूमि पर॥&lt;br /&gt;''धान का कटोरा'' कहलाता है हमारा छत्तीसगढ़। यहां की भूमि जितनी उर्वर है, उतना ही यहां के लोग मेहनती भी हैं। इसीलिये यहां के मेला-मड़ई और तीज त्योहार सब कृषि पर आधारित हैं। अन्न की देवी मां अन्नपूर्णा भी यहीं हैं। कवि का एक पद्य पेश है :-&lt;br /&gt;डुहारती थी धान वहन कर वह टुकनों में।&lt;br /&gt;पीड़ा होती थी न तनिक सी भी घुटनों में ।&lt;br /&gt;पति बोते थे धान, सोचते बरसे पानी।&lt;br /&gt;लखती थी वह बनी अन्नपूर्णा छवि खानी।&lt;br /&gt;खेतों में अच्छी फसल हुई है। मेहनती स्त्रियां टुकनों में भरकर धान खलिहानों से लाकर ढाबा में भर देती हैं। उनका मन बड़ा प्रसन्न है, तो संध्या में सब मिलकर नाच-गाना क्यों न हो, जीवन का रस भी तो इसी में होता है :-&lt;br /&gt;संध्या आगम देख शीघ्र कृषि कारक दम्पत्ति।&lt;br /&gt;जाते थे गृह और यथाक्रम अनुपद सम्पत्ति।&lt;br /&gt;कृषक किशोर तथा किशोरियां युवक युवतीगण।&lt;br /&gt;अंग अंग में सजे वन्य कुसुमावलि भूषण।&lt;br /&gt;जाते स्वग्राम दिशि विहंसते गाते गीत प्रमोद से।&lt;br /&gt;होते द्रुत श्रमजीवी सुखी गायन-हास विनोद से॥&lt;br /&gt;पंडित जी ऐसे मेहनती कृषकों को देव तुल्य मानने में कोई संकोच नहीं करते और कहते हैं :-&lt;br /&gt;हे वंदनीय कृषिकार गण ! तुम भगवान समान हो।&lt;br /&gt;इस जगती तल पर बस तुमही खुद अपने उपमान हो॥&lt;br /&gt;इस पवित्र भूमि पर अनेक राजवंशों के राजा शासन किये लेकिन त्रिपुरी के हैहहवंशी नरेश के ज्येष्ठ पुत्र रत्नदेव ने देवी महामाया के आशीर्वाद से रत्नपुर राज्य की नींव डाली।&lt;br /&gt;हैहहवंशी कौणपादि थे परम प्रतापी।&lt;br /&gt;किये अठारह अश्वमेघ मख धरती कांपी।&lt;br /&gt;उनके सुत सुप्तसुम्न नाम बलवान हुये थे।&lt;br /&gt;रेवा तट अश्वमेघ यज्ञ छ: बार किये थे।&lt;br /&gt;श्री कौणपादि निज समय में महाबली नरपति हुये।&lt;br /&gt;सबसे पहिले ये ही सखे ! छत्तीसगढ़ अधिपति हुए॥&lt;br /&gt;बरसों तक रत्नपुर नरेशों ने इस भूमि पर निष्कंटक राज्य किया। अनेक जगहों में मंदिर, सरोवर, आम्रवन, बाग-बगीचा और सुंदर महल बनवाये...अनेक नगर बसाये और उनकी व्यवस्था के लिये अनेक माफी गांव दान में दिये। अपने वंशजों को यहां के अनेक गढ़ों के मंडलाधीश बनाये। आगे चलकर इनके वंशज शिवनाथ नदी के उत्तर और दक्षिण में 18-18 गढ़ के अधिपति हुये और समूचा क्षेत्र ''36 गढ़'' कहलाया। सुविधा की दृष्टि से रायपुर रत्नपुर से ज्यादा उपयुक्त समझा गया और अंग्रेजों ने मुख्यालय रायपुर स्थानांतरित कर दिया। तब से रत्नपुर का वैभव क्रमश: लुप्त होता गया।&lt;br /&gt;रत्नपुर से गई रायपुर उठ राजधानी।&lt;br /&gt;सूबा उनके लगे वहीं रहने अति ज्ञानी।&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ के पूर्व वही सूबा थे शासक।&lt;br /&gt;शांति विकासक तथा दुख औ भीति विनाशक।&lt;br /&gt;आज जब छत्तीसगढ़ राज्य पृथक अस्तित्व में आ गया है तब सबसे पहिले कृषि प्रधान उद्योगों को विकसित किया जाना चाहिये अन्यथा धान तो नहीं उगेगा बल्कि हमारे हाथ में केवल कटोरा होगा...?&lt;br /&gt;----------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रचना, आलेख एवं प्रस्तुति,&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;राघव, डागा कालोनी, चांपा (छ. ग.)&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-3612504554797681721?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/3612504554797681721/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' 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साहित्यकारों में पं. प्रहलाद दुबे (सारंगढ़), पं. अनंतराम पांडेय (रायगढ़), पं. मेदिनीप्रसाद पांडेय (परसापाली-रायगढ़),पं. वेदनाथ शर्मा (बलौदा), पं. मालिकराम भोगहा, पं. हीराराम त्रिपाठी, गोविंदसाव, (सभी शिवरीनारायण), बटुकसिंह चैहान (कुथुर-पामगढ़), पं. पुरूषोत्तम प्रसाद पांडेय (बालपुर), और नरसिंहदास वैष्णव आदि के नाम प्रमुखता से लिये जा सकते हैं। भारतेन्दु युगीन साहित्यकारों में इनके नामोल्लेख नहीं होने के बारे में प्रो.. रामनारायण शुक्ल की टिप्पणी सटिक लगती है ः- ‘‘छत्तीसगढ़ के अनेक समर्थ कवि और साहित्यकार आज तक अनजाने हैं और उपेक्षित भी। इनके प्रमुख कारणों में हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखकों का उत्तर प्रदेश का निवासी होना है। ऐसा भी हो सकता है कि उन्हें छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों की रचनाएं पढ़ने को न मिली हो और उनका नामोल्लेख नहीं किया जा सका हो ?‘‘ आज ऐसे समर्थ रचनाकारों की आवश्यकता है जो उस काल के गुमनाम साहित्यकारों की रचनाओं को खोज निकालें और प्रकाश में लाने का सद्कार्य कर सकें। यहां के विश्वविद्यालयों में भी ऐसे साहित्यकारों के उपर शोध कार्य कराया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;महानदी घाटी का साहित्यिक परिवेश उल्लेखनीय है। क्योंकि महानदी के तटवर्ती नगरों जैसे शिवरीनारायण, खरौद, बालपुर, रायगढ़, सारंगढ़, राजिम, धमतरी, रायपुर, बिलासपुर और रतनपुर में ऐसे लब्ध प्रतिष्ठ साहित्य मनीषियों का जन्म हुआ और उनकी लेखनी से छत्तीसगढ़ की धरा पवित्र हुई। यहां के बिखरे साहित्यकारों को एक सूत्र में पिरोकर लेखन की एक नई दिशा देने का सद्कार्य शिवरीनारायण के तत्कालीन तहसीलदार और सुप्रसिद्ध भारतेन्दु कालीन कवि और आलोचक ठाकुर जगमोहनसिंह ने किया। वे भारतेन्दु हरिश्चंद्र के सहपाठी थे। ‘‘मेघदूत‘‘ के अनुवाद में उन्होंने भारतेन्दु की सहायता ली थी। उनकी रचनाओं में भारतेन्दु का स्पष्ट प्रभाव देखने को मिलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में कई स्थानों पर भारतेन्दु की कविताओं को उधृत किया है। ‘‘श्यामास्वप्न‘‘ में तो श्यामसुन्दर भारतेन्दु का बड़ा ही घनिष्ठ मित्र जान पड़ता है। ऐसे साहित्यकार के सानिघ्य में छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों ने यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को दोहन कर अपनी रचनाओं में समेटने का प्रयास किया है। उन्हीं में से एक जन्मांध कवि श्री नरसिंहदास वैष्णव भी हैं।&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ प्रदेश के जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत ग्राम तुलसी में शिवायन, अथ जानकी माय हित विनय और नरसिंह चौंतीसा का सृजन करने वाले जन्मांध कवि श्री नरसिंहदास वैष्णव का रचना संसार साहित्यिक जगत के लिए अपरिचित है। उनकी रचनाओं में तुलसी, सूर और मीरा का स्पष्ट प्रभाव देखने को मिलता है। जन्म से ही वे अंधे तो थे ही, लेकिन मन की आंखों से उन्होंने देवताओं का श्रृंगारिक वर्णन बड़े अद्भुत ढंग से किया है। उन्हें ‘‘छत्तीसगढ़ का सूरदास‘‘ कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। ऐसे भक्त कवि का जन्म जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत ग्राम घिवरा में संवत् 1927 को हुआ। इनकी माता का नाम देवकी और पिता का नाम पिताम्बरदास था। वे स्वयं लिखते हैं ः-&lt;br /&gt;पिता पितांबरदास पद बन्दौ सहित सनेह।&lt;br /&gt;बन्दौ देवकि मातु पद जिन पालेऊ यह देह।।&lt;br /&gt;बचपन से ही उनमें भक्ति भाव समाया हुआ था। माता पिता के भक्ति का संस्कार उनमें कूट कूटकर भरी थी। वे अपने माता पिता के साथ अक्सर शिवरीनारायण जाया करते थे। अतः उनमें महानदी के पवित्र संस्कार भी पड़े। यहां का साहित्यिक परिवेश और भक्तिमय वातावरण से उनकी जीवनधारा ही बदल गयी और वे यहीं रहकर काव्य रचना करने लगे। शिवरीनारायण में वैरागियों का एक वैष्णव मठ है जहां श्री बलरामदास वैरागी रहते थे। उनकी ही प्रेरणा से उनका जीवन भक्तिमय हुआ और वे आजीवन ब्रह्मचर्य रहने का व्रत लेकर राममय होकर काव्य रचना करने लगे। एक प्रकार से बलरामदास उनके गुरू हैं। उन्होंने अपने काव्यों में लिखा है ः-&lt;br /&gt;गुरू बलरामदास बैरागी, राम उपासि परम बड़भागी।&lt;br /&gt;दीन्हें राम मंत्र महराजा, जो है सकल मंत्र सिरताजा।।&lt;br /&gt;वे हमेशा श्रीरामचंद्र जी की भक्ति में लीन रहे और अपने वैराग्यपूर्ण जीवन की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते रहे। देखिए उनका एक काव्य ः-&lt;br /&gt;कवि सागर अधधार जल क्रोध लोभ मद काम।&lt;br /&gt;डूबत नरसिंहदास को खैचहुं जानकिराम।।&lt;br /&gt;...और वह अवसर आ ही गया जब उनके वैराग्यमय जीवन को खतरा हो गया। उनके माता-पिता उनकी शादी करना चाहते थे। उनके बहुत अनुनय विनय करने के बाद भी जब उनके माता-पिता उनकी शादी करने पर अड़े रहे तब एक दिन सबको रोते बिलखते छोड़कर वे तुलसी आ गये। यहां के मालगुजार पं. रामलाल शुक्ल अपनी सादगी, दानवृत्ति और आतिथ्य प्रेम के लिए जग प्रसिद्ध थे। नरसिंहदास उन्हीं की शरण में चले गये और वहां वे आजीवन रहे। वे लिखते हैं ः-&lt;br /&gt;पुत्र पिताम्बरदास के, नरसिंहदास है नाम।&lt;br /&gt;जन्मभूमि घिवरा तजे, बसे तुलसी ग्राम।।&lt;br /&gt;यह कहना ज्यादा उचित होगा कि श्री नरसिंहदास तुलसी में आकर भक्ति भाव में लीन हो गये। यहां रहकर उन्होंने अनेक काव्यों की रचना की। एक प्रकार से तुलसी उनकी कार्यस्थली है। ईश्वर से वे हमेशा प्रार्थना किया करते थे ः-&lt;br /&gt;नारायण शर भीषम मारे। मोर भीम प्रभु आपु उबारे।&lt;br /&gt;नरसिंह दास शरण हैं तोर। तुम बिन राम सुनैको मेरे।।&lt;br /&gt;नरसिंहदास शिवरीनारायण और खरौद क्षेत्र में घूम घूमकर श्रीरामचरितमानस का गायन करते थे। वे हमेशा श्रीरामचरितमानस का परायण करने और साधु संतों की संगति प्राप्त कर उनसे राम भक्ति की उपलब्धियों को प्राप्त करने के लिये प्रयत्नशील रहे। इस हेतु वे तीर्थाटन भी किये। यात्राओं और तीर्थाटन से उन्हें जगत और जीवन का व्यापक अनुभव हुआ। उनकी उडि़या रचना तो अनुभवों का सुन्दर पिटारा है। अन्य रचनाओं में भी जीवन के अनुभवों को बड़ी सुन्दरता से उन्होंने व्यक्त किया है। कलिकाल का वर्णन आज की स्थिति का सजीव और मार्मिक चित्रण है। फिर भी नरसिंहदास का मन गोस्वामी तुलसीदास की अमृतमयी मानस रचना में अधिक रमता है। उन्हें श्रीरामचरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली और दोहावली कंटस्थ था। मानस की पंक्तियां और विनय पत्रिका के पद को वे बड़ी श्रद्धा और भक्ति से गाया करते थे। अपनी निरक्षरता और ज्ञान के बारे में उन्होंने बड़ी विनम्रता से कहा है कि मैं कोई बड़ा भक्त नहीं हूं। अंधा, मंद बुद्धि और पाप परायण हूं, निरक्षर हूं और पिंगलशास्त्र थोड़ा भी नहीं पढ़ा हूं। मैं जो कुछ भी जानता हूं वह सीताराम का ही प्रसाद है ः-&lt;br /&gt;पिंगलशास्त्र न पढ़ेऊ कछु, निरक्षर अथ धाम।&lt;br /&gt;अंध मंदमति मूढ़ हों, जानत जानकिराम ।।&lt;br /&gt;नरसिंहदास अत्यंत विनीत, संतोषी, सहिष्णु और गंभीर प्रकृति के थे। उनका मन श्रीराम के चरणों में ही रमा रहता था। वे अंतर्मुखी और आत्म परिष्कार का सतत् प्रयास करते थे। वे पापों से डरते थे और आत्म रक्षा के लिये प्रभु श्रीराम से प्रार्थना करते थे ः-&lt;br /&gt;राम के भक्त कहाइ छलौंजग, वंचक वेष बनाइ लिया।&lt;br /&gt;किंकर काम के, कोह के, कंचन लोभ के कारण चित्त दिया।&lt;br /&gt;नरसिंहदास कहै जग वंचक में, मोहि पामर मुख्य कली ने किया।&lt;br /&gt;धिक है, धिक है, धिक है हमको जो जिवौं जग में बिनु रामसिया।&lt;br /&gt;जन्मांध नरसिंहदास तुलसीदास और सूरदास की कोटि के भक्त थे। मीरा की सहजता भी उनके काव्यों में देखी जा सकती है। इस प्रकार भक्त नरसिंहदास के काव्यों में तुलसी का आत्म समर्पण, सूर का आत्म स्मरण और मीरा का आत्म सायुज्य दिखाई देता है। तुलसी ग्राम में पं. रामलाल शुक्ल और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती जानकी देवी उनसे प्रतिदिन श्रीरामचरितमानस सुना करते थे। आगे चलकर भक्त नरसिंहदास जानकी माई के हितार्थ ‘‘जानकी माई हित विनय‘‘ की रचना किये। जानकी देवी उन्हें अपना गुरू मानती थी। लेकिन इसके बावजूद नरसिंहदास उन्हें ‘‘माई‘‘ ही कहा करते थे ः-&lt;br /&gt;जानकि माई हेतु, विनय रचैं सियराम के।&lt;br /&gt;बंदौं संत सचेत, दया करौ माहि जानि जन।&lt;br /&gt;बंदौं श्री हनुमान कृपा पात्र रघुनाथ के।&lt;br /&gt;देहु भक्ति भगवान, जानकि माई शिष्य उर।&lt;br /&gt;बंदौं सीता मातु, जनक नंदनी राम प्रिय।&lt;br /&gt;करू छाया निज हाथ, जानकि माई शिष्य सिर।।&lt;br /&gt;अपने गुरू नरसिंहदास के बारे में जानकी देवी की श्रद्धा भक्ति भी अनुकरणीय है। देखिये एक काव्यः-&lt;br /&gt;नरसिंहदास नाम सत गुरू के, मोर नाम है जानकी माई।&lt;br /&gt;तुम्हरे चरण शरण तकि आयेंउ राखहु दीन बंधु रघुराई।।&lt;br /&gt;‘‘जानकी माई हित विनय‘‘ में सीता माई से जानकी माई की वार्तालाप का सजीव चित्रण कवि ने किया है ः-&lt;br /&gt;जानकि माई नाम मोर है, तुमहौ जानकी माई।&lt;br /&gt;मेरे पति द्विज रामलला हैं, तुम्हरे पति रघुराई।&lt;br /&gt;तुम्हरे हमरे एक नाम है, हम तुम दोऊ सहनाई।&lt;br /&gt;सोषत जागत सांझ सबेरे, निशि दिन करहु सहाई।&lt;br /&gt;तुम पुनीत मैं पतित कृपणमय, तुम उदार श्रुति गाई।&lt;br /&gt;बहुत नात सिय मातु तोहिं मोहिं, अब न तजहुं बनियाई।&lt;br /&gt;क्षत्री रघुवंशी द्विज पालक, युग युग से चलि आई।&lt;br /&gt;मैं हौं ब्राह्मण तुम क्षत्रिय हौ, कस न पालिहौ माई।&lt;br /&gt;जानकि माई हृदय बसहुं अब, सियाराम दोनों भाई।&lt;br /&gt;सिय तारि चरण शरण होई आयेउं, राखहुं माहि अपनाई।।&lt;br /&gt;नरसिंहदास जी की ‘‘जानकिमाई हितविनय‘‘, ‘‘नरसिंह चैंतिसा‘‘ और ‘‘शिवायन‘‘ तीन प्रकाशित रचनाएं हैं। इसके अतिरिक्त कुछ फुटकर रचनाएं और पद्यात्मक पत्र प्राप्त हुये हैं जो अप्रकाशित हैं। ‘‘जानकिमाई हित विनय‘‘ और ‘‘नरसिंह चैंतिसा‘‘ में तुलसी, सूर और मीरा का प्रभाव परिलक्षित होता है। दोनों का विषय और उद्देश्य एक ही है मगर दृष्टिकोण अलग अलग है। जानकिमाई हित विनय की गणना आत्म निवेदन परक गीतिकाव्य से की जा ससकती है। इसमें 71 गेय मुक्तक पद हैं। प्रत्येक पद के अंतिम दो पंक्तियों में उन्होंने श्रीराम की अनपायनी भक्ति की याचना की है। देखिये उनका एक मुक्तक ः-&lt;br /&gt;नरसिंहदास अंध यहि कारन, करि करि विनय कहत हौं रोई।&lt;br /&gt;जानकिमाई रामलला द्विज, राखहुं राम शराण है दोई।।&lt;br /&gt;उन्होंने यह पद अपने अराध्य श्रीराम को समर्पित किया है। इस ग्रंथ के साथ ‘‘छंद रामायण‘‘ और ‘‘सवैया रामायण‘‘ भी प्रकाशित है। इसमें संक्षिप्त में सातों कांड का वर्णन है। अंत में कलियुग का बड़ा सजीव वर्णन किया गया है ः-&lt;br /&gt;चोरि करे मचावे जुवा तास गंजीपन पासा रे।&lt;br /&gt;देखि कली की रीति बखाने अंधा नरसिंह दासा रे।।&lt;br /&gt;दूसरा ग्रंथ ‘‘नरसिंह चैंतिसा‘‘ है जिसके पहले ही पृष्ठ पर ‘‘भगवत् भजन के निमित्त‘‘ तैयार करने का उल्लेख है। बारहखड़ी अक्षर के क्रम से दोहा, चैपाई और सोरठा आदि छंदों में इसकी रचना की गई है। तीसरा ग्रंथ रामायण की तर्ज पर ‘‘शिवायन‘‘ है। यह उनकी प्रसिद्ध और चर्चित खंडकाव्य है। ‘‘शिव-पार्वती विवाह‘‘ का वर्णन उडि़या और छत्तीसगढ़ी भाषा में किया गया है। छत्तीसगढ़ी भाषा में वर्णित ‘‘शिव बारात‘‘ उनका गौरव स्तम्भ है। यह अत्यंत लोकप्रिय, सरस और हृदयग्राही है। देखिये शिव बारात का एक दृश्यः&lt;br /&gt;आईगे बरात गांव तीर भोला बाबा जी के&lt;br /&gt;देखे जाबो चला गिंया संगी ला जगावा रे।&lt;br /&gt;डारो टोपी, मारो धोती पांव पायजामा कसि,&lt;br /&gt;बर बलाबंद अंग कुरता लगावा रे।&lt;br /&gt;हेरा पनही दौड़त बनही, कहे नरसिंहदास&lt;br /&gt;एक बार हहा करही, सबे कहुं घिघियावा रे।।&lt;br /&gt;कोऊ भूत चढ़े गदहा म, कोऊ कुकुर म चढ़े&lt;br /&gt;कोऊ कोलिहा म चढि़ चढि़ आवत..।&lt;br /&gt;कोऊ बिघवा म चढि़, कोऊ बछुवा म चढि़&lt;br /&gt;कोऊ घुघुवा म चढि़ हांकत उड़ावत।&lt;br /&gt;सर्र सर्र सांप करे, गर्र गर्र बाघ करे&lt;br /&gt;हांव हांव कुत्ता करे, कोलिहा हुवावत।&lt;br /&gt;कहें नरसिंहदास शंभु के बरात देखि,&lt;br /&gt;गिरत परत सब लरिका भगावत।।&lt;br /&gt;दक्षिण पूर्वी रेल्वे जंक्शन चाम्पा से मात्र 8 और नैला रेल्वे स्टेशन से 12 कि. मी. पर पीथमपुर ग्राम स्थित है जहां कलेश्वर महादेव का भव्य मंदिर है। यहां प्रतिवर्ष धूल पंचमी को ‘‘शिवजी की बारात‘‘ निकलती है। संभव है कविवर के मन में शिव बारात की कल्पना इस दृश्य को देखकर उपजी हो ? बहरहाल, पीथमपुर में शिवजी की बारात का दृश्य दर्शकों को अभिभूत कर देता है। इस प्रकार उनके काव्य में भक्तिकाल का दैन्य, रीतिकाल का माधुर्य और आधुनिक काल के समाज सुधार की भावना परिलक्षित होती है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य तो यह है कि जन्मांध होने के बावजूद उन्होंने ग्रंथों की रचना की। इसके लेखन का सद्कार्य पं. दयाशंकर बाजपेयी ने किया जो उस समय खरौद के मिडिल स्कूल में प्रधान पाठक थे। ऐसे उच्च कोटि के कवि का गुमनाम होना विचारणीय है। अच्छा होता कि ऐसे गुमनाम साहित्य मनीषियों को प्रकाश में लाया जावे। इससे छत्तीसगढ़ के उज्जवल साहित्यिक परिवेश उजागर होगा और हिन्दी साहित्य के इतिहास में परिवर्तन संभव होगा ?&lt;br /&gt;रचना, आलेख एवं प्रस्तुति,&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;राघव, डागा कालोनी,&lt;br /&gt;चांपा-495671 (छत्तीसगढ़)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-6107707683711789444?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/6107707683711789444/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=6107707683711789444' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/6107707683711789444'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/6107707683711789444'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/06/blog-post_12.html' title='छत्तीसगढ़ के जन्मांध कवि नरसिंहदास'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-4976874211559313857</id><published>2008-06-04T20:37:00.000-07:00</published><updated>2008-06-04T20:41:11.676-07:00</updated><title type='text'>कटते पेड़, बंजर जमीन और प्रदूषित  नदियां</title><content type='html'>औद्योगिक क्रांति की भट~ठी में हमने अपना जंगल झोंक दिया है।&lt;br /&gt;पेड़ काट डाले और सड़कें बना डालीं। कुल्हाड़ी-आरी से जंगल काटने में देर&lt;br /&gt;होती थी, तो पावर से चलने वाली आरियां गढ़ डालीं। सन~ 1950 से 2000 के बीच&lt;br /&gt;50 वर्षो में दुनियां के लगभग आधे जंगल काट डाले, आज भी बेरहमी से काटे&lt;br /&gt;जा रहे हैं। जल संगzहण के लिए तालाब बनाये जाते थे जिससे खेतों में&lt;br /&gt;सिंचाई भी होती थी। लेकिन आज तालाब या तो पाटकर उसमें बड़ी बड़ी इमारतें&lt;br /&gt;बनायी जा रही है या उसमें केवल मछली पालन होता है। मछली पालन के लिए कई&lt;br /&gt;प्रकार के रसायनों का उपयोग किया जाता है जिसका तालाबों का पानी अनुपयोगी&lt;br /&gt;हो जाता है। इसी प्रकार औद्योगिक धुओं से वायुमंडल तो प्रदू'िात होता ही&lt;br /&gt;है, जमीन भी बंजर होती जा रही है। इससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगा है&lt;br /&gt;और दुष्परिणाम हम भुगत रहे हैं। आखिर जंगल क्यों जरूरी है ? पेड़ हमें ऐसा&lt;br /&gt;क्या देते हैं, जो उन्हें बचाना जरूरी है ? पेड़ हमें फल, फूल, जड़ी-बूटी,&lt;br /&gt;भोजन, र्इंधन, ईमारती लकड़ी, गोंद, कागज, रेशम, रबर और तमाम दुनियां के&lt;br /&gt;अद~भूत रसायन देते हैं। इसलिए हमने उसका दोहन ¼शोषण½ तो किया, पर यह भूल&lt;br /&gt;गये कि वृक्षों के नहीं होने से यह धरती आज वीरान बनती जा रही है। वनों&lt;br /&gt;के इस उपकार का रूपयों में ही हिसाब लगायें तो एक पेड़ 16 लाख रूपये का&lt;br /&gt;फायदा देता है। घने जंगलों से भाप बनकर उड़ा पानी वर्षा बनकर वापस आता है&lt;br /&gt;और धरती को हरा भरा बनाता है। पेड़ पौधों की जड़ें मिðी को बांधे रहती है।&lt;br /&gt;पेड़ों की कटाई से धरती की हरियाली खत्म हो जाती है। धरती की उपजाÅ मिðी&lt;br /&gt;को तेज बौछारों का पानी बहा ले जाती है। पेड़ों की ढाल के बिना पानी की&lt;br /&gt;तेज धाराएं पहाड़ों से उतर कर मैदानों को डुबाती चली जाती है। हर साल बाढ़&lt;br /&gt;का पानी अपने साथ 600 करोड़ टन मिðी बहा ले जता है। मिðी के इस भयावह कटाव&lt;br /&gt;को रोकने का एक ही उपाय है-वृक्षारोपण। मिÍी, पानी और बयार, ये तीन उपकार&lt;br /&gt;हैं वनों के हम पर। इसलिए हमारे देश में प्राचीन काल से पेड़ों की पूजा&lt;br /&gt;होती आयी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      'संयुक्‍त राष्ट्र संघ के आंकड़ों के अनुसार विकासशील देशों में हर&lt;br /&gt;घंटे 8 से 12 वर्ग कि.मी. वन काटे जा रहे हैं। वैज्ञानिक पृथ्वी को 'हरा&lt;br /&gt;गृह' कहते हैं। हरियाली मानव सभ्यता की मुस्कान है। पृथ्वी की हरियाली&lt;br /&gt;हजारों किस्म की उपयोगी वनस्पतियों के कारण है, लेकिन आज तथाकथित विकास&lt;br /&gt;की अंधी दौड़ ने हमें पागल बना दिया है और हम जंगल काटकर कांक्रीट के जंगल&lt;br /&gt;खड़े कर रहे हैं। परिणामस्वरूप वनस्पतियों की 20 से 30 हजार किस्में धरती&lt;br /&gt;से उठ गयी हैं। यदि हमारे पागलपन की यही स्थिति रही तो इस सदी के अंत तक&lt;br /&gt;हम 50 हजार से भी अधिक वनस्पतियों की किस्मों से हाथ धो बैठेंगे। इस बात&lt;br /&gt;का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इससे 10-12 जातियों के जीवों&lt;br /&gt;का भी लोप हो जायेगा। अत: पृथ्वी की हरियाली न केवल हमारे जीवन की उर्जा&lt;br /&gt;है, अपितु पर्यावरण को संतुलित करने के लिए बहुत जरूरी है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      पर्यावरण सबसे अधिक वनों से प्रभावित होता है। हवा, पानी, मिðी,&lt;br /&gt;तापमान आदि वनों से प्रभावित होते हैं। शंकुधारी पौधों की प्रजातियां&lt;br /&gt;समुदz तट से लगभग 5000 मीटर की Åंचाई पर पहाड़ों पर पायी जाती है।&lt;br /&gt;शंकुधारी पौधों में जल गzहण क्षमता बहुत अधिक होती है। Åंचे पहाड़ी&lt;br /&gt;क्षेत्रों में शंकुधारी पौधों के साथ साथ चौड़े पŸो वाले वृक्ष भी पाये&lt;br /&gt;जाते हैं। प्राय: इन क्षेत्रों के आसपास पानी का सzोत पाया जाता है। साल&lt;br /&gt;प्रजाती के पौधे अन्य प्रजाति के पौधों की अपेक्षा अधिक ठंडे और आदर्z&lt;br /&gt;होते हैं और इस क्षेत्र में पानी का बहाव हमेशा रहता है। छŸाीसगढ़ प्रदेश&lt;br /&gt;के सरगुजा, रायगढ़, जशपुर, रायपुर, बस्तर, दंतेवाड़ा, बिलासपुर और&lt;br /&gt;राजनांदगांव जिलों के अलावा शहडोल, मंडला और बालाघाट जिले में साल के पेड़&lt;br /&gt;बहुतायत में मिलते हैं। इसी प्रकार हिमालय की चोटी मंेें पूरे वर्ष बर्फ&lt;br /&gt;जमे होने के कारण वहां से निकलने वाली नदियों में हमेशा पानी बहता है।&lt;br /&gt;लेकिन इंदzावती, नर्मदा, सोन, चम्बल, महानदी, रिहंद, केन आदि का उद~गम&lt;br /&gt;बर्फीली पहाड़ियों से नहीं होने के कारण इनमें हमेशा पानी बहता जरूर था।&lt;br /&gt;लेकिन आज इन नदियों के उपर बांध बन जाने से इन नदियों में भी पानी नहीं&lt;br /&gt;रहता। बल्कि इन नदियों में औद्योगिक रसायन युक्त जल छोड़े जाने से नदियां&lt;br /&gt;प्रदू'िात होती जा रही है और नदियों के पुण्यतोया और मोक्षदायी होने में&lt;br /&gt;संदेह होने लगा है। छत्तीसगढ़ प्रदे"ा में साल के वनों के साथ साथ&lt;br /&gt;बाक्साइड, आयरन, कोयला, चूना और डोलामाइट अयस्क की प्रचुर मात्रा उपलब्ध&lt;br /&gt;है, जिसका उत्खनन जारी है। इससे यहां की जल गzहण क्षमता में भी प्रतिकूल&lt;br /&gt;प्रभाव पड़ने लगा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      वनों के घटने या बढ़ने से वहां की जलवायु प्रभावित होती है। वन&lt;br /&gt;क्षेत्रों में एवं उसके आसपास की जलवायु अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा आदर्z&lt;br /&gt;और ठंडी होती है। जलवायु पर वनों के इस प्रभाव को 'माइकzो क्लाइमेटिक&lt;br /&gt;इफेक्ट' कहते हैं। इस प्रभाव के साथ वनों का पृथ्वी के पूरे वातावरण एवं&lt;br /&gt;पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है। यहां यह बताना समीचीन प्रतीत होता है कि&lt;br /&gt;पौधे और वातावरण के साथ हमारा कैसा सम्बंध है। पौधे अपना भोजन बनाने के&lt;br /&gt;लिए सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पŸिायों में उपस्थित क्लोरोफिल और&lt;br /&gt;वातावरण में उपस्थित कार्बन डाई आक्साइड के साथ रासायनिक प्रतिकिzया करके&lt;br /&gt;अपना भोजन तैयार करते हैं और आक्सीजन छोड़ते हैंं वायुमंडल में कार्बन डाई&lt;br /&gt;आक्साइड और आक्सीजन का एक निश्चित अनुपात होता है। इसमें वायुमंडल में एक&lt;br /&gt;साम्य बना रहता है। लेकिन अगर कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ जाए, तो&lt;br /&gt;यह साम्य टूट जाता है। ऐसा तब होता है, जब पेड़ पौधे कम हों ? इस संतुलन&lt;br /&gt;को बिगाड़ने के लिए औद्योगिकरण बहुत हद तक जिम्मेदार है। गगनचुम्बी&lt;br /&gt;चिमनियों से और जल, थल ओर नभ में बढ़ते यातायात के साधनों के कारण कार्बन&lt;br /&gt;डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ती ही जा रही है, जो पृथ्वी के चारों ओर इकट~ठी&lt;br /&gt;होकर एक चादर का काम करती है। इससे पृथ्वी की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती,&lt;br /&gt;जिससे ताप में वृद्धि होती जा रही है। तापमान के बढ़ने की इस प्रक्रिया को&lt;br /&gt;'गzीनहाउस' कहते हैंं वैज्ञानिकों का ऐसा अनुमान है कि अगली शताब्दी के&lt;br /&gt;अंत तक वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा दो गुनी हो जायेगी,&lt;br /&gt;जिससे धzुवी क्षेत्रों का तापमान बढ़ जायेगा। इससे बर्फ पिघलेगी। गर्मी के&lt;br /&gt;दिनों में बाढ़ आयेगी और अवर्षा के दिनों में बर्फ के पिघलने से बारहों&lt;br /&gt;मास बहने वाली नदियां सूख जायेंगी। इससे जमीन का जल स्तर भी नीचे चला&lt;br /&gt;जायेगा और इन नदियों में बनाये गये बांध सूख जायेंगे। इससे चलने वाले&lt;br /&gt;बिजली घर बंद हो जायेंगे। अत: इनसे होने वाले दुष्परिणामों का सहज अनुमान&lt;br /&gt;लगाया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      इसलिए यह विकास प्रकृति के साथ समरस होकर जीने वाले लोगों के लिए&lt;br /&gt;कष्टदायक हो गया है। एक करोड़ पेड़ों को डुबाकर सुदूर वनांचल बस्तर में&lt;br /&gt;बनने वाली बोधघाट वि+द्युत जल परियोजना, भागीरथी टिहरी की घाटी में बसी&lt;br /&gt;हुई 70 हजार की जनसंख्या को विस्थापित कर बनने वाला भीमकाय टिहरी बांध और&lt;br /&gt;इसीप्रकार के अन्य बांध जो कभी भी अपनी पूरी आयु तक जिंदा नहीं रहेंगे,&lt;br /&gt;गंधमर्दन के प्राकृतिक वन को उजाड़कर प्राप्त होने वाले बाक्साइड  और दून&lt;br /&gt;घाटी को रेगिस्तान बनाकर प्राप्त होने वाले चूना पत्थर से किसको लाभ होने&lt;br /&gt;वाला है ? इस प्रकार के विकास के आधार पर खड़ी होने वाली अर्थ व्यवस्था&lt;br /&gt;अवश्य ही भोग लिप्सा को भड़का सकती है, क्षेत्रीय असंतुलन पैदा कर सकती&lt;br /&gt;है। इससे पर्यावरण की अपूरणीय क्षति हो सकती है, जिसकी भरपायी किसी भी&lt;br /&gt;कीमत पर नहीं हो सकती। बहुगुणा जी ऐसे विकास के लक्ष्य को भारतीय&lt;br /&gt;संस्कृति के अनुरूप एक कसौटी पर खरा उतरने की बात कहते हैंं। वे गांधी जी&lt;br /&gt;की बातों को याद दिलाते हैं। गांधी जी हमेशा कहते थे-'पृथ्वी प्रत्येक&lt;br /&gt;मनुष्य की आवश्यकता पूरी करने के लिए तो सब कुछ देती है, लेकिन मनुष्य के&lt;br /&gt;लोभ को तृप्त करने के लिए कुछ भी नहीं देती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      आखिर जंगल क्यों जरूरी है ? पेड़ पौधे हमें ऐसा क्या देते हैं, जो&lt;br /&gt;उन्हें बचाना जरूरी है ? पेड़-पौधे हमें फल, फूल, जड़ी-बूटी, भोजन, ईंधन,&lt;br /&gt;इमारती लकड़ी, गोंद, कागज, रेशम, रबर और कई प्रकार के रसायन देते हें।&lt;br /&gt;इसलिए उसका शोषण तो किया गया, पर हम यह भूल गये कि पेड़-पौधो के कारण ही&lt;br /&gt;यह धरती मानव विकास के योग्य बन सकी है। नीलकंठ वृक्षों के कार्बन डाई&lt;br /&gt;आक्साइड का विष पीकर ऐसी कीमियागिरि दिखायी वृक्ष को अमृतोपम फलों में&lt;br /&gt;बदल दिया और उपर से बांट दी प्राण वायु आक्सीजन, जिसके बिना पृथ्वी पर&lt;br /&gt;जीवन की कल्पना की जा सकी। इसलिए आइये हम एक बार पेड़ों के लिए दौड़े.....।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रचना, लेखन एवं प्रस्तुति,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'राघव', डागा कालोनी,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चांपा-495671 '36 गढ'&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-4976874211559313857?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/4976874211559313857/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=4976874211559313857' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/4976874211559313857'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/4976874211559313857'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='कटते पेड़, बंजर जमीन और प्रदूषित  नदियां'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-4464697817657803953</id><published>2008-05-30T08:13:00.000-07:00</published><updated>2008-05-30T08:15:27.972-07:00</updated><title type='text'>छत्तीसगढ़ के विस्मृत साहित्यकार: पंडित हीराराम त्रिपाठी</title><content type='html'>छत्तीसगढ़ के विस्मृत साहित्यकार: पंडित हीराराम त्रिपाठी&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;&lt;a href="http://tbn0.google.com/images?q=tbn:C13pO_GXZu90HM:http://bp1.blogger.com/_qZgknZ7Iz-4/R71eKNN2oyI/AAAAAAAAAEQ/brqbPWdjjQY/S1600-R/Ashwinikesharwani1.gif"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में अनेक स्वनामधन्य साहित्यकार हुए जो महानदी की अजस्र धारा से पल्लवित और पुष्पित हुए और काल के गर्त में समाकर गुमनाम बने रहे। ऐसे बहत से साहित्यकार हैं जिनका आज कोई नाम लेने वाला नहीं है। हालांकि साहित्य के क्षेत्र में उनके अवदान को भुलाना संभव नहीं है। उन्हीं साहित्यकारों में एक पंडित हीराराम त्रिपाठी भी हैं। मैं स्वयं महानदी से संस्कारित हूं। जब भी मैं छत्तीसगढ़ के गुमनाम साहित्यकारों पर विचार करता हूं तो पाता हूं कि वे किसी न किसी रूप में महानदी से जुड़े हुये हैं। महानदी छत्तीसगढ़ की पुण्यतोया नदी है। इस नदी के संस्कार मोक्षदायी होने के कारण इसके तटवर्ती ग्राम सांस्कृतिक तीर्थ के रूप में जाने गये। मगर महानदी के तट पर बसा नगर शिवरीनारायण सांस्कृतिक और साहित्यिक दोनों तीर्थ है। सन् 1861 में जब बिलासपुर को जिला बनाया गया तो प्रशासनिक सुविधा के लिए बिलासपुर के अलावा शिवरीनारायण और मुंगेली को तहसील बनाया गया। सन् 1880 में सुप्रसिद्ध साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र के मित्र और सहपाठी ठाकुर जगमोहनसिंह जो एक बहुत अच्छे कवि और आलोचक थे, छत्तीसगढ़ के धमतरी में तहसीलदार होकर आये। दो वर्ष वे यहां रहे और स्थानान्तरित होकर शिवरीनारायण आ गये। यहां के नदी-नाले और पहाड़ी का प्राकृतिक सौंदर्य उन्हें बहुत भाया और यहां रहते हुए उन्होंने कई ग्रंथों की रचना कर डाली। शिवरीनारायण को उनकी कार्यस्थली कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहां उन्होंने काशी के ‘‘भारतेन्दु मंडल‘‘ की तर्ज में ‘‘जगमोहन मंडल‘‘ बनाकर छत्तीसगढ़ के बिखरे साहित्यकारों को समेटने का सद्प्रयास किया जिसमें वे सफल भी हुए। कदाचित् यही कारण है कि शिवरीनारायण एक ‘‘साहित्यिक तीर्थ‘‘ के रूप में भी प्रसिद्धि पा सका। पंडित हीरराम त्रिपाठी जगमोहन मंडल के एक जगमगाते नक्षत्र थे।&lt;br /&gt;भूले बिसरे रचनाकारों को याद करना अपनी परम्परा की पहचान के साथ ऋण शोध भी है। वर्तमान की सही पहचान के लिए अतीत की साझेदारी आवश्यक है। अतीत को उलटने पलटने का मकसद उन भूली बिसरी कड़ियों से अपने को जोड़ना है जिनसे हमारा वर्तमान समूर्तित हुआ है। जातीय स्मृतियों से जुड़कर ही साहित्य युगबोध की सही पहचान कर सकता है। बहुआयामी और बहुरंगी रचनाधर्मिता की पहचान हिन्दी में पहली बार भारतेन्दु युग में मिलती है। कविता के प्रवाह के समानान्तर नाटक, निबंध, उपन्यास और समालोचना का प्रवाह इसी काल में दिखाई देता है। भारतेन्दु यंग का महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय तथ्य है- हिन्दी कविता का केंद्र संक्रमण। इस युग में हिन्दी कविता व्यक्तिगत और दरबारी रूचियों से हटकर नगर रूचियों में संक्रमित होती है। इनसे काव्य संचेतना के सामूहिक विकास के नये केंद्रों को जन्म दिया। काशी ऐसा ही एक प्रमुख केंद्र था और इस केंद्र के न्यूक्लियस थे- बाबू भारतेन्दु हरिश्चंद्र। आलोचकों और इतिहासकारों ने बड़ी शिद्दत के बाद इस तथ्य को स्वीकार किया है कि उस समय की साहित्यिक गतिविधियां भारतेन्दु हरिश्चंद्र की परिष्कृत साहित्यिक सुरूचि एवं जागरूकता के फलस्वरूप केंद्रित होकर नये वातावरण नियोजित करने में प्रतिफलित हुई थी। उस युग की साहित्यिक गतिविधियों की एक झलक हमें छत्तीसगढ़ में भी देखने को मिलती है। इन साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र महानदी का तटवर्ती ग्राम शिवरीनारायण था और ठाकुर जगमोहनसिंह उसके नाभिकेंद्र थे। उन्होंने यहां के आठ सज्जन व्यक्तियों का परिचय अपनी कृति ‘‘सज्जनाष्टक‘‘ में दिया है जिनमें पंडित यदुनाथ भोगहा, महंत अर्जुनदास, महंत गौतमदास, माखन साव, पंडित हीरराम त्रिपाठी, मोहन पुजारी, ऋषिराम और रमानाथ प्रमुख हैं। सज्जनाष्टक के बारे में वे लिखते हैं:-&lt;br /&gt;रहत ग्राम एहि विधि सबै सज्जन सब गुन खान&lt;br /&gt;महानदी सेवहिं सकल जननि सब पय पान ।&lt;br /&gt;यौ जगमोहन सिंह रचि तीरथ चरित पवित्र&lt;br /&gt;सावन सुदि आठै बहुरि मंगलवार विचित्र ।&lt;br /&gt;संवत् विक्रम जानिए इन्दु वेद ग्रह एक&lt;br /&gt;शबरीनारायण सुभग जहां जन बहुत विवेक ।&lt;br /&gt;े&lt;br /&gt;सज्जनाष्टक में पंडित हीराराम त्रिपाठी के बारे में वे लिखते हैं:-&lt;br /&gt;अपर एक पंडित गुनखानी मानी हीरारामा ।&lt;br /&gt;हीरा सो अति विमल जासुजस छहरत चहुं छवि धामा।&lt;br /&gt;यह पुरान मनु भयो वांचि कै दस अरू आठ पुराना&lt;br /&gt;जीति सकल इंद्रिन अब बैठ्यो शिव सरूप अभिरामा।&lt;br /&gt;पंडित हीराराम त्रिपाठी महंत गौतमदास के अत्यंत प्रिय थे। उन्हीं की आज्ञानुसार उन्होंने पंडित ऋषिराम द्विवेदी और पंडित विश्वेश्वरप्रसाद त्रिपाठी के सहयोग से ‘‘श्री शिवरीनारायण महात्म्य‘‘ को संस्कृत से हिन्दी भाषा में अनुवाद करके संशोधित किया। यह पुस्तक संवत् 1944 में बलराम प्रेस राजनांदगांव से प्रकाशित हुई। इसकी भूमिका प्रजाहितैषी के संपादक श्री भगवानदत्त शर्मा ने लिखी है। श्री शिवरीनारायण महात्म्य के बारे में त्रिपाठी जी लिखते हैं:-&lt;br /&gt;शिवरीनारायण कथा गौतमदास महंत&lt;br /&gt;लखि इच्छा रच्यौ द्विज हीरा यह ग्रंथ।&lt;br /&gt;वे यह भी लिखते हैं कि यह क्षेत्र आदिकाल से सिद्धपीठ रहा है और इसी कारण हर युग में इस क्षेत्र की अपनी विशेषता रही है। कदाचित् यही कारण है कि ऋषि मुनियों ने इसे अपनी साधना का क्षेत्र बनाया। सतयुग के उत्तरार्द्ध में यहां मतंग ऋषि का गुरूकुल आश्रम था, जिसे विश्व का प्राचीनतम् गुरूकुल विश्व विद्यालय माना जाता है। शबरी यहां की परिचारिका थी जिसके जूठे बेर खाने श्रीराम और लक्ष्मण यहां आये थे। बाल्मिकी रामायण में भी उल्लेखित है:-&lt;br /&gt;मतंगशिष्यातस्त त्रासन्नृषसः सुसमाहिताः&lt;br /&gt;तेषां भाराभितप्रानां वन्यमाहरतां गुरो ।&lt;br /&gt;इस क्षेत्र को सिद्धिपीठ कहे जाने की पुष्टि यहां के मंदिरों में देवताओं की माला लिए साधनारत मूर्तियों से होती है। कहना न होगा कि यहां ऋषि-मुनियों को सिद्धि प्राप्त होती थी। कदाचित् इसी कारण अलग अलग युगों में यहां की महिमा का बखान करते हुए पंडित हीराराम त्रिपाठी लिखते हैं- ‘‘सौनकादिक ऋषियों के श्री नारायण क्षेत्र के बारे में पूछने पर सूत जी भगवत् ध्यानकर इस महा उत्ाम महात्म्य कहते भये कि हे मुनिगण एकाग्रचित्ा होकर सुनिये। नारायण क्षेत्र को साक्षात् भगवत्धाम जानिये। वह नारायण का कला रूप है। इस क्षेत्र का आदि नाम विष्णुपुरी, द्वितीय नाम रामपुर, तृतीय नाम बैकुण्ठपुर और चतुर्थ नाम नारायणपुर युगानुक्रम से जानिये। वहां चित्रोत्पला-गंगा के तट पर पुण्यरूपी कानन मंडित सिंदूरगिरि पर्वत के निकट साक्षात् अविनाशी श्री नारायण विराजमान हैं। उनकी चरण को स्पर्श करती हुई पवित्र ‘‘रोहिणी कुंड‘‘ स्थित है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री बटुसिंह चैहान ने राहिणी कुंड को एक धाम बताया है:- ‘‘रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर‘‘ जबकि पंडित मालिकराम भोगहा ने उसे मोक्षदायी बताया है:-&lt;br /&gt;रोहिणि कुंडहि स्पर्श करि चित्रोत्पल जल न्हाय।&lt;br /&gt;योग भ्रश्ट योगी मुकति पावत पाप बहाय ।।&lt;br /&gt;तब त्रिपाठी जी की यह कल्पना कि यहां बसने वाले संत, सज्जन और भगवत भक्त हैं, अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं है। देखिये उनका एक भाव:-&lt;br /&gt;चित्रउतपला के निकट श्री नारायण धाम।&lt;br /&gt;बसत संत सज्जन सदा शिवरीनारायण धाम।।&lt;br /&gt;श्री शिवरीनारायण महात्म्य के अलावा त्रिपाठी जी ने दो पुस्तकें और लिखीं हैं जिनमें भक्ति विषयक पदावलियां हैं। हस्तलिखित उनकी ये पुस्तकें अप्रकाशित ही रहीं और काल के गर्त में समा गई। उनकी भक्ति विषयक पदावलियां छत्तीसगढ़ी रहस में खूब प्रचलित थी। आज भी यत्र तत्र उनके द्वारा लिखित पौराणिक कथाओं का वाचन पंडित लोग करते हैं। उनके काव्य तो लोगों को कंठस्थ थे। देखिए उनका एक काव्य:-&lt;br /&gt;समरस गोपी एक कन्हैया तामे देखे तामे है।&lt;br /&gt;एक से एक बनी सखियां सब दामिनि जनु मेघा में है।&lt;br /&gt;नील मनि मनि बीच कनकके जनुग्रंथित बलमा में है।&lt;br /&gt;कोई बामा कह गये स्थान के कोई लपटात हिया में है।&lt;br /&gt;है अविनासी घट घट वासी सुद्ध असुद्ध घिया में है।&lt;br /&gt;जानत उनके भाव भुवनपति जाके ज्यों न जिया में है।&lt;br /&gt;पंडित हीराराम त्रिपाठी निहायत सज्जन पुरूष थे। वे गहरे आस्थावान व्यक्ति थे। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति उनमें गहरी भक्ति थी। जन कल्याण चेतना से उनका व्यक्तित्व सम्पन्न था। वे अहं चैतन्य से शून्य भोले भाले उदार मनुष्य थे। सहृदयता तो उनमें कूट कूटकर भरी थी। श्री शिवरीनारायण महात्म्य को उन्होंने महंत गौतमदास जी की प्रेरणा से संशोधित और अनुवादित किया था। इस बात को वे स्वयं कहते हैं:-&lt;br /&gt;गौतमदास महंत को प्रेम पुनीत विचार,&lt;br /&gt;द्विजहीरा अल्था कियो पंडित लेहु सुधार।&lt;br /&gt;हरिदासन की दास्यता सदा बसै मनमोर,&lt;br /&gt;मांगत हीराराम द्विज संतन सो कर जोर।&lt;br /&gt;ऐसे सत्पुरूष का जन्म सन् 1826 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के दुर्बन नामक ग्राम में हुआ था। वे किसी कार्य के सिलसिले में छत्तीसगढ़ के बेमेतरा ग्राम आये। वहां से वे रतनपुर आये। यहां उनकी मुलाकात कसडोल के मालगुजार मिसिर जी से हुई। वे उन्हें कसडोल ले आये। कसडोल में त्रिपाठी जी मालगुजारी की देखरेख आम मुख्तियार के रूप में करने लगे। आम मुख्तियार के रूप में उन्होंने मालगुजारी को बहुत अच्छे ढंग से चलाया। यहां की प्रकृति प्रदत्त सुषमा उनके कवि मन को जगा दिया और वे यहां काव्य रचना करने लगे। तभी शिवरीनारायण के तत्कालीन तहसीलदार और सुप्रसिद्ध साहित्यकार ठाकुर जगमोहनसिंह कासडोल आये और हीराराम त्रिपाठी की काव्य धारा से बहुत प्रभावित हुये। उन्होंने त्रिपाठी जी को शिवरीनारायण आने का निमंत्रण दिया। बाद में उनकी नियुक्ति यहां तहसील के खजांची के पद पर कर दी। सन् 1891 में तहसील मुख्यालय शिवरीनारायण से जांजगीर आ गया और इसी के साथ त्रिपाठी जी सपरिवार जांजगीर आ गये। यहां वे अर्जीनवीसी करने लगे। जीवन की अंतिम यात्रा भी उन्होंने यहीं पूरी की। उनके मृत्योपरांत उनका परिवार कहां चला गया, इसकी सही जानकारी नहीं मिलती।&lt;br /&gt;त्रिपाठी जी की रचनाएं एक आस्थावान व्यक्ति की भावानुभूति है। एक सीमित सरोकार को लेकर उनका रचना संसार हमारे सामने आता है। यह सीमित सरोकार धर्म और आस्था का है। उनमें आस्था के नाम पर वैष्णववादिता है। उनकी वैष्णववादिता मध्य युगीन वैष्णववादिता से अलग है। उनके काव्य में जो भक्ति निरूपण है, उसका स्वरूप व्यापक आंदोलन या सामाजिक व्याप्ति में न होकर सीमित तथा संकीर्ण व्यक्तिगत निष्ठा पर है। त्रिपाठी जी की भक्ति भावना में आस्था का संप्रदायिक रूप नहीं है। उनकी भक्ति भावना में सगुन निर्गुण सभी एकाकार है। उनके जीवन की राममय झांकी प्रस्तुत है:-&lt;br /&gt;रामनाम जपत अनेक धर्म सिद्ध होत, रामनाम जपत यमन तर जात है।&lt;br /&gt;रामनाम जपत खपत कलिमल सब, रामनाम जपत कीर तिफरात है।&lt;br /&gt;रामनाम श्रवण करत युक्ति मुक्ति होत, रामनाम सुनत कलुष महरत है।&lt;br /&gt;रामप्रताप शिव नपित है आपु रामनाम लेत द्विजहीरा हर्षित है।&lt;br /&gt;----&lt;br /&gt;रचना, आलेख एवं प्रस्तुति,&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;राघव, डागा कालोनी&lt;br /&gt;चांपा-495671 (छत्तीसगढ़)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-4464697817657803953?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/4464697817657803953/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=4464697817657803953' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/4464697817657803953'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/4464697817657803953'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/05/blog-post.html' title='छत्तीसगढ़ के विस्मृत साहित्यकार: पंडित हीराराम त्रिपाठी'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-2377592561803474485</id><published>2008-04-30T23:00:00.000-07:00</published><updated>2008-04-30T23:02:29.086-07:00</updated><title type='text'>बढ़ते बाल मजदूर</title><content type='html'>&lt;a href="http://rachanakar.blogspot.com/2007/11/blog-post_14.html"&gt;बढ़ते बाल मजदूर&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://lh6.google.com/raviratlami/RzsAc8wXWVI/AAAAAAAACDY/szmQfu39bGs/tea%20negative%5B2%5D"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;-प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;&lt;a href="http://lh3.google.com/raviratlami/RzsAuMwXWXI/AAAAAAAACDo/bkWjgVRhmpc/Ashwini%20kesharwani%20%28WinCE%29%5B4%5D"&gt;&lt;/a&gt;आज विश्व में लगभग 11 करोड़ बाल मजदूर हैं जो अत्यंत भयावह परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार समिति द्वारा ऐसे बच्चों का सर्वेक्षण किया गया। इस रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि किस प्रकार से विश्व के अविकसित राष्ट्रों में बच्चों का शोषण हो रहा है, और उन्हें अपना व अपने मां-बाप का पेट भरने के लिये जानवरों से भी बदतर जिन्दगी बसर करनी पड़ रही हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार 97 प्रतिशत बाल मजदूर तीसरे विश्व में अर्थात् अविकसित राष्ट्रों में है। इन देशों में बाल मजदूरों की संख्या सबसे अधिक है जहां पर कुपोषण और अशिक्षा अधिक है। जहां पर कुपोषण और अशिक्षा अधिक है। योजना आयोग के एक अनुमान के अनुसार भारत में 5 से 15 वर्ष की आयु के बाल मजदूरों की संख्या गत 3 वर्षों में 1 करोड़ 75 लाख से बढ़कर 2 करोड़ हो गई है। 1981 की जनगणना के अनुसार आंध्रप्रदेश में सबसे ज्यादा बाल मजदूर है। इसके बाद मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, बिहार ओर कर्नाटक का नंबर आता है।&lt;br /&gt;बंबई के बाल मजदूर जूते साफ करने, होटलों में बर्तन धोने, कार साफ करने, कूड़ा बीनने आदि का काम करते हैं। इनमें से 25 प्रतिशत बच्चे 6 से 8 वर्ष के होते हैं, 48 प्रतिशत बच्चे 10 से 12 वर्ष के होते हैं तथा 27 प्रतिशत बच्चे 13 से 15 प्रतिशत के होते हैं। यूनिसेफ के एक सर्वेक्षण के अनुसार अकेले भारत में लगभग 2 करोड़ बच्चों को अपने जीवन यापन करने के लिए दिन भर काम करना पड़ता है। ये बच्चे अव्यवस्थित व्यवसायों में लगे हुए हैं जहां इनके मालिक इनका शोषण करते हैं। ये बच्चे पूरी तरह से मालिकों की दया पर जीते हैं। अधिक शारीरिक श्रम और मार खाना इनकी नियति है।&lt;br /&gt;कश्मीर के कालीन यूरोप में बहुत पसंद किए जाते हैं। इन्हें निर्यात करने वाले व्यापारी इन कालीनों में 200 से 300 प्रतिशत तक लाभांश लेते हैं। लेकिन इन्हें बनाने वालों के साथ गुलाम जैसा व्यवहार किया जाता है। कालीन बुनते समय उड़ने वाली धूल और देशों के कण सांसों के साथ शरीर में प्रवेश कर जाते है जिससे इन बच्चों को फेफड़े की बीमारियां हो जाती है।&lt;br /&gt;अफीम की मादकता से सराबोर मंदसौर जिले के स्लेट-पेंसिल उद्योग में दस हजार से भी अधिक मजदूर सिलिकोसिस रोग से पीड़ीत नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। देश के तीन चौथाई बच्चों को किसी भी भाषा की वर्णमाला सिखाने में इस उद्योग में काम करने वाले करीब पच्चीस हजार बच्चे आज स्कूल जाने को तरस रहे हैं। वे अपने माता-पिता का सहारा बनकर या तो स्लेट पत्थर ढो रहे हैं या स्लेट पैक कर रहे हैं, किन्तु कारखाना मालिकों की अधिक धन कमाओं वृत्तिा के कारण मजदूरों के परिवारों की दुर्दशा हो रही है, इस जिले को जितना राजस्व धन अफीम से उपलब्ध होता है उससे कहीं अधिक स्लेट पेंसिल उद्योग से प्राप्त होता है। मंदसौर और मल्हारगढ़ तहसीलों में 60 प्रतिशत मजदूर हैं। कृषि एवं अन्य मजदूरों के बाद सबसे ज्यादा मजदूर इस उद्योग में है। स्लेट पेंसिल की खुदाई से लेकर उसकी कटाई करने तक से उड़ने वाली सिलिकान डाई आक्सॉइड फेफड़ों में प्रवेश करने के कारण मजदूरों को सिलिकोसिस रोग होता है।&lt;br /&gt;बाल मजदूरों पर की जा रही ज्यादतियों का यह मर्ज सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी फैला हुआ है। मोरक्को में 8 से 12 वर्ष तक के बच्चों को सप्ताह में 72 घंटे काम करना पड़ता है तथा उनके काम करने की परिस्थितियां बहुत खराब होती है। स्पेन के कालीन उद्योग में 2.5 लाख मजदूर 14 साल से कम आयु के हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार हमारे देश में परिवार की कुल आमदनी का 23 प्रतिशत हिस्सा बाल मजदूरों की कमाई से आता है। इसके बावजूद भी उन्हें उचित मजदूरी नहीं दी जाती। टयूनीशिया, डकार, स्विस, काहिरा, आबिदजान आदि देशों में तो खुलेआम लड़कियों की भी बाल मजदूर के रूप में खरीद फरोख्त की जाती है। दिन में इन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और रात में अपने मालिक की वासना पूर्ति का शिकार बनना पड़ता है। कोलंबिया और बोलिविया में 3 वर्ष के बच्चों की बिक्री होती है। ब्राजील में भी गरीब मां-बाप अपना कर्ज चुकाने के लिये बच्चों को बेच देते हैं। थाइलैंड में भी यही हालत है। बच्चा बिक जाने के बाद कानूनी तौर पर अपने मालिक की संपत्ति हो जाती है और उसका मालिक मनमाने तरीके से उसका उपयोग करता है। बैंकाक का एक दुकानदार हर साल लगभग 20 हजार बच्चे खरीदता और बेचता है जो 7 से 15 वर्ष की आयु के होते हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार इन सब परिस्थितियों का बच्चों के मानसिक व शारीरिक विकास पर बहुत बुरा असर पड़ता है।&lt;br /&gt;किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके बच्चों के उपर निर्भर करता है। हमारे देश में 30 करोड़ बच्चों में से 4 करोड़ 44 लाख बच्चे अब तक मजदूर बन चुके हैं और विभिन्न प्रकार के धंधों में लगे हुए हैं। दूसरे शब्दों में हमारे देश का हर सातवां बच्चा बाल मजदूरों की श्रेणी में आता है। केन्द्रीय श्रम मंत्रालय के अनुसार इस समय देश के सभी क्षेत्रों और सेवाओं में कार्यरत बाल मजदूरों में से 63 प्रतिशत किशोर, 22 प्रतिशत उससे कम आयु के और शेष मासूम बच्चे हैं। श्रमिक लड़कियों का अनुपात लड़कों से अधिक हैं।&lt;br /&gt;बाल मजदूरों का शोषण प्राय: उन सभी देशों में हो रहा है जहां उनकी थोड़ी बहुत उपयोगिता की गुंजाइश है। शहरों और महानगरों में घरों से लेकर छोटे-मोटे उद्योगों में जूता, माचिस, बीड़ी, दर्री, कालीन आदि उद्योगों में कपड़े की रंगाई-छपाई और बुनाई मेंर्र्, ईट-भट्ठा, पत्थर खदानों, भवन निर्माण, बर्तन उद्योग, होटलों, सामान उठाने और यहां तक कि भीख मांगने के काम में भी बच्चों को उपयोग किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार भारत, बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान, इण्डोनेशिया, थाइलैंड, मलेशिया, फिलीपीन्स आदि ऐसे एशियाई देश है जहां बाल मजदूर की संख्या अधिक होने के साथ-साथ उनका शोषण भी अधिक होता है।&lt;br /&gt;'इंटरनेशनल कान्फेडरेशन ऑफ फी ट्रेड यूनियन' की ताजा रिपोर्ट मे बताया गया है कि पिछड़े और विकसशील देशों में भी बाल मजदूर की समस्या है जहां इनका शोषण बदस्तूर जारी है। विकसित राष्ट्रों में कृषि कार्यों में बाल मजदूरों का उपयोग किया जाता है। बावजूद इसके वहां उनको बहुत कम मजदूरी दी जाती है। उसे 12 से 16 घंटे तक काम कराया जाता है। राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान के एक सर्वेक्षण से पता चला है कि बंबई में कार्यरत बाल मजदूर अपनी कमाई का 23 प्रतिशत राशि अपने घर भेजते हैं। मुंबई में 68.2 प्रतिशत बाल मजदूरों को 100 रूपये मासिक, कलकता में 2.5 प्रतिशत बाल मजदूर ऐसे हैं जिनकी मासिक आय 50 से 100 रूपयों के बीच है। दिल्ली में 50 रूपए मासिक मिलता है। कलकता में 20.6 प्रतिशत बाल मजदूरों को कोई वेतन नहीं मिलता। इन्हें दो से पांच महीने तक प्रशिक्षणकाल मानकर सिर्फ भोजन दिया जाता है। यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि 73.13 प्रतिशत बाल मजदूरों को किसी प्रकार की छुट्टी नहीं मिलती और गलती हो जाने पर मार खानी पड़ती है। अधिक श्रम के कारण ये बच्चे मानसिक रूप से पिछड़ जाते हैं और अभाव व हीनता के कारण अपराधी प्रवृत्तिा के हो जाते हैं।&lt;br /&gt;सरकार ने बाल मजदूरों को शोषण रोकरने के लिये कई कानून बनाए हैं। जिसमें बच्चों से मजदूरी कराने पर पाबंदी लगाई गई है। लेकिन ये सब कानून महज कागजी प्रतीत होते हैं। क्योंकि बाल मजदूरों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। 1948 के भारतीय कारखाना अधिनियम के तहत 14 वर्ष या उससे कम उम्र के बच्चों से काम नहीं लिया जा सकता और 1961 के प्रशिक्षार्थी अधिनियम के तहत् 14 वर्ष या उससे कम उम्र के बच्चों को व्यावसायिक प्रशिक्षण नहीं दिया जा सकता लेकिन हाथ करघा और कुटीर उद्योगों में ऐसे बच्चे कार्यरत हैं।&lt;br /&gt;बाल मजदूर को पूर्ण रूप से समाप्त करने का अर्थ होगा लाखों बच्चों से उनकी रोजी-रोटी को छिन लेना और ये तब अपराध से जुड़ने को मजदूर होंगे। यद्यपि इस समस्या को जड़ से समाप्त नहीं किया जा सकता लेकिन यदि प्रयास किये जाएं तो कुछ सीमा तक हम उन्हे राहत दिला सकते है। बाल मजदूर (निषेध और विनियमन) अधिनियम 1986 में प्रावधान हैं कि ऐसे बच्चों को उनके कार्यावधि को कम करके पढ़ने के लिए सुविधाएं तथा उचित मजदूरी दी जाए।&lt;br /&gt;यूनिसेफ द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट ''विश्व में बच्चों की स्थिति के अनुसार'' विश्व में अस्त्रों और सैनिक व्यवस्था पर छ: सप्ताह में जितना खर्च किया जा रहा है यदि उसे स्त्रियों और बच्चों के समुचित आहार, बच्चे के जन्म से पूर्व मां की देखरेख, बच्चों की प्राथमिक शिक्षा, सफाई आदि पर खर्च किया जाए तो दुनिया के 50 करोड़ स्त्री-बच्चों को राहत मिल सकती है।&lt;br /&gt;वैज्ञानिकों के अनुसार भी इंसान के मस्तिष्क तथा शरीर का 50 प्रतिशत विकास पांच वर्ष की आयु में पूरा होता है। शेष 50 प्रतिशत विकास उसके 15-20 सालों में पूरा होता है। साथ में उसे भरपूर आहार और स्वस्थ वातावरण मिलता रहे। विकास और समृद्धि के लिये न केवल पूंजी और मशीनें चाहिए, न कच्चा माल और मंडियां चाहिए बल्कि चाहिए उसके लिए मजदूरों और कारीगरों के सबल और कुशल हाथ। इसलिए बच्चों के स्वास्थ्य तथा शिक्षण प्रशिक्षण पर कुछ वर्षो में खर्च किये गए रूपये आगे चलकर हजारों गुना ब्याज दे सकते हैं।&lt;br /&gt;वस्तुत: मजदूरों के लिए जितने भी नियम कानून बनाए जाते हैं। उनसे मजदूरों का कुछ भला तो ही नहीं पाता बल्कि मालिक और मजदूरों के बीच के लोगों की कमाई अवश्य हो जाती है। जब तक सरकार और समाज के जागरूक लोग उन बुनियादी मसलों पर गौर करके उसका निराकरण नहीं करेंगे तो बच्चों का शोषण होता रहेगा। यह बात भी सही है कि इस देश में बाल मजदूरों की समस्या जड़ से समाप्त नहीं की जा सकती लेकिन सुविधाएं दी जा सकती है।&lt;br /&gt;---------------------&lt;br /&gt;रचना, लेखन एवं प्रस्तुति,&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;राघव, डागा कालोनी,&lt;br /&gt;चांपा-495671 (छत्तीसगढ़)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-2377592561803474485?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/2377592561803474485/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=2377592561803474485' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/2377592561803474485'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/2377592561803474485'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/04/blog-post_30.html' title='बढ़ते बाल मजदूर'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-6476171104053905232</id><published>2008-04-10T21:41:00.001-07:00</published><updated>2008-04-10T21:52:07.164-07:00</updated><title type='text'>शिवरीनारायण में विराजे मां अन्नपूर्णा</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R_7t6ebkpbI/AAAAAAAAAHg/d8rLjZ0N1Is/s1600-h/Annapurna-1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5187845409634297266" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R_7t6ebkpbI/AAAAAAAAAHg/d8rLjZ0N1Is/s200/Annapurna-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;a href="http://aarambha.blogspot.com/2008/04/annapurna.html"&gt;शिवरीनारायण में विराजे मां अन्नपूर्णा&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;प्रो. आश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी चित्रोत्पला गंगा (महानदी) के तट पर स्थित शिवरीनारायण आदिकाल से ऋशि-मुनियों और देवी-देवताओं की सिद्धि स्थली रही है। सतयुग में भगवान श्रीराम और लक्ष्मण यहां श्‍ाबरी के मीठे बेर खाये थे और भाबरी को मोक्ष प्रदान कर भाबरीनारायण की आधार शिला रखे। वे यहां भाबरी की प्रार्थना को स्वीकार क&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp3.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R_tk7mMEa1I/AAAAAAAAA3Y/nwWQ6nlASks/s1600-h/Annapurna-1.bmp"&gt;&lt;/a&gt;रके नारायण रूप में विराजमान हुए। खरौद के दक्षिण द्वार में सौराइन दाई का अति प्राचीन पूर्वाभिमुख मंदिर है। इसके गर्भगृह में श्रीराम और लक्ष्मण के धनुर्धारी मूर्ति है। खरौद के लक्ष्मणे वर महादेव की स्थापना भी श्रीराम ने भाई लक्ष्मण के अनुरोध पर लंका विजय के निमित्त की थी। भगवान जगन्नाथ को शिवरीनारायणसे ही पुरी ले जाया गया है। माघपूर्णिमा को प्रतिवर्श भगवान जगन्नाथ यहां विराजते हैं और उनका दर्शन मोक्षदायी होता है। उनके यहां गुप्त रूप में विराजमान होने के कारण भाबरीनारायण को ''गुप्त तीर्थ`` के रूप में पांचवां धाम माना गया है। ऋशि मुनि इसकी महिमा गाते हैं: :-&lt;br /&gt;शबरीनारायण पुरी क्षेत्र शिरोमणि जान&lt;br /&gt;याज्ञवलक्य व्यासादि ऋशि निज मुख करत बखान।&lt;br /&gt;शिवरीनारायण में वैश्णव परम्परा के भगवान नारायण, के शिवनारायण, लक्ष्मीनारायण और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी के भव्य मंदिर हैं। एक वैष्‍्णव मठ भी यहां हैं। श्रीराम जानकी मंदिर को अकलतरा के जमींदार श्री सिदारसिंह ने महंत अर्जुनदास की प्रेरणा से पुत्ररत्न प्राप्ति के बाद संवत् १९२७ में बनवाया। इसी प्रकार एक अन्य श्रीराम लक्ष्मण जानकी मंदिर का निर्माण क्षेत्रीय केंवट समाज के द्वारा बनवाया गया है। इस मंदिर में भगवान विष्‍्णु के २४ अवतारों की मूर्तियां हैं। इस मंदिर के बगल में बंजारा नायक समाज के द्वारा निर्मित श्रीरामजानकी गुरू नानकदेव मंदिर है। महानदी के तट पर लक्ष्मीनारायण का अति प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर पूर्वाभिमुख है। इस मंदिर प्रांगण में मां अन्नपूर्णा का दक्षिणाभिमुख सौम्य मूर्ति से युक्त भव्य मंदिर है। इस मंदिर के परिसर में समस्त सोलह शक्तियां मेदनीय, भद्रा, गंगा, बहुरूपा, तितिक्षा, माया, हेतिरक्षा, अर्पदा, रिपुहंत्री, नंदा, त्रिनेती, स्वामी सिद्धि और हासिनी मां अन्नपूर्णा के साथ विराजित हैं। ''माता विशालाक्षि भगवान सुन्दरी त्वां अन्नपूर्णे भारण प्रपद्ये`` ऋतुओं के संधिकाल में पड़ने वाले नवरात्रि में किये जाने वाले आध्यात्मिक जप तप अनुश्ठान और समस्त धार्मिक कार्य फलदायी होते हैं। भारदीय वसंत पर्व में मां अन्नपूर्णा प्रत्येक दिन अलग अलग रूपों में सु शोभित होती हैं। पहले दिन मां अन्नपूर्णा महागौरी, दूसरे दिन ज्येश्ठा गौरी, तीसरे दिन सौभाग्य गौरी, चौथे दिन श्रृंगार गौरी, पांचवे दिन वि शालाक्षी गौरी, छठे दिन ललिता गौरी, सातवें दिन भवानी और आठवें दिन मंगलागौरी के रूप में विराजित होेती हैं। छत्तीसगढ़ की महिला समाज द्वारा यहां मंगलागौरी की पूजा और उसका उद्यापन किया जाता है।&lt;br /&gt;त्रेतायुग में श्रीरामचंद्रजी जब लंका पर चढ़ाई करने जाने लगे तब उन्होंने मां अन्नपूर्णा की आराधना करके अपनी बानर सेना की भूख को भाशंत करने की प्रार्थना की थी। तब मां अन्नपूर्णा ने सबकी भूख को शशंत ही नहीं किया बल्कि उन्हें लंका विजय का आशीर्वाद भी दिया। इसी प्रकार द्वापरयुग में पांडवों ने कौरवों से युद्ध शुरू करने के पूर्व मां अन्नपूर्णा से सबकी भूख शशंत करने और अपनी विजय का वरदान मांगा था। मां अन्नपूर्णा ने उनकी मनोकामना पूरी करते हुए उन्हें विजय का आ शीर्वाद दिया था। सृष्‍्टि के आरंभ में जब पृथ्वी का निचला भाग जलमग्न था तब हिमालय क्षेत्र में भगवान नारायण बद्रीनारायण के रूप में विराजमान थे। कालांतर में जल स्तर कम होने और हिमालय क्षेत्र बर्फ से ढक जाने के कारण भगवान नारायण सिंदूरगिरि क्षेत्र के भाबरीनारायण में विराजमान हुए। यहां उनका गुप्त वास होने के कारण भाबरीनारायण ''गुप्त तीर्थ`` के रूप में जगत् विख्यात् हुआ। कदाचित इसी कारण देवी-देवता और ऋशि-मुनि आदि तपस्या करने और सिद्धि प्राप्त करने के लिए इस क्षेत्र में आते थे। उनकी क्षुधा को शशंत करने के लिए मां अन्नपूर्णा यहां सतयुग से विराजित हैं।&lt;br /&gt;भाक्ति से शिव अलग नहीं हैं। अधिष्‍ठान से अध्यस्त की सत्ता भिन्न नहीं होती, वह तो अधिष्‍्ठान रूप ही है। शिव एकरस अपरिणामी है और शक्ति परिणामी हैं। यह जगत परिणामी भाक्ति का ही विलास है। शिव से भाक्ति का आविर्भाव होते ही तीनों लोक और चौदह भुवन उत्पन्न होते हैं और शक्ति का तिरोभाव होते ही जगत अभावग्रस्त हो जाता है।&lt;br /&gt;भाक्ति जातं हि संसारं तस्मिन सति जगत्व्रयम्।&lt;br /&gt;तस्मिन् क्षीणे जगत क्षीणं तच्चिकित्स्य प्रयत्नेत:।।&lt;br /&gt;आनंद स्वरूपा भक्त वत्सला मां भवानी भक्तों के भावनानुसार अनेक रूपों को धारण करती है-दुर्गा, महाकाली, राधा, ललिता, त्रिपुरा, महालक्ष्मी, महा सरस्वती और अन्नपूर्णा। चूंकि शिव से इनकी सत्ता अलग नहीं है अत: इनको ''शिव- शक्ति`` कहते हैं। भगवान शंकराचार्य के अनुसार ''परमात्मा की अश्टाक्त नामावली भाक्ति जिसने समस्त संसार को उत्पन्न किया है, अनादि, अविद्या, त्रिगुणात्मिका और जगत रूपी कार्य से परे है।`` कार्यरूप जगत को देखकर ही शक्तिरूपी माया की सिद्धि होती है। जिस प्रकार बालक माता के गर्भ में नौ माह तक रहकर जन्म लेता है, उसी प्रकार तीनों लोक और चौदह भुवन भाक्ति रूपी माता के गर्भ में स्थित है। मां अन्नपूर्णा हमारा पालन और पो शण करती है। गीता में श्रीकृष्‍्ण जी कहते हैं-' हे अर्जुन ! मेरी भाक्ति रूपी योनि गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतनरूप बीज स्थापित करता हूं। इन दोनों के संयोग से संसार की उत्पत्ति होती है। नेक प्रकार के योनि में जितने शरीरादि आकार वाले पदार्थ उत्पन्न होते हैं, उनमें त्रिगुणमयी भाक्ति तो गर्भ धारण करने वाली माता है और मैं बीज का स्थापन करने वाला पिता हूं।'&lt;br /&gt;''धान का कटोरा`` कहलाने वाला छत्तीसगढ़ का सम्पूर्ण भूभाग मां अन्नपूर्णा की कृपा से प्रतिफलित है। जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर से ६० कि.मी., बिलासपुर से ६४ कि.मी. और रायपुर से १२० कि.मी. व्हाया बलौदाबाजार की दूरी पर पवित्र महानदी के पावन तट पर स्थित शिवरीनारायणकी पि चम छोर में रामघाट से लगा लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर में दक्षिण मुखी मां अन्नपूर्णा विराजित हैं। काले ग्रेनाइट पत्थर की ११-१२ वीं भाताब्दी की अन्यान्य मूर्तियों से सुसज्जित इस मंदिर का जीर्णोद्धार महंत हजारगिरि की प्रेरणा से बिलाईगढ़ के जमींदार ने १७वीं भाताब्दी में कराया था। मंदिर परिसर में भगवान लक्ष्मीनारायण के द्वारपाल जय-विजय और सामने गरूण जी के अलावा दाहिनी ओर चतुर्भुजी गणे श जी जप करने की मुद्रा में स्थित हैं। दक्षिण द्वार से लगे चतुर्भुजी दुर्गा जी अपने वाहन से सटकर खड़ी हैं। मंदिर की बायीं ओर आदि शक्ति महागौरी मां अन्नपूर्णा विराजित हैं। इस मंदिर का पृथक अस्तित्व है। मंदिर के जीर्णोद्धार के समय घेराबंदी होने के कारण मां अन्नपूर्णा और लक्ष्मीनारायण मंदिर एक मंदिर जैसा प्रतीत होता है और लोगों को इस मंदिर के पृथक अस्तित्व का अहसास नहीं होता। अन्नपूर्णा जी की बायीं ओर दक्षिणाभिमुख पवनसुत हनुमान जी विराजमान हैं। पूर्वी प्रवेश द्वार पर एक ओर कालभैरव और दूसरी ओर भाीतला माता स्थित है। मां अन्नपूर्णा और भगवान लक्ष्मीनारायण के विषेश कृपापात्र मंदिर के पुजारी और सुप्रसिद्ध ज्योति शाचार्य पंडित वि वे वर नारायण द्विवेदी के कु शल संरक्षण में यहां प्रतिवर्श भारदीय और वासंतिक नवरात्रि में सर्वसिद्धि और मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित की जाती है। मां अन्नपूर्णा की कृपा हम सबके उपर सदा बनी रहे, यही कामना है। उन्हें हमारा शत् शत् नमन पंडित लोचनप्रसाद पांडेय के शब्दों में :-&lt;br /&gt;महामाया रूपे परमवि शदे भाक्ति ! अमले !&lt;br /&gt;रमा रम्ये भाशन्ते सरल हृदये देवि ! कमले !&lt;br /&gt;जगन्मूले आद्ये कवि विवुधवन्द्ये श्रुतिनुते !&lt;br /&gt;बिना तेरी दया कब अमरता लोग लहते !!&lt;br /&gt;रचना, आलेख, फोटो एवं प्रस्तुति&lt;br /&gt;प्रो. आश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;राघव, डागा कोलोनी,&lt;br /&gt;चांपा-४९५६७१ (छत्तीसगढ़)&lt;br /&gt;&lt;a title="Bookmark using any bookmark manager!" href="http://www.addthis.com/bookmark.php?pub=IDYJ9S5A2YAVI7O4&amp;amp;url=http://aarambha.blogspot.com/2008/04/annapurna.html&amp;amp;title=%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A3%20%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%20%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%87%20%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%82%20%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A3%E0%A4%BE" target="_blank"&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-6476171104053905232?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/6476171104053905232/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=6476171104053905232' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/6476171104053905232'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/6476171104053905232'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/04/blog-post_10.html' title='शिवरीनारायण में विराजे मां अन्नपूर्णा'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R_7t6ebkpbI/AAAAAAAAAHg/d8rLjZ0N1Is/s72-c/Annapurna-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-2667430011252855381</id><published>2008-04-10T21:41:00.000-07:00</published><updated>2008-04-11T07:22:04.733-07:00</updated><title type='text'>छत्तीसगढ़ के रमरमिहा</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R_9yZObkpgI/AAAAAAAAAII/s9FIVZKnkgE/s1600-h/20anj-29.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5187991073450141186" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R_9yZObkpgI/AAAAAAAAAII/s9FIVZKnkgE/s200/20anj-29.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R_9yZebkphI/AAAAAAAAAIQ/WWtl_mswino/s1600-h/2.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5187991077745108498" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R_9yZebkphI/AAAAAAAAAIQ/WWtl_mswino/s200/2.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R_9yZebkpiI/AAAAAAAAAIY/UnvDpYKl6Wc/s1600-h/1.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5187991077745108514" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R_9yZebkpiI/AAAAAAAAAIY/UnvDpYKl6Wc/s200/1.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://aarambha.blogspot.com/2008/04/ramramiha-chhattisgarh.html"&gt;छत्तीसगढ़ के रमरमिहा&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;महानदी, छत्‍तीसगढ़ की एक पवित्र और पुण्यदायिनी नदी है। इसे चित्रोत्पला गंगा भी कहा जाता है और इसका उल्लेख रामायण और महाभारत कालीन ग्रंथों में मिलता है। गंगा के समान पवित्र इस नदी के तट पर अनेक नगर और मंदिर स्थित हैं। महानदी की पवित्रता के कारण ये नगर सांस्कृतिक तीर्थ कहलाने लगे। इन नगरों में ऋषि-मुनियों प्राचीन काल में अपना &lt;a href="http://bp3.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R_cr4mMEaxI/AAAAAAAAA24/ajr244VxbFQ/s1600-h/ramnami+4.jpg"&gt;&lt;/a&gt;आश्रम बनाकर तप किया करते थे। कदाचित् इसी कारण इन्हें सांस्कृतिक तीर्थ कहा जाने लगा। सिहावा, राजिम, सिरपुर, खरौद, शिवरीनारायण, तुरतुरिया, चंद्रपुर और संबलपुर आदि नगर महानदी के तट पर बसे हैं। इस नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में रामायण और महाभारत कालीन अवशेष आज भी मिलते हैं। रायपुर जिले के बलौदाबाजार के निकट जंगलों के बीच तुरतुरिया ग्राम स्थित है। रामायण काल में यहां बाल्मिकी आश्रम था, जहां माता सीता ने वनदेवी के रूप में रहकर लव और कुश को जन्म दिया था। मल्हार के पास ग्राम कोसला को माता कौशल्या का मायका और श्रीराम का ननिहाल माना जाता है। सक्ती और सरगुजा की पहाड़ियों में रामायण कालीन अवशेष मिलते हैं। शिवरीनारायण का वास्तविक रूप शबरीनारायण है जो शबरी के जूठे बेर खाने और उसके उद्धार करने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण ने दंडकारण्य जाते इस भेंट को चिरस्थायी करने के लिये बनाये थे। श्रीराम का नारायणी रूप यहां प्राचीन काल से गुप्त रूप से विराजमान है। कदाचित् इसी कारण इसे ''गुप्तधाम'' कहा गया है। रामनाम को समर्पित, अपने पूरे शरीर में रामनाम अंकित कराकर केवल राम को भजने वाले रामनामी महानदी के तटवर्ती ग्रामों में बसते हैं। इन्हें रमरमिहा, रामनमिहा और रामनामी कहा जाता है। खरौद को रामायण कालीन खर और दूषण की नगरी माना जाता है। खरौद के दक्षिण द्वार पर शबरी का अति प्राचीन मंदिर है। इसे सौराइन दाई का मंदिर भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;महानदी का यह तटवर्ती क्षेत्र धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। सिहावा, सिरपुर, राजिम, मल्हार, खरौद, शिव&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R_crmWMEawI/AAAAAAAAA2w/-ZbrnV0EJyk/s1600-h/ramnami+3.jpg"&gt;&lt;/a&gt;रीनारायण, चंद्रपुर और संबलपुर जहां धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, वहां प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिलने से प्राचीनता की जानकारी मिलती है। राजनीतिक दृष्टि से तब इसे ''ट्रांस महानदी क्षेत्र'' कहा जाता था। महानदी की सहायक नदी जोंक के तट पर गुरू घासीदास का धाम गिरौदपुरी स्थित है। यहीं सतनाम पंथ का जन्म हुआ । इसी प्रकार सरसींवा के पास महानदी का तटवर्ती ग्राम ``उड़काकन'' रामनामी पंथ का एक पवित्र तीर्थधाम है। रामनामी और सतनामी के लिये शिवरीनारायण का वही महत्व है जो दूसरों के लिये प्रयाग और काशी का है। माघी पूर्णिमा से लगने वाले मेला के समय इस पंथ के लोग भी शिवरीनारायण में अपना तंबू लगाकर भजन आदि करते हैं। पूरे शरीर में रामनाम का अंकन लोगों के लिये आकर्षण होता है। मैं भी इन्हें बचपन से देखते आ रहा हंू। मेरे लिये यह उत्सुकता का विषय था। सांवले शरीर में रामनाम को गोदना, सिर पर मोर मुकुट लगाये हाथ में मंजिरा लिये रात दिन रामनाम का भजन करते हैं। उनके शरीर का ऐसा कोई भाग नहीं बचा होता है जहां रामनाम अंकित न हो...यहां तक कि वे जो कपड़े पहनते हैं और जिस तम्बू के नीचे रहते हैं, उसमें भी रामनाम अंकित होता है। छत्‍तीसगढ़ के ग्राम्यांचलों में आज भी प्रात: राम राम कहने का रिवाज है। इससे उनकी दिनचर्या शुभ होती है।&lt;br /&gt;महानदी के तटवर्ती ग्रामों में रमरमिहा लोग निवास करते है। छ&gt;ाीसगढ़ के पांच सीमावर्ती जिलों रायपुर, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, महास&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R_csSGMEayI/AAAAAAAAA3A/S1YjbL9PSe8/s1600-h/ramnami+5.jpg"&gt;&lt;/a&gt;मुंद और रायगढ़ के सारंगढ़, घरघोड़ा, जांजगीर, चांपा, मालखरौदा, चंद्रपुर, पामगढ़, कसडोल, बलौदाबाजार और बिलाईगढ़ क्षेत्र के लगभग ३०० गांवों में पांच लाख रमरमिहा निवास करते हैं। रामनामी पंथ अनुसूचित जाति की एक शाखा है जो संत कवि रैदास को अपने पंथ का मूल पुरूष मानते हैं। इन्हें रमरमिहा अथवा रामनमिहा कहा जाता है। रामनाम में सदा तन्मय रहने वाले ये लोग अहिंसक और शाकाहारी होते हैं। मदिरा से वे बहुत दूर होते हैं।&lt;br /&gt;छत्‍तीसगढ़ में रामनामी पंथ की उत्पि&gt;ा के सम्बंध में कहा जाता है कि ये लोग हरियाणा के नारनौल से यहां आये थे। उस काल में तत्कालीन शासकों के दमनात्मक रवैये से त्रस्त होकर ये लोग छत्‍तीसगढ़ के शांत माहौल में आ बसे थे। आज उनकी २० वीं पीढ़ी के वंशज अपनी परंपराओं और विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहरों के कारण अलग से पहचाने जाते हैं। पारस्परिक सद्भाव और अद्भूत संगठन क्षमता वाले इस कौम को तोड़ने के लिये तत्कालीन शासकों ने एक चाल चली जिसमें वे सफल हो गये। पूर्व में रामनामी पंथ के लोग भी सतनाम के उपासक थे। उनमें आपसी सद्भाव और भाईचारा था। इससे उनमें अच्छा संगठन था। उनकी इस संगठन शक्ति को क्षीण करने और आपस में फूट डालने के लिये एक नवजात शिशु के माथे पर ''रामनाम'' गुदवा दिया और प्रचारित कर दिया कि यह शिशु राम की इच्छा से इस भूलोक में आया है। अत: राम की इच्छा के अनुरूप रामना&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp1.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R_ZvuWMEauI/AAAAAAAAA2g/A2_JKZ2Zhts/s1600-h/1.jpg"&gt;&lt;/a&gt;म का अनुसरण करें। इस प्रकार एक शक्तिशाली संगठन दो हिस्सों में बंट गया। आगे चलकर इन दोनों समुदाय के दो भाग और हुये। अलग रहने के बावजूद इनमें सांस्कृतिक साम्यता पायी जाती है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सांस्कृतिक परंपरा के द्योतक राम नाम :-&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;श्रीराम को अनेक रूपों में पजा जाता है। शायद ही कोई ऐसा होगा जो श्रीराम के सगुण रूप को नकारता हो? लेकिन महानदी घाटी के ग्राम्यांचलों में बसे रमरमिहा लोग श्रीराम के सगुण रूप को नकार कर उसके निर्गुण रूप के उपासक हैं। हिन्दुस्तान में शायद ही कोई दूसरा पंथ होगा जो रामनाम में इतना रमा जाये कि पूरे शरीर में रामनाम गुदवा ले। लेकिन रमरमिहा लोग पूरे शरीर में राम नाम गुदवाते हैं, यहां तक पहनने-ओढ़ने के कपड़े और तम्बू के कपड़ों में भी राम नाम लिखा होता है। श्रीराम चरित मानस&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R_crXWMEavI/AAAAAAAAA2o/FaiTIznNk3w/s1600-h/2.jpg"&gt;&lt;/a&gt; में भी कहा गया है:- ``जय राम रूप अनूप निर्गुण प्रेरक सही `` अर्थात् हे राम! आपकी जय हो। आपके रूप अनुपम है। आप निर्गुण हैं और सत्य ही गुणों के प्रेरक हैं। आगे कहा गया है:-&lt;br /&gt;यद्यपि प्रभु के नाम अनेका, श्रुति कह अधिक एक से एका।&lt;br /&gt;राम सकल नामन्ह ते अधिका, होउ नाथ अघ खग गल बघिका।।&lt;br /&gt;यद्यपि प्रभु के अनेक नाम है और वेद कहते हैं कि वे नाम एक से एक बढ़कर है। तो भी हे नाथ ! रामनाम सबसे बढ़कर हो और पाप रूपी पक्षियों के लिये वह बधित के समान हो। सबसे मजेदार बात तो यह है कि निराकार राम की उपासना करने का अधिकार उन्हें न्यायालय से मिला है।&lt;br /&gt;जांजगीर-चांपा जिले के मालखरौदा विकासखंड के अंतर्गत ग्राम चारपारा के श्री परसराम भारद्वाज को रामनामी पंथ का प्रवर्तक माना जाता है। सन् १९०४ में उन्होंने निराकार ब्रह्म के प्रतीक राम को मानकर एक जन आंदोलन की शुरूवात की थी। उन्होंने सबसे पहले अपने माथे पर रामनाम अंकित कराया था। इसके पूर्व निचली जाति के माने जाने के कारण वे रामायण का पाठ और रामनाम का उच्चारण नहीं करते थे। उनका मंदिरों में प्रवेश निषिद्ध था। अक्सर उनको जातिगत आधार पर अपमान सहना पड़ता था। इसी बीच विदेशी ताकतों ने इस क्षेत्र को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और उन्हें ईसाई धर्म मानने के लिये विवश किया। इसके लिये उन्हें हर प्रकार की मद्द दी जाने लगी। इसी समय श्री परसराम भारद्वाज ने रामनामी पंथ के अंतर्गत निराकार ब्रह्म के प्रतीक राम की पूजा अर्चना करने की बात कही, जिसे सबने सहर्ष स्वीकार किया और तब से सब निराकार श्रीराम को अपने घर में पूजने लगे। भविष्य में उच्च जातियों द्वारा पुन: बाधा न डाल सके इसके लिये उन्होंने तत्कालीन मध्य प्रांत और बरार के जिला सत्र न्यायालय से कानूनी अधिकार प्राप्त कर लिया। सत्र न्यायाधीश ने अपने फैसले में लिखा है:-''ये लोग जिस राम के नाम को भजते हैं वे राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम नहीं हैं बल्कि निराकार ब्रह्म के प्रतीक राम हैं।'' ब्राह्मणों के प्रति इनके मन में जबरदस्त विरोध की भावना है। संभव है उनकी यह भावना उनके द्वारा जातिगत आधार पर दी गयी प्रतारणा का प्रतिफल हो ? यही कारण है कि रामनामी पंथ की सामाजिक संरचना में जन्म से लेकर मृत्यु तक और विवाह से लेकर संतानोत्पि&gt;ा तक के सारे संस्कार ऐसे बनाये गये हैं जिसमें ब्राह्मणों की आवश्यकता ही न पड़े। बिलासपुर जिला गजेटियर के अनुसार उनके धार्मिक कार्यो को पंथ के संत सम्पन्न कराते हैं। अगर अति आवश्यक हुआ तो वे ब्राह्मणों को भी आमंत्रित करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रेड इंडियन :-&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;रामरमिहा के गुरू और गोसाई लोग रंगीन मोर पंखों वाले बांस के मुकुट धारण करने वाले होते हैं। इस पर भी रामनाम की काली पट्टी लगी रहती है। पत्रकार श्री सतीश जायसवाल इनकी तुलना रेड इंडियन से करते हैं। अपने एक लेख मंे वे लिखते हैं :- ''इन मुकुटों के कारण ये लोग रंग बिरंगे पंखों की शीश सज्जा करने वाले रेड इंडियनों की तरह नजर आते हैं। वैसे तो भारत में अंडमान द्वीप समूह तथा कुछ आफ्रीकी देशों के जन जातीय कबीलों में वृक्षों की छाल और मिट्टी के नैसर्गिक रंगों से अपने शरीर को चित्रित करने और रंगने की परंपरा है। लेकिन वहां यह सब सजावटी सा होता है। धार्मिक विधि विधान के तौर पर अपने पूरे शरीर में ईश्वर का नाम अंकित करने वाला संभवत: यह दुनिया का एक मात्र समुदाय है। यह समुदाय कोई छोटा मोटा जन जातीय कबीला नहीं बल्कि पांच लाख से भी उपर विशाल जनसंख्या वाले धर्मावलंबियों का एक संगठित पंथ है। जिससे जनतांत्रिक व्यवस्था का सबसे सशक्त अस्त्र अर्थात् मतदान का अधिकार मिला हुआ है।''&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आदिवासी परंपरा गोदना :-&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;सौंदर्य वृद्धि के लिये आदिवासी संस्कृति में अंग लेखन और चित्रांकन की परंपरा गोदना अनेक आस्थाओं से जुड़ा है। गोदना आदिवासी महिलाओं का श्रृंगार ही नहीं बल्कि ऐसा परिधान है जो आजीवन तन से जुड़ा रहता है। मान्यता तो यह भी है कि मृत्योपरान्त तो तन के सारे गहने और कपड़े उतारे जा सकते हैं, लेकिन संग तो गोदना ही जाता है। गोदना को लोग ''चिन्हारी'' के रूप में गुदवाते हैं। ऐसे मंे गोदना अगर रामनाम का हो तो सोने में सुहागा ही होगा। अगर किसी रामरमिहा को ध्यान से देखें तो आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता है क्योंकि हाथ, पैर यहां तक कि आंखों की पलकों में रामनाम खुदा रहता है। बचपन में रामनाम माथे पर गोदा जाता है। गोदना गोदते समय भजन कीर्तन होता है जिससे मन रामनाम में लीन हो जाये और पीड़ा का आभास तक न हो ? उम्र के हिसाब से शरीर के दूसरे भाग में गोदने का काम किया जाता है। पहले स्याही से रामनाम लिखा जाता है फिर सुई चुभोई जाती है। गोदना गोदने में दो सुई काम में लाई जाती है और काले रंग को अधिक गहरा तथा पक्का बनाने के लिये उस पर उपर से मिट्टी के तेल से निकला धुंआ लगा लेते हैं। गोदना गोदते समय गीत भी गाये जाते हैं :- धूम कुसंगति कालिख होई। लिखिय पुराण मंजु मति होई।।&lt;br /&gt;गोदना गोदने के बाद उसके उपर हल्दी का लेप लगाया जाता हैं गोदना पकने की बात बहुत कम ही सुनने को मिलती है। छ&gt;ाीसगढ़ में गोदना गोदने का काम देवारिन महिलाएं करती हैंं। गोदना गोदते समय वे अक्सर गाती हैं:&lt;br /&gt;ऐ मोर भूरी दीदी-&lt;br /&gt;घुरूर घुरूर जाता बाजे माली भर पिसा&lt;br /&gt;एक चिरूवा भर दउड़त है किसान।&lt;br /&gt;एक चानी भांटा सोर घइला पानी&lt;br /&gt;तोर धांगरा दारू पी के पड़ गै उतानी।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पंचायत : एक सर्वमान्य संस्था :-&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;सामाजिक व्यवस्था में जहां चार घर हुये नहीं कि उनमें किसी न किसी बात को लेकर टकराहट अवश्य होती है। रमरमिहा लोग झगड़ों का निपटारा कोर्ट-कचहरी के बजाय अपनी पंचायत में करना ज्यादा पसंद करते हैं। इस पंथ की अपनी पंचायत होती है, जो सर्वमान्य संस्था होती है। रमरमिहा लोगों की सामाजिक पंचायत का गठन पंथ के निर्माण के समय से ही हुआ है। सन् १९६० के पहले तक गुरू प्रथा से पंचों का नामांकन होता था। लेकिन समयानुसार सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन अवश्यसंभावी है। अत: नामांकन प्रथा के बजाय चुनाव प्रक्रिया अपनाया जाने लगा। इस प्रकार सन् १९६० में पहली निर्वाचित पंचायत बनी और उसके बाद से हर वर्ष पंचायत का चुनाव होता है। इस पंचायत में १०० पंच होते हैं। आठ गांव के पीछे एक प्रतिनिधि होता है। ये सब महासभा के प्रतिनिधि कहलाते हैं। इसी महासभा में पदाधिकारियों का निर्वाचन होता है। पंचायत का कार्यक्षेत्र सामाजिक, पारिवारिक झगड़ों का निपटारा करना, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन को मजबूत बनाना और सामूहिक विवाह को सम्पन्न कराना है। लंबे समय तक श्री बोधराम रामनामी पंथ के महामंत्री हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सामूहिक आयोजन : पंथ मेला :-&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;रामनामी पंथ के दो प्रमुख आयोजन होते हैं- एक, रामनवमीं में संत समागम और दूसरा, पौष एकादशी से त्रयोदशी तक चलने वाला तीन दिवसीय मेला। मेला में सामाजिक वाद विवादों, पारिवारिक झगड़ों आदि का फैसला होता है। इसके अलावा महासभा का आयोजन और सामूहिक विवाह भी होते हें। अगला मेला किस स्थान में लगेगा, इसका निर्णय भी यहीं पर हो जाता है। रामनामी मेला महानदी के तटवर्ती ग्रामों में एक बार महानदी के उ&gt;ार में तो दूसरी बार महानदी के दक्षिण में लगता है।&lt;br /&gt;रामनामी मेला का आयोजन महानदी के तटवर्ती ग्रामों में लगने के बारे में एक लोककथा प्रचलित है। उसके अनुसार आज से ८५-८५ वर्ष पहले सवारियों से भरी एक नाव महानदी को पार करते समय मझधार में फंस गयी। नाविकों न नाव को किनारे लगाने की बहुत कोशिश की मगर सफलता नहीं मिलीं उस समय ईश्वर ही कोई चमत्कार कर सकता था। नाव में सवार सभी यात्रियों ने मिन्नतें मानने लगे लेकिन इससे भी कोई फायदा नहीं हुआ। संयोग से उस नाव में रामनामी पंथ के प्रवर्तक श्री परसराम भारद्वाज और उनके अनुयायी भी सवार थे। सबने उनसे भी मिन्नतें मानने का अनुरोध किया। तब उन्होंने भी मिन्नतें मानी :- ''यदि मझधार में फंसी नाव सकुशल किनारे लग जायेगी तो रामनामी समाज द्वारा महानदी के दोनों किनारों पर रामनाम के भजन-कीर्तन का आयोजन करेगी।'' आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, उनके इस प्रकार मिन्नत मानते ही नाव सकुशल किनारे लग गयी। तब से प्रतिवर्ष महानदी के तटवर्ती ग्रामों में रामनाम का भजन-कीर्तन का आयोजन होने लगा जो आगे चलकर रामनामी सम्मेलन और मेला का रूप ले लिया।&lt;br /&gt;तीन दिवसीय मेला के पहले दिन मेला स्थल में निर्मित जय स्तम्भ के उपर कलश चढ़ाया जाता है। दूसरे दिन रामायण पाठ, रामनाम के भजन-कीर्तन का आयोजन होता है। मेला के अंतिम दिन सामूहिक विवाह और सामूहिक भोजन-भंडारा का आयोजन होता है। मेला स्थल के आस पास जुआ, मांस-मदिरा और वेश्या गमन जैसी कुप्रथा पूर्णत: प्रतिबंधित होता है। रामलीला मेला का प्रमुख आकर्षण होता है। मेला स्थल के मध्य में १३ फीट ऊंचे जय स्तम्भ का निर्माण किया जाता है और चबुतरे में भी रामनाम अंकित होता है। इस चबुतरे पर रामचरित मानस की प्रति रख दी जाती है। फिर रामनाम कीर्तन होता है जिसमें वाद्य यंत्रों के बजाय घुंघरू मंडित लकड़ी के चौके से ध्वनि और ताल निकाला जाता है तथा मयूर पंख से सुसज्जित तंबूरे से वातावरण राममय हो जाता है। विवाह के समय वर-वधू की जय स्तम्भ और रामायण को साक्षी मानकर सात फेरा लेवाया जाता है। फेरा के पूर्व महासभा के समक्ष वर और वधू पक्ष को विधिवत घोषणा पत्र भरना पड़ता है और संस्था का निर्धारित शुल्क ११-११ रूपये देना पड़ता है। दहेज मांगना और तलाक लेना पूर्णत: वर्जित है। हालांकि विधवा महिला के माथे पर रामनाम देखकर कोई व्यक्ति उनसे पुनर्विवाह कर सकता है।&lt;br /&gt;रचना, आलेख, फोटो एवं प्रस्तुति,&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;राघव, डागा कालोनी,&lt;br /&gt;चांपा-४९५६७१ (छत्तीसगढ़)&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-2667430011252855381?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/2667430011252855381/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=2667430011252855381' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/2667430011252855381'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/2667430011252855381'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='छत्तीसगढ़ के रमरमिहा'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R_9yZObkpgI/AAAAAAAAAII/s9FIVZKnkgE/s72-c/20anj-29.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-7883110637293956245</id><published>2008-03-28T07:49:00.000-07:00</published><updated>2008-03-28T07:52:32.532-07:00</updated><title type='text'>हसदो नदी के तीर में, कालेश्वरनाथ भगवान (Kalesharnath Shiva)</title><content type='html'>&lt;a href="http://aarambha.blogspot.com/2008/03/kalesharnath-shiv.html"&gt;हसदो नदी के तीर में, कालेश्वरनाथ भगवान (Kalesharnath Shiva)&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;२६ मार्च को पीथमपुर में शिव बारात के अवसर पर,&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ प्रांत में भी ऐसे अनेक ज्योतिर्लिंग सदृश्‍य काल कालेश्‍वर महादेव के मंदिर हैं जिनके दर्शन, पूजन और अभिशेक आदि करने से सब पापों का नाश हो जाता है। जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर जिला मुख्यालय से ११ कि.मी. और दक्षिण पूर्वी मध्य रेल्वे के चांपा जंक्शन से मात्र ८ कि.मी. की दूरी पर हसदेव नदी के दक्षिणी तट पर स्थित पीथमपुर का काले वरनाथ भी एक है। जांजगीर के कवि स्व. श्री तुलाराम गोपाल ने ''शिवरीनारायण और सात देवालय'' में पीथमपुर को पौराणिक नगर माना है। प्रचलित किंवदंति को आधार मानकर उन्होंने लिखा है कि पौराणिक काल में धर्म वंश के राजा अंगराज के दुराचारी पुत्र राजा बेन प्रजा के उग्र संघर्श में भागते हुए यहां आये और अंत में मारे गए। चंूकि राजा अंगराज बहुत ही सहिश्णु, दयालु और धार्मिक प्रवृत्ति के थे अत: उनके पवित्र वंश की रक्षा करने के लिए उनके दुराचारी पुत्र राजा बेन के मृत भारीर की ऋशि-मुनियों ने इसी स्थान पर मंथन किया। पहले उसकी जांघ से कुरूप बौने पुरूश का जन्म हुआ। बाद में भुजाओं के मंथन से नर-नारी का एक जोड़ा निकला जिन्हें पृथु और अर्चि नाम दिया गया। ऋशि-मुनियों ने पृथु और अर्चि को पति-पत्नी के रूप में मान्यता देकर विदा किया। इधर बौने कुरूप पुरूश महादेव की तपस्या करने लगा। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव उन्हें दर्शन देकर पार्थिव लिंग की स्थापना और पूजा-अर्चना का विधान बताकर अंतर्ध्यान हो गये। बौने कुरूप पुरूश ने जिस काले वर पार्थिव लिग की स्थापना कर पूजा-अर्चना करके मुक्ति पायी थी वह काल के गर्त में समाकर अदृ य हो गया था। वही कालान्तर में हीरासाय तेली को द र्शन देकर उन्हें न केवल पेट रोग से मुक्त किया बल्कि उसके वंशबेल को भी बढ़ाया। श्री तुलसीराम पटेल द्वारा सन १९५४ में प्रकाशित श्री कालेश्‍वर महात्म्य में हीरासाय के वंश का वर्णन हैं-&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R-fgYWMEahI/AAAAAAAAA04/k9tPnfllnLs/s1600-h/Kaleshwarnath.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;तेहिके पुत्र पांच हो भयऊ।&lt;br /&gt;शिव सेवा में मन चित दियेऊ।।&lt;br /&gt;प्रथम पुत्र टिकाराम पाये।&lt;br /&gt;बोधसाय भागवत, सखाराम अरु बुद्धू कहाये।।&lt;br /&gt;सो शिवसेवा में अति मन दिन्हा।&lt;br /&gt;यात्रीगण को शिक्षा दिन्हा।।&lt;br /&gt;यही विघि शिक्षा देते आवत।&lt;br /&gt;सकल वंश शिवभक्त कहावत।।&lt;br /&gt;कहना न होगा हीरासाय का पूरा वंश शिवभक्त हुआ और मंदिर में प्रथम पूजा का अधिकार पाया। श्री प्यारेलाल गुप्त ने भी 'प्राचीन छत्तीसगढ़' में हीरासाय को पीथमपुर के शिव मंदिर में पूजा-अर्चना कर पेट रोग से मुक्त होना बताया हैं। उन्होंने खरियार (उड़ीसा) के राजा को भी पेट रोग से मुक्त करने के लिए पीथमपुर यात्रा करना बताया हैं। बिलासपर वैभव और बिलासपुर जिला गजेटियर में भी इसका उल्लेख हैं। लेकिन जनश्रुति यह है कि पीथमपुर के कालेश्‍वरनाथ (अपभ्रंश कले वरनाथ) की फाल्गुन पूर्णिमा को पूजा-अर्चना और अभिशेक करने से वंश की अवश्‍य वृद़्धि होती है। खरियार (उड़ीसा) के जिस जमींदार को पेट रोग से मुक्ति पाने के लिए पीथमपुर की यात्रा करना बताया गया है वे वास्तव में अपने वंश की वृद्धि के लिए यहां आये थे। खरियार के युवराज और उड़ीसा के सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. जे. पी. सिंहदेव ने मुझे बताया कि उनके दादा राजा वीर विक्रम सिंहदेव ने अपने वंश की वृद्धि के लिए पीथमपुर गए थे। समय आने पर काले वरनाथ की कृपा से उनके दो पुत्र क्रमश: आरतातनदेव और विजयभैरवदेव तथा दो पुत्री कनक मंजरी देवी और भाोभज्ञा मंजरी देवी का जन्म हुआ। वंश वृद्धि होने पर उन्होंने पीथमपुर में एक मंदिर का निर्माण कराया लेकिन मंदिर में मूर्ति की स्थापना के पूर्व ३६ वर्श की अल्पायु में सन् १९१२ में उनका स्वर्गवास हो गया। बाद में मंदिर ट्रस्ट द्वारा उस मंदिर में गौरी (पार्वती) जी की मूर्ति स्थापित करायी गयी।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R-fgeWMEaiI/AAAAAAAAA1A/NqjWK-D7Ang/s1600-h/Kaleshwarnath_Temple.JPG"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;यहां एक किंवदंति और प्रचलित है जिसके अनुसार एक बार नागा साधु के आशीर्वाद से कुलीन परिवार की एक पुत्रवधू को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। इस घटना को जानकर अगले वर्श अनेक महिलाएं पुत्ररत्न की लालसा लिए यहां आई जिससे नागा साधुओं को बहुत परेशानी हुई और उनकी संख्या धीरे धीरे कम होने लगी। कदाचित् इसी कारण नागा साधुओं की संख्या कम हो गयी है। लेकिन यह सत्य है कि आज भी अनेक दंपत्ति पुत्र कामना लिए यहां आती हैं और मनोकामना पूरी होने पर अगले वर्श जमीन पर लोट मारते द र्शन करने यहां जाते हैं। पीथमपुर के काल काले वरनाथ की लीला अपरम्पार है। छत्तीसगढ़ के भारतेन्दु कालीन कवि श्री वरणत सिंह चौहान ने 'शिवरीनारायण महात्म्य और पंचकोसी यात्रा' नामक पुस्तक में पीथमपुर की महत्ता का बखान किया है :-&lt;br /&gt;हसदो नदी के तीर में, कले वरनाथ भगवान।&lt;br /&gt;दर्शन तिनको जो करे, पावही पद निर्वाण।।&lt;br /&gt;फाल्गुन मास की पूर्णिमा, होवत तहं स्नान।&lt;br /&gt;काशी समान फल पावही, गावत वेद पुराण।।&lt;br /&gt;बारह मास के पूर्णिमा, जो कोई कर स्नान।&lt;br /&gt;सो जैईहैं बैकुंठ को, कहे वरणत सिंह चौहान।।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp1.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R-fgkGMEajI/AAAAAAAAA1I/GotyNghB9pk/s1600-h/mela.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पीथमपुर के कालेश्‍वरनाथ मंदिर की दीवार में लगे शिलालेख के अनुसार श्री जगमाल गांगजी ठेकेदार कच्छ कुम्भारीआ ने इस मंदिर का निर्माण कार्तिक सुदि २, संवत् १७५५ (सन् १६९८) को गोकुल धनजी मिस्त्री से कराया था। चांपा के पडित छविनाथ द्विवेदी ने सन् १८९७ में संस्कृत में ''कलि वर महात्म्य स्त्रोत्रम'' लिखकर प्रकाशित कराया था। इस ग्रंथ में उन्होंने काले वरनाथ का उद्भव चैत्र कृश्ण प्रतिपदा संवत् १९४० (अर्थात् सन् १८८३ ई.) को होना बताया है। मंदिर निर्माण संवत् १९४९ (सन् १८९२) में शुरू होकर संवत् १९५३ (सन् १८९६) में पूरा होने, इसी वर्श मूर्ति की प्रतिश्ठा हीरासाय तेली के हाथों कराये जाने तथा मेला लगने का उल्लेख है। इसी प्रकार पीथमपुर मठ के महंत स्वामी दयानंद भारती ने भी संस्कृत में ''पीथमपुर के श्री भांकर माहात्म्य'' लिखकर सन् १९५३ में प्रकाशित कराया था। ३६ भलोक में उन्होंने पीथमपुर के शिवजी को काल काले वर महादेव, पीथमपुर में चांपा के सनातन धर्म संस्कृत पाठशला की भाशखा खोले जाने, सन् १९५३ में ही तिलभांडे वर, काशी से चांदी के पंचमुखी शिवजी की मूर्ति बनवाकर लाने और उसी वर्श से पीथमपुर के मेले में शिवजी की शोभायात्रा निकलने की बातों का उल्लेख किया है। उन्होंने पीथमपुर में मंदिर की व्यवस्था के लिए एक मठ की स्थापना तथा उसके ५० वर्शों में दस महंतों के नामों का उल्लेख इस माहात्म्य में किया है। इस माहात्म्य को लिखने की प्रेरणा उन्हें पंडित शिवशंकर रचित और सन् १९१४ में जबलपुर से प्रकाशित ''पीथमपुर माहात्म्य'' को पढ़कर मिली। जन आकांक्षाओं के अनुरूप उन्होंने महात्म्य को संस्कृत में लिखा। इसके १९ वें भलोक में उन्होंने लिखा है कि वि.सं. १९४५, फाल्गुन पूर्णमासी याने होली के दिन से इस भांकर देव स्थान पीथमपुर की ख्याति हुई। इसी प्रकार श्री तुलसीराम पटेल ने पीथमपुर : श्री कालेश्‍वर महात्म्य में लिखा है कि तीर्थ पुरोहित पंडित काशीप्रसाद पाठक पीथमपुर निवासी के प्रपिता पंडित रामनारायण पाठक ने संवत् १९४५ को हीरासाय तेली को शिवलिंग स्थापित कराया था।&lt;br /&gt;तथ्य चाहे जो भी हो, मंदिर अति प्राचीन है और यह मानने में भी कोई हर्ज नहीं है कि जब श्री जगमाल गांगजी ठेकेदार ने संवत् १७५५ में मंदिर निर्माण कराया है तो अव य मूर्ति की स्थापना उसके पूर्व हो चुकी होगी। ...और किसी मंदिर को ध्वस्त होने के लिए १८५ वर्श का अंतराल पर्याप्त होता है। अत: यह मानने में भी कोई हर्ज नहीं है कि १८५ वर्श बाद उसका पुन: उद्भव संवत् १९४० में हुआ हो और मंदिर का निर्माण कराया गया होगा जिसमें मंदिर के पूर्व में निर्माण कराने वाले शिलालेख को पुन: दीवार में जड़ दिया गया होगा।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp0.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R-fgp2MEakI/AAAAAAAAA1Q/Jkpm-aMytPY/s1600-h/mela+2.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पीथमपुर में काल काले वरनाथ मंदिर के निर्माण के साथ ही मेला लगना भाुरू हो गया था। प्रारंभ में यहां का मेला फाल्गुन पूर्णिमा से चैत्र पंचमी तक ही लगता था, आगे चलकर मेले का विस्तार हुआ और इंपीरियल गजेटियर के अनुसार १० दिन तक मेला लगने लगा। इस मेले में नागा साधु इलाहाबाद, बनारस, हरिद्वार, ऋशिकेश, नासिक, उज्जैन, अमरकंटक और नेपाल आदि अनेक स्थानों से आने लगे। उनकी उपस्थिति मेले को जीवंत बना देती थी। मेले में पंचमी के दिन काल काले वर महादेव के बारात की शोभायात्रा निकाली जाती थी। कदाचित् शिव बारात के इस भाोभायात्रा को देखकर ही तुलसी के जन्मांध कवि श्री नरसिंहदास ने उड़िया में शिवायन लिखा। शिवायन के अंत में छत्तीसगढ़ी में शिव बारात की कल्पना को साकार किया है।&lt;br /&gt;आइगे बरात गांव तीर भोला बबा के,&lt;br /&gt;देखे जाबे चला गियां संगी ल जगाव रे।&lt;br /&gt;डारो टोपी मारो धोती पाय पायजामा कसि,&lt;br /&gt;गल गलाबंद अंग कुरता लगाव रे।&lt;br /&gt;हेरा पनही दौड़त बनही कहे नरसिंह दास,&lt;br /&gt;एक बार हहा करि, सबे कहुं घिघियावा रे।&lt;br /&gt;पहुंच गये सुक्खा भये देखि भूत प्रेत कहें,&lt;br /&gt;नई बांचन दाई बबा प्रान ले भगावा रे।&lt;br /&gt;कोऊ भूत चढ़े गदहा म, कोऊ कुकुर म चढ़े,&lt;br /&gt;कोऊ कोलिहा म चढ़ि, चढ़ि आवत।&lt;br /&gt;कोऊ बघुवा म चढ़ि, कोऊ बछुवा म चढ़ि,&lt;br /&gt;कोऊ घुघुवा म चढ़ि, हांकत उड़ावत,&lt;br /&gt;सर्र सर्र सांप करे, गर्र गर्र बाघ करे।&lt;br /&gt;हांव हांव कुकुर करे, कोलिहा हुहुवावत,&lt;br /&gt;कहे नरसिंहदास भांभू के बरात देखि।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R-fgvWMEalI/AAAAAAAAA1Y/leU4_oUJkFs/s1600-h/Shiva_Barat_1.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रकार पीथमपुर का मठ खरौद के समान भौव मठ था। खरौद के मठ के महंत गिरि गोस्वामी थे, उसी प्रकार पीथमपुर के इस भौव मठ के महंत भी गिरि गोस्वामी थे। पीथमपुर के आसपास खोखरा और धाराशिव आदि गांवों में गिरि गोस्वामियों का निवास था। खोखरा में गिरि गोस्वामी के शिव मंदिर के अवशेष हैं और धाराशिव उनकी मालगुजारी गांव है। इस मठ के पहले महंत श्री भांकर गिरि जी महाराज थे जो चार वर्ष तक इस मठ के महंत थे। उसके बाद श्री पुरूशोत्तम गिरि जी महाराज, श्री सोमवारपुरी जी महाराज, श्री लहरपुरी जी महाराज, श्री काशीपुरी जी महाराज, श्री शिवनारायण गिरि जी महाराज, श्री प्रागपुरि जी महाराज, स्वामी गिरिजानंद जी महाराज, स्वामी वासुदेवानंद जी महाराज, और स्वामी दयानंद जी महाराज इस मठ के महंत हुए। मठ के महंत तिलभांडे वर मठ काशी से संबंधित थे। स्वामी दयानंद भारती जी को पीथमपुर मठ की व्यवस्था के लिए तिलभांडे वर मठ काशी के महंत स्वामी अच्युतानंद जी महाराज ने २०.०२.१९५३ को भेजा था। स्वामी गिरिजानंदजी महाराज पीथमपुर मठ के आठवें महंत हुए। उन्होंने ही चांपा को मुख्यालय बनाकर चांपा में एक 'सनातन धर्म संस्कृत पाठशाला' की स्थापना सन् १९२३ में की थी। इस संस्कृत पाठशाला से अनेक विद्यार्थी पढ़कर उच्च शिक्षा के लिए काशी गये थे। आगे चलकर पीथमपुर में भी इस संस्कृत पाठशाला की एक भाशखा खोली गयी थी। हांलाकि पीथमपुर में संस्कृत पाठशाला अधिक वर्शो तक नहीं चल सकी; लेकिन उस काल में संस्कृत में बोलना, लिखना और पढ़ना गर्व की बात थी। उस समय रायगढ़ और शिवरीनारायण में भी संस्कृत पाठशाला थी। अफरीद के पंडित देवीधर दीवान ने संस्कृत भाशा में विषेश रूचि होने के कारण अफरीद में एक संस्कृत ग्रंथालय की स्थापना की थी। आज इस ग्रंथालय में संस्कृत के दुर्लभ ग्रंथों का संग्रह है जिसके संरक्षण की आव यकता है। उल्लेखनीय है कि यहां के दीवान परिवार का पीथमपुर से गहरा संबंध रहा है।&lt;br /&gt;सम्प्रति पीथमपुर का मंदिर अच्छी स्थिति में है। समय समय पर चांपा जमींदार द्वारा निर्माण कार्य कराये जाने का उल्लेख शिलालेख में है। रानी साहिबा उपमान कुंवरि द्वारा फ र्श में संगमरमर लगवाया गया है। पीथमपुर के आसपास के लोगों द्वारा और क्षेत्रीय समाजों के द्वारा अनेक मंदिरों का निर्माण कराया गया है। काले वरनाथ की महत्ता अपरम्पार है, तभी तो कवि तुलाराम गोपाल का मन गा उठता है :-&lt;br /&gt;युगों युगों से चली आ रही यह पुनीत परिपाटी,&lt;br /&gt;कलियुग में भी है प्रसिद्ध यह पीथमपुर की माटी।&lt;br /&gt;जहां स्वप्न देकर भांकर जी पुर्नप्रकट हो आये,&lt;br /&gt;यह मनुश्य का काम कि उससे पुरा लाभ उठाये।।&lt;br /&gt;रचना, लेखन एवं प्रस्तुति,&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;br /&gt;राघव, डागा कालोनी,चांपा-४९५६७१ (छत्तीसगढ़)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-7883110637293956245?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/7883110637293956245/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=7883110637293956245' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/7883110637293956245'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/7883110637293956245'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/03/kalesharnath-shiva.html' title='हसदो नदी के तीर में, कालेश्वरनाथ भगवान (Kalesharnath Shiva)'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-5041607264219919043</id><published>2008-03-20T22:38:00.000-07:00</published><updated>2008-03-20T22:41:25.397-07:00</updated><title type='text'>खेलूंगी कभी न होली, उससे जो नहीं हमजोली</title><content type='html'>खेलूंगी कभी न होली, उससे जो नहीं हमजोली&lt;br /&gt;प्रो. अश्निनी केशरवानी&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R96av_tLqUI/AAAAAAAAAxk/f73tFuAJUGs/s1600-h/Nagada.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;फागुन का त्योहार होली हंसी-ठिठोली और उल्लास का त्योहार है। रंग गुलाल इस त्योहार में केवल तन को ही नही रंगते बल्कि मन को भी रंगते हैं। प्रकृति की हरीतिमा, बासंती बहार, सुगंध फेलाती आमों के बौर और मन भावन टेसू के फूल होली के उत्साह को दोगुना कर देती है। प्रकृति के इस रूप को समेटने की जैसे कवियों में होड़ लग जाती है। देखिए कवि सुमित्रानंदन पंत की एक बानगी:&lt;br /&gt;चंचल पग दीपि शिखा के घर&lt;br /&gt;गृह भग वन में आया वसंत।&lt;br /&gt;सुलगा फागुन का सूनापन&lt;br /&gt;सौंदर्य शिखाओं में अनंत।&lt;br /&gt;सैरभ की शीतल ज्वाला से&lt;br /&gt;फैला उर उर में मधुर दाह&lt;br /&gt;आया वसंत, भर पृथ्वी पर&lt;br /&gt;स्वर्गिक सुन्दरता का प्रवाह।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R96ZP_tLqSI/AAAAAAAAAxU/YMuOLnQ7vdA/s1600-h/Holi+3.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;प्रकृति की इस मदमाती रूप को निराला जी कुछ इस प्रकार समेटने का प्रयास करते हैं :-&lt;br /&gt;सखि वसंत आया&lt;br /&gt;भरा हर्श वन के मन&lt;br /&gt;नवोत्कर्श छाया।&lt;br /&gt;किसलय बसना नव-वय लतिका&lt;br /&gt;मिली मधुर प्रिय उर तरू पतिका&lt;br /&gt;मधुप वृन्द बंदी पिक स्वर नभ सरसाया&lt;br /&gt;लता मुकुल हार गंध मार भर&lt;br /&gt;बही पवन बंद मंद मंदतर&lt;br /&gt;जागी नयनों में वन&lt;br /&gt;यौवनों की माया।&lt;br /&gt;आवृत सरसी उर सरसिज उठे&lt;br /&gt;केसर के केश कली के छूटे&lt;br /&gt;स्वर्ण भास्य अंचल, पृथ्वी का लहराया।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp1.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R96ZIvtLqRI/AAAAAAAAAxM/uWKkKbbZWs4/s1600-h/Holi+2.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मानव मन इच्छाओं का सागर है और पर्व उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम होते हैं। ये पर्व हमारी भावनाओं को प्रदर्शित करने में सहायक होते हैं। इसीलिए हमारी संस्कृति में शौर्य के लिए द शहरा, श्रद्धा के लिए दीपावली, और उल्लास के लिए होली को उपयुक्त माना गया है। यद्यपि हर्श हर पर्व और त्योहार में होता है मगर उन्मुक्त हंसी-ठिठोली और उमंग की अभिव्यक्ति होली में ही होती है। मस्ती में झूमते लोग फाग में कुछ इस तरह रस उड़ेलते हैं :-&lt;br /&gt;फूटे हैं आमों में बौर&lt;br /&gt;भौंर बन बन टूटे हैं।&lt;br /&gt;होली मची ठौर ठौर&lt;br /&gt;सभी बंधन छूटे हैं।&lt;br /&gt;फागुन के रंग राग&lt;br /&gt;बाग बन फाग मचा है।&lt;br /&gt;भर गये मोती के झाग&lt;br /&gt;जनों के मन लूटे हैं।&lt;br /&gt;माथे अबीर से लाल&lt;br /&gt;गाल सिंदूर से देखे&lt;br /&gt;आंखें हुई गुलाल&lt;br /&gt;गेरू के ढेले फूटे हैं।&lt;br /&gt;ईसुरी अपने फाग गीतों में कुछ इस प्रकार रंगीन होते हैं :-&lt;br /&gt;झूला झूलत स्याम उमंग में&lt;br /&gt;कोऊ नई है संग में।&lt;br /&gt;मन ही मन बतरात खिलत है&lt;br /&gt;फूल गये अंग अंग में।&lt;br /&gt;झोंका लगत उड़त और अंबर&lt;br /&gt;रंगे हे केसर रंग में।&lt;br /&gt;ईसुर कहे बता दो हम खां&lt;br /&gt;रंगे कौन के रंग में।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp3.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R96ZBPtLqQI/AAAAAAAAAxE/RnznSPhrPM0/s1600-h/Holi+1.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;ब्रज में होली की तैयारी सब जगह जोरों से हो रही है। सखियों की भारी भीड़ लिये प्यारी राधिका संग में है। वे गुलाल हाथ में लिए गिरधर के मुख में मलती है। गिरधर भी पिचकारी भरकर उनकी साड़ी पर छोड़ते हैं। देखो ईसुरी, पिचकारी के रंग के लगते ही उनकी साड़ी तर हो रही है। ब्रज की होली का अपना ढंग होता है। देखिए ईसुरी द्वारा लिखे दृश्‍य की एक बानगी&lt;br /&gt;ब्रज में खेले फाग कन्हाई&lt;br /&gt;राधे संग सुहाई&lt;br /&gt;चलत अबीर रंग केसर को&lt;br /&gt;नभ अरूनाई छाई&lt;br /&gt;लाल लाल ब्रज लाल लाल बन&lt;br /&gt;वोथिन कीच मचाई।&lt;br /&gt;ईसुर नर नारिन के मन में&lt;br /&gt;अति आनंद अधिकाई।&lt;br /&gt;सूरदास भी भक्ति के रस में डूबकर अपने आत्मा-चक्षुओं से होली का आनंद लेते हुए कहते हैं :-&lt;br /&gt;ब्रज में होरी मचाई&lt;br /&gt;इतते आई सुघर राधिका&lt;br /&gt;उतते कुंवर कन्हाई।&lt;br /&gt;हिल मिल फाग परस्पर खेले&lt;br /&gt;भाोभा बरनिन जाई&lt;br /&gt;उड़त अबीर गुलाल कुमकुम&lt;br /&gt;रह्यो सकल ब्रज छाई।&lt;br /&gt;कवि पद्यमाकर की भी एक बानगी पेश है :-&lt;br /&gt;फाग की भीढ़ में गोरी&lt;br /&gt;गोविंद को भीतर ले गई&lt;br /&gt;कृश्ण पर अबीर की झोली औंधी कर दी&lt;br /&gt;पिताम्बर छिन लिया, गालों पर गुलाल मल दी।&lt;br /&gt;और नयनों से हंसते हुए बाली-&lt;br /&gt;लला फिर आइयो खेलन होली।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R96Yv_tLqPI/AAAAAAAAAw8/A6U5Z8W-jOw/s1600-h/Holi5.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;होली के अवसर पर लोग नशा करने के लिए भांग-धतुरा खाते हैं। ब्रज में भी लोग भांग-धतूरा खाकर होली खेल रहे हैं। ईसुरी की एक बानगी पेश है :-&lt;br /&gt;भींजे फिर राधिका रंग में&lt;br /&gt;मनमोहन के संग में&lt;br /&gt;दब की धूमर धाम मचा दई&lt;br /&gt;मजा उड़ावत मग में&lt;br /&gt;कोऊ माजूम धतूरे फांके&lt;br /&gt;कोऊ छका दई भंग में&lt;br /&gt;तन कपड़ा गए उधर&lt;br /&gt;ईसुरी, करो ढांक सब ढंग में।&lt;br /&gt;तब बरबस राधिका जी के मुख से निकल पड़ता है :-&lt;br /&gt;खेलूंगी कभी न होली&lt;br /&gt;उससे नहीं जो हमजोली।&lt;br /&gt;यहां आंख कहीं कुछ बोली&lt;br /&gt;यह हुई श्‍याम की तोली&lt;br /&gt;ऐसी भी रही ठिठोली।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp3.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R96YoPtLqOI/AAAAAAAAAw0/X-fdQuWShj0/s1600-h/Holi+dahan.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;यूं देश के प्रत्येक हिस्से में होली पूरे जोश-खरोश से मनाई जाती है। किंतु सीधे, सरल और सात्विक ढंग से जीने की इच्छा रखने वाले लागों को होली के हुड़दंग और उच्छृंखला से थोड़ी परेशानी भी होती है। फिर भी सब तरफ होली की धूम मचाते हुए हुरियारों की टोलियां जब गलियों और सड़कों से होते हुए घर-आंगन के भीतर भी रंगों से भरी पिचकारियां और अबीर गुलाल लेकर पहुंचते हैं, तब अच्छे से अच्छे लोग, बच्चे-बूढ़े सभी की तबियत होली खेलने के लिए मचल उठती है। लोग अपने परिवार जनों, मित्रों और यहां तक कि अपरिचितों से भी होली खेलने लगते हैं। इस दिन प्राय: जोर जबरदस्ती से रंग खेलने, फूहड़ हंसी मजाक और छेड़ छाड़&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp3.blogger.com/_Xux8yOdGE_M/R96YfPtLqNI/AAAAAAAAAws/5el0exQOeFA/s1600-h/Radha+Krishna.jpg"&gt;&lt;/a&gt; करने लगते हैं जिसे कुछ लोग नापसंद भी करते हैं। फिर भी 'बुरा न मानो होली है...` के स्वरों के कारण बुरा नहीं मानते। आज समूचा विश्‍व स्वीकार करता है कि होली वि व का एक अनूठा त्योहार है। यदि विवेक से काम लेकर होली को एक प्रमुख सामाजिक और धार्मिक अनुष्‍्ठान के रूप में शालीनता से मनाएं तो इस त्योहार की गरिमा अवश्‍य बढ़ेगी।&lt;br /&gt;रचना, लेखन एवं प्रस्तुति,&lt;br /&gt;प्रो. अश्निनी केशरवानी&lt;br /&gt;' राघव ` डागा कालोनी&lt;br /&gt;चाम्पा-४९५६७१ ( छत्तीसगढ़ )&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-5041607264219919043?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/5041607264219919043/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=5041607264219919043' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/5041607264219919043'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/5041607264219919043'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/03/blog-post_20.html' title='खेलूंगी कभी न होली, उससे जो नहीं हमजोली'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-1460346060156575184</id><published>2008-03-11T00:10:00.000-07:00</published><updated>2008-03-11T00:22:48.003-07:00</updated><title type='text'>प्रदेश केसरवानी वैश्य सभा के पदाधिकारियों का शपथ ग्रहण समारोह सम्पन्न</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R9YzIMv9a2I/AAAAAAAAAHQ/E_WGDHd5o1c/s1600-h/oath+ceremony.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5176381037663316834" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R9YzIMv9a2I/AAAAAAAAAHQ/E_WGDHd5o1c/s200/oath+ceremony.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R9YzIsv9a3I/AAAAAAAAAHY/9ChkhX1h2ns/s1600-h/oath+ceremony+2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5176381046253251442" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R9YzIsv9a3I/AAAAAAAAAHY/9ChkhX1h2ns/s200/oath+ceremony+2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;प्रो. अिश्वनी केसरवानी प्रदेश केसरवानी वैश्य सभा के संरक्षक बनाये गये।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;प्रदेश केसरवानी वैश्य सभा के पदाधिकारियों का शपथ ग्रहण समारोह सम्पन्न&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;छत्तीसगढ़ राज्य केसरवानी वैश्य सभा के पदाधिकारियों का शपथ ग्रहण समारोह प्रो. अिश्वनी केसरवानी के मुख्य आतिथ्य और श्री शंकरलाल केसरवानी (बलौदाबाजार) की अध्यक्षता में केसरवानी भवन सारंगढ़ में सम्पन्न हुआ। सर्वप्रथम मंचस्थ अतिथियों के द्वारा गोत्राचार्य महर्षि कश्यप जी की पूजा अर्चना की गयी फिर मंचस्थ अतिथियों का माल्र्यापण से नगर सभा के पदाधिकारियों के द्वारा स्वागत किया गया तत्पश्चात् महिलाओं के द्वारा गुरू वंदना और स्वागत गीत गाये गये। नगर सभा के अध्यक्ष श्री रामचरण केसरवानी ने स्वागत भाषण देते हुए सभी अतिथियों का अभिनंदन किया। नगर महिला अध्यक्ष श्रीमती शोभा केसरवानी ने नगर सभा की गतिविधियों की जानकारी दी। तत्पश्चात् मुख्य अतिथि प्रो. अिश्वनी केसरवानी ने प्रदेश सभा के सभी पदाधिकारियों को बारी बारी से शपथ दिलायी। नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्री विजय केसरवानी ने प्रदेश सभा के द्वारा पूर्व में कराये जा रहे कायोZ को आगे बढ़ाते हुए समाज के विकास में अपेक्षानुरूप कार्य करने का आश्वासन दिया। उन्होंने समस्त स्वजातीय बंधुओं से पूर्व की भांति सहयोग देने की अपील की। नवनिर्वाचित प्रदेश महामंत्री श्री अशोक केसरवानी (मनेन्द्रगढ़) ने स्वयं को प्रदेश अध्यक्ष का सारथी बताते हुए समाज हित में कार्य करने की बात कही। मुख्य अतिथि की आसंदी से निवृतमान प्रदेश अध्यक्ष प्रो. अिश्वनी केसरवानी ने कहा कि समाज के हित में कार्य करने के लिए मैंने जो मशाल जलायी थी उसे नवनििर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष श्री विजय केसरवानी को सौंप दिया है। अब उस मशाल को जलाये रखने के लिए उन्हें आप सभी के सहयोग की आवश्यकता है। समाज की कुरीतियों को त्यागना आवश्यक है। इसके लिए नवयुवक, बुजुर्ग और महिलाओं को आगे आने की आवश्यकता है। पदाधिकारियों में आपसी सामंजस्य का होना अति आवश्यक है तभी हम विकास की राह पर आगे बढ़ सकेंगे। नगर तरूण सभा के अध्यक्ष ने सभी अतिथियों का आभार प्रदशZन किया। नगर केसरवानी वैश्य सभा के द्वारा सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह प्रदान किया गया। इस कार्यक्रम में रायगढ़, खरसिया, सरसींवा, भटगांव, िशवरीनारायण, केरा, नावागढ़, जांजगीर, चांपा, कोरबा, बिलासपुर, रायपुर, तिल्दा, भाठापारा, बलौदाबाजार, खैरागढ़, मुंगेली, कवर्धा, पेंड्रा, गौरेला, मनेन्द्रगढ़, अंडी, अमरपुर, चिरमिरी, लोरमी, आदि अनेक स्थानों से स्वजातीय बंधु आये थे। कार्यक्रम का सफल संचालन श्री राजेश केसरवानी और श्री रितेश केसरवानी ने किया। छत्तीसगढ़ राज्य केसरवानी वैश्य सभा के पदाधिकारियों की सूची निम्नानुसार है :- संरक्षक :- 1. डॉ. भानू गुप्ता, मुंगेली, 2. डॉ. महावीर प्रसाद गुप्ता, रायपुर, 3. श्री हरिप्रसाद गुप्ता, रायपुर 4. प्रो. अिश्वनी केसरवानी, चांपा।सलाहकार :- प्रदीप केसरवानी, बिलासपुर, एम. एल. बानी, रायपुर, डॉ. विनय गुप्ता, बिलासपुर, रामकुमार केसरवानी, लोरमी, नेमीचंद्र केसरवानी, भटगांव।अध्यक्ष :- विजय केसरवानी, बलौदाबाजार, वरिष्ठ उपाध्यक्ष :- रविन्द्र केसरवानी, बिलासपुरउपाध्यक्ष :- 1. गरीबालाल केसरवानी, भाठापारा, 2. गिरिजाप्रसाद केसरवानी, बिलासपुर, 3. छेदीलाल केसरवानी, रायपुर, 4. बीजेन्द्र केसरवानी, सारंगढ़, 5. प्रकाश केसरी, गौरेला, 6. सुधीर गुप्ता, बिलासपुर।महामंत्री :- अशोक कुमार केसरवानी, मनेन्द्रगढ़, संगठन मंत्री :- महेश केसरवानी, पेंड्रा कोषाध्यक्ष :- जयप्रकाश केसरवानी, कोरबा, सचिव :- 1. कुष्णाप्रसाद गुप्ता, अिम्बकापुर, 2. कमलेश्वर केसरवानी, मंगेली, 3. आनंद गुप्ता, रायपुर, 4. नवीन गुप्ता, दुर्ग, 5. आशीष केसरवानी, िशवरीनारायण,6. अशोक केसरवानी, तिल्दा, 7. राजेश केसरवानी, मंगेली, प्रचार प्रसार सचिव :- उमेश केसरवानी, सारंगढ़, कार्यालय सचिव :- रमेश केसरवानी, चांपा एवं िशवाजीप्रसाद केसरी, भिलााई। अंकेक्षक :- मुकुंदीलाल केसरवानी, रायपुर एवं नगेन्द्र गुप्ता, मुंगेली। सह सचिव :- 1. दुगेZश केसरवानी, कवर्धा, 2. पूरनचंद्र गुप्ता, चिरमिरी, 3. कृष्ण कुमार केसरवानी, रायगढ़, 4. प्रभुलाल केसरवानी, रायपुर, 5. रतनमणि केसरवानी, लोरमी 6. नत्थूलाल केसरवानी, खरसिया।प्रकोष्ठ संयोजक :-1. राजनीतिक प्रकोष्ठ नरेश गुप्ता, रायपुर2. शैक्षणिक प्रकोष्ठ डॉ. जयनारायण केसरवानी, रायपुर3. सांस्कृतिक प्रकोष्ठ राजेश केसरी, कवर्धा4. विधि प्रकोष्ठ अजय केसरवानी, जांजगीर5. उद्योग एवं व्यापार प्रकोष्ठ अशोक केसरवानी, बिलासपुर&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-1460346060156575184?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/1460346060156575184/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=1460346060156575184' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/1460346060156575184'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/1460346060156575184'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/03/blog-post.html' title='प्रदेश केसरवानी वैश्य सभा के पदाधिकारियों का शपथ ग्रहण समारोह सम्पन्न'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R9YzIMv9a2I/AAAAAAAAAHQ/E_WGDHd5o1c/s72-c/oath+ceremony.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-9065495870593505477</id><published>2008-02-20T22:52:00.000-08:00</published><updated>2008-02-20T23:18:12.712-08:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R70lF6RvcBI/AAAAAAAAAG4/et6_KTW9qMs/s1600-h/shabrinarayan.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5169328730764439570" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R70lF6RvcBI/AAAAAAAAAG4/et6_KTW9qMs/s200/shabrinarayan.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R70lGKRvcCI/AAAAAAAAAHA/VX4eLJ3MaqY/s1600-h/Mela+3.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5169328735059406882" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R70lGKRvcCI/AAAAAAAAAHA/VX4eLJ3MaqY/s200/Mela+3.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R70lGaRvcDI/AAAAAAAAAHI/LWXjqavW-5Q/s1600-h/Mela.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5169328739354374194" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R70lGaRvcDI/AAAAAAAAAHI/LWXjqavW-5Q/s200/Mela.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;िशवरीनारायण का मेला&lt;br /&gt;प्रो. अिश्वनी केशरवानी&lt;br /&gt;महानदी के तट पर स्थित प्राचीन, प्राकृतिक छटा से सुसज्जित और छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी के नाम से विख्यात् शिवरीनारायण, जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर से 60 कि. मी., बिलासपुर से 64 कि. मी., कोरबा से 110 कि. मी., रायगढ़ से व्हाया सारंगढ़ 110 कि. मी. और राजधानी रायपुर से व्हाया बलौदाबाजार 120 कि. मी. की दूरी पर स्थित है। यह नगर कलचुरि कालीन मूर्तिकला से सुसज्जित है। यहां महानदी, शिवनाथ और जोंक नदी का त्रिधारा संगम प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा नमूना है। इसीलिए इसे ``प्रयाग`` जैसी मान्यता है। मैकल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में अपने अप्रतिम सौंदर्य के कारण और चतुभुZजी विष्णु मूर्तियों की अधिकता के कारण स्कंद पुराण में इसे ``श्री नारायण क्षेत्र`` और ``श्री पुरूषोत्तम क्षेत्र`` कहा गया है। प्रतिवर्ष माघ पूणिZमा से यहां एक बृहद मेला का आयोजन होता है, जो महाशिवरात्री तक लगता है। इस मेले में हजारों-लाखों दर्शनार्थी भगवान नारायण के दर्शन करने जमीन में ``लोट मारते`` आते हैं। ऐसी मान्यता है कि माघ पूणिZमा को भगवान जगन्नाथ यहां विराजते हैं और पुरी के भगवान जगन्नाथ के मंदिर का कपाट बंद रहता है। इस दिन उनका दर्शन मोक्षदायी होता है। तत्कालीन साहित्य में जिस नीलमाधव को पुरी ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में स्थापित किया गया है, उसे इसी शबरीनारायण-सिंदूरगिरि क्षेत्र से पुरी ले जाने का उल्लेख 14 वीं शताब्दी के उिड़या कवि सरलादास ने किया है। इसी कारण शिवरीनारायण को छत्तीसगढ़ का जगन्नाथ पुरी कहा जाता है और शिवरीनारायण दर्शन के बाद राजिम का दर्शन करना आवश्यक माना गया है क्योंकि राजिम में ´´साक्षी गोपाल`` विराजमान हैं। छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा मेला होने के कारण यहां के मेले को ``छत्तीसगढ़ का कुंभ`` कहा जाता है।&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में िशवरीनारायण के मेला का विशेष महत्व है। क्यों कि यहां का मेला अन्य मेला की तरह बेतरतीब नहीं बल्कि पूरी तरह से व्यवस्थित होता है। दुकान की अलग अलग लाईनें होती हैं। एक लाईन फल दुकान की, दूसरी लाइन बर्तन दुकानों की, तीसरी लाइन मनिहारी दुकानों की, चौथी लाइन रजाई-गद्दों की, पांचवीं लाइन सोने-चांदी के जेवरों की होती है। इसी प्रकार एक लाईन होटलों की, एक लाइन सिनेमा-सर्कस की, एक लाइन कृषि उपकरणों, जूता-चप्पलों की दुकानें आदि होती है। इस मेले में दुकानदार अच्छी खासी कमाई कर लेता है।&lt;br /&gt;नगर के पिश्चम में महंतपारा की अमराई में और उससे लगे मैदान में माघ पूणिZमा से महािशवरात्री तक प्रतिवषZ मेला लगता है। माघ पूणिZमा की पूर्व रात्रि में यहां भजन-कीर्तन, रामलीला, गम्मत, और नाच-गाना करके दशZनार्थियों का मनोरंजन किया जाता है और प्रात: तीन-चार बजे चित्रोत्पलागंगा-महानदी में स्नान करके भगवान शबरीनारायण के दशZन के लिए लाइन लगायी जाती है। दशZनार्थियों की लाइन मंदिर से साव घाट तक लगता था। भगवान शबरीनारायण की आरती के बाद मंदिर का द्वार दशZनार्थियों के लिए खोल दिया जाता है। इस दिन भगवान शबरीनारायण का दशZन मोक्षदायी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ इस दिन पुरी से आकर यहां सशरीर विराजते हैं। कदाचित् इसी कारण दूर दूर से लोग यहां चित्रोत्पलागंगा-महानदी में स्नान कर भगवान शबरीनारायण का दशZन करने आते है। बड़ी मात्रा में लोग जमीन में ``लोट मारते`` यहां आते हैं। मंदिर के आसपास और माखन साव घाट तक ब्राह्मणों द्वारा श्री सत्यनारायण जी की कथा-पूजा कराया जाता था। रमरमिहा लोगों के द्वारा विशेष राम नाम कीर्तन होता था। िशवरीनारायण में मेला लगने की शुरूवात कब हुई इसकी लिखित में जानकारी नहीं है लेकिन प्राचीन काल से माघी पूणिZमा को भगवान शबरीनारायण के दशZन करने हजारों लोग यहां आते थेण्ण्ण्और जहां हजारों लोगों की भीढ़ हो वहां चार दुकानें अवश्य लग जाती है, कुछ मनोरंजन के साधन-सिनेमा, सर्कस, झूला, मौत का कुंआ, पुतरी घर आदि आ जाते हैं। यहां भी ऐसा ही हुआ होगा। लेकिन इसे मेला के रूप में व्यवस्थित रूप महंत गौतमदास जी की प्रेरणा से हुई। मेला को वर्तमान व्यवस्थित रूप प्रदान करने में महंत लालदास जी का बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने मठ के मुिख्तयार पंडित कौशलप्रसाद तिवारी की मद्द से अमराई में सीमेंट की दुकानें बनवायी और मेला को व्यवस्थित रूप प्रदान कराया। पंडित रामचंद्र भोगहा ने भी भोगहापारा में सीमेंट की दुकानें बनवायी और मेला को महंतपारा की अमराई से भोगहापारा तक विस्तार कराया। चूंकि यहां का प्रमुख बाजार भोगहापारा में लगता था अत: भोगहा जी को बाजार के कर वसूली का अधिकार अंग्रेज सरकार द्वारा प्रदान किया गया था। आजादी के बाद मेला की व्यवस्था और कर वसूली का दायित्व जनपद पंचायत जांजगीर को सौंपा गया था। जबसे िशवरीनारायण नगर पंचायत बना है तब से मेले की व्यवस्था और कर वसूली नगर पंचायत करती है। नगर की सेवा समितियों और मठ की ओर से दशZनार्थियों के रहने, खाने-पीने आदि की नि:शुल्क व्यवस्था की जाती है।&lt;br /&gt;आजादी के पूर्व अंग्रेज सरकार द्वारा गजेटियर प्रकािशत कराया गया जिसमें मध्यप्रदेश के जिलों की सम्पूर्ण जानकारी होती थी। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ फ्यूडेटरी इस्टेट प्रकािशत कराया गया जिसमें छत्तीसगढ़ के रियासतों, जमींदारी और दशZनीय स्थलों की जानकारी थी। आजादी के पश्चात सन 1961 की जनगरणा हुई और मध्यप्रदेश के मेला और मड़ई की जानकारी एकत्रित करके इम्पीरियल गजेटियर के रूप में प्रकािशत किया गया था। इसमें छत्तीसगढ़ के छ: जिलों क्रमश: रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, रायगढ़, सरगुजा, बस्तर के मेला, मड़ई, पर्व और त्योहारों की जानकारी प्रकािशत की गयी है। इसके अनुसार छत्तीसगढ़ में िशवरीनारायण, राजिम और पीथमपुर का मेला 100 वषZ से अधिक वषोZ से लगने तथा यहां के मेला में एक लाख दशZनार्थियों के शामिल होने का उल्लेख है।&lt;br /&gt;यहां के मेला में वैवाहिक खरीददारी अधिक होती थी। बर्तन, रजाई-गद्दा, पेटी, सिल-लोढ़ा, झारा, डुवा, कपड़ा आदि की अच्छी खरीददारी की जाती थी। मेला में अकलतरा और िशवरीनारायण के साव स्टोर का मनिहारी दुकान, दुर्ग, धमधा, बलौदाबाजार, चांपा, बहम्नीडीह और रायपुर का बर्तन दुकान, बिलासपुर का रजाई-गद्दे की दुकान, कलकत्ता का पेटी दुकान, चुड़ी-टिकली की दुकानें, सोने-चांदी के जेवरों की दुकानें, नैला के रमाशंकर गुप्ता का होटल और उसके बगल में गुपचुप दुकान, अकलतरा और सक्ती का सिनेमा घर, किसिम किसिम के झूला, मौत का कुंआ, नाटक मंडली, जादू, तथा उड़ीसा का मिट्टी की मूर्तियों की प्रदिशZनी-पुतरी घर बहुत प्रसिद्ध था। यहां उिड़या संस्कृति को पोषित करने वाला सुस्वादिष्ट उखरा बहुतायत में आज भी बिकने आता है।&lt;br /&gt;िशवरीनारायण और आस पास के गांवों में मेला के अवसर पर मेहमानों की अपार भीढ़ होती है। इस अवसर पर विशेष रूप से बहू-बेटियों को लिवा लाने की प्रथा है। शाम होते ही घर की महिलाएं झुंड के झुंड खरीददारी के निकल पड़ती हैं। खरीददारी के साथ साथ वे होटलों और चाट दुकानों में अवश्य जाती हैं और सिनेमा देखना नहीं भूलतीं। मेला में वैवाहिक खरीददारी अवश्य होती है। शासन दशZनार्थियों की सुविधा के लिए पुलिस थाना, विभिन्न शासकीय प्रदिशZनी, पीने के पानी की व्यवस्था आदि करती है। लोग चित्रोत्पलागंगा में स्नान कर, भगवान शबरीनारायण का दशZन करने, श्री सत्यनारायण की कथा-पूजा करवाने और मंदिर में ध्वजा चढ़ाने से लेकर विभिन्न मनोरंजन का लुत्फ उठाने और खरीददारी कर प्रफुिल्लत मन से घर वापस लौटते हैं। यानी एक पंथ दो काज ... तीर्थ यात्रा के साथ साथ मनोरंजन और खरीददारी। लोग मेले की तैयारी एक माह पूर्व से करते हैं। यहां के मेला के बारे में पंडित शुकलाल पांडेय `छत्तीसगढ़ गौरव` में लिखते हैं :-&lt;br /&gt;पावन मेले यथा चंद्र किरण्ों, सज्जन उर।अति पवित्र त्यों क्षेत्र यहां राजिम, शौरिपुर।शोभित हैं प्रत्यक्ष यहां भगवन्नारायण।दशZन कर कामना पूर्ण करते दशZकगण।मरे यहां पातकी मनुज भी हो जाते धुव मुक्त कहते, युग क्षेत्र ये अतिशय महिमायुक्त हैं।।&lt;br /&gt;प्रस्तुति,&lt;br /&gt;प्रो. अिश्वनी केशरवानीराघव,&lt;/div&gt;&lt;div&gt; डागा कालोनी,चांपा-495671 (छ.ग.)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-9065495870593505477?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/9065495870593505477/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=9065495870593505477' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/9065495870593505477'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/9065495870593505477'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/02/blog-post_20.html' title=''/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R70lF6RvcBI/AAAAAAAAAG4/et6_KTW9qMs/s72-c/shabrinarayan.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-504526418533814738</id><published>2008-02-18T06:31:00.001-08:00</published><updated>2008-02-19T06:30:44.774-08:00</updated><title type='text'>राजेश कुमार सोनार के बिखरे मोती</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R7ri5aRvcAI/AAAAAAAAAGw/j9SjppFQ93w/s1600-h/sonar.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5168692998295220226" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R7ri5aRvcAI/AAAAAAAAAGw/j9SjppFQ93w/s200/sonar.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;राजेश कुमार सोनार के बिखरे मोती&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;स्वागत 2008&lt;br /&gt;नया वषZ तेरा स्वागत है ,दो हजार सन् आठ ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आशा है तू नित लायेगा खुिशयो की सौगात ,&lt;br /&gt;सात सुरों का संगम होगा तेरे इस नव गीत में ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;साथ निभायेगा जो हर पल आने वाली जीत में , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सदा सफलता हमें मिलेगी दिन हो या हो रात...&lt;br /&gt;सात रंग के हैं जो सपने उसे करोगे तुम साकार , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;हमें दिलाओगे गैरों से भी अपनों जैसा ही प्यार , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सपनो को सच करने में ना कभी मिलेगी मात...&lt;br /&gt;सातों दिन खुिशयों के होंगे अब पूरे सप्ताह मे ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;साथ सफलतायें होंगी अब अपने बारह माह में, &lt;/p&gt;&lt;p&gt;बात सिर्फ खुिशयों की होगी गम की ना हो बात ...&lt;br /&gt;रखे कामना बस यह तुमसे है सोनार राजेश , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सभी रहें समृद्ध ,स्वस्थ और करे प्रगति यह देश , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;गर्व कर सकें हम अपने पर बने वही हालात...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मुदित मन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मुदित हुआ करता है मानव मन, &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मिले कहीं जब मन को स्पन्दन... &lt;/p&gt;&lt;p&gt;तितली जब इठलाती है , फूलों पर मंडराती है , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;खग अपनी कलरव से सारे , अम्बर को चहकाती हैं, &lt;/p&gt;&lt;p&gt;और भ्रमर करते गुन गुन गुंजन , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुदित हुआ करता है मानव मन ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देख सुमन से सजा हुआ आंगन &lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुसुम कली मुसकाती हैं , भ्रमरों को ललचाती हैं , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;फिर बिखेर अपनी सुरभि , बगिया को महकाती हैं, &lt;/p&gt;&lt;p&gt;महक उठा करता सारा उपवन ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुदित हुआ करता है मानव मन,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देख कुसुम का ऐसा अल्हड़पन &lt;/p&gt;&lt;p&gt;लिपटी तना लताओं से, जैसे बच्चे मांओं से , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;आम वृक्ष बौराते है , कोयल कूक के गाते हैं , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब सब कुछ लगता है मनभावन, &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुदित हुआ करता है मानव मन , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिखे दृश्य ऐसा जब भी अनुपम ... &lt;/p&gt;&lt;p&gt;घर में जब होते बच्चे, तब ही घर लगते अच्छे , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;बच्चे नटखट लगतेे हों , पर दिल के होते सच्चे ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देख के बच्चों का निश्छल जीवन ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुदित हुआ करता है मानव मन ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बच्चों से जब सजा दिखे आंगन, &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मात-पिता , दादा-दादी, चाचा-चाची संग, बेटे ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बिटिया और बहन , बांटें संग उमंग , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;करें जान इक दूजे पर अर्पण, &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुदित हुआ करता है मानव मन , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिखे घरों में जब भी अपनापन ... &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मंदिर, मिस्जद ,गुरुद्वारा, हो या गिरजाघर , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;गूंजा करते नित्य जहां , आस्थाओं के स्वर,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूजा में जब दिखता कोई मगन , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुदित हुआ करता है मानव मन, &lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिखे भावना जब कोई पावन ... &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जननी और अवनि दोनों, जीवनदाता हैं , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसीलिये दिल का इनसे , गहरा नाता है , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इनसे मिलता दिल को स्पन्दन,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुदित हुआ करता है मानव मन ... &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इनसे जब जब उपजें नव जीवन ... &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;चिराग के दो रूप&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;घर के चिराग से ही रोशन हुआ है घर ये,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुस्कान से भरे अब लगते मेरे अधर ये , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;आने से उसके घर में गौरव बढ़ा हमारा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रखकर चलें शहर में ऊंचा अब अपना सर ये ,&lt;br /&gt;उसने दिलाईं खुिशयां हमको जहां की सारी,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पा ली हैं सारी खुिशयां हमने इसी उमर में ,&lt;br /&gt;मन हो रहा प्रफुिल्लत पाकर के साथ उसका ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;खुिशयों से हो रहा है पुलकित हमारा स्वर ये,&lt;br /&gt;थे ख्वाब जो हमारे पूरे हुये सभी अब ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;स्ंातुिष्ट पा गये हम जीवन के इस पहर में ,&lt;br /&gt;लोगों ने दी बधाई पाया जो कुल का दीपक,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुक्ति मिलेगी हमको जीवन मरण के डर से ,&lt;br /&gt;घर के चिराग से ही लगी आग अपने घर में ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बदनाम लग रहे हम अब अपने ही शहर में ,&lt;br /&gt;फूलो सा जिसको पाला जीवन में कष्ट सहकर,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कांटे बिखेर डाले उसने हर इक डगर में ,&lt;br /&gt;सोचा था साथ देगा जीवन के सांझ तक जो ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;छोड़ा उसी ने हमको मंझधार में भंवर में ,&lt;br /&gt;पाईं थी जिन्दगी में उपलब्धि जिस जमीं पर ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह ही लगी है चुभने मुझको मेरी नज़र में , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सोना खरा ना खुद का तो दोष हम किसे दें,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;माना खरा था जिसको खोटा है हर नज़र में ,&lt;br /&gt;है वक्त से ही आशा उपचार वह करेगा ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आशा से ही रखा है अब पग नये सफर में, &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भारतीय सैनिक &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वन्दे मातरम् ,वन्दे मातरम् ... &lt;/p&gt;&lt;p&gt;बाधायें कैसी भी हो पर रूकते जिसके नहीं कदम , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;होठों पर बस एक गीत रहता है वन्दे मातरम् , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;देशभक्ति की जो पहली पहचान , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो है हिन्दुस्तानी सेना का जवान ...&lt;br /&gt;आंधी हो ,तूफान हो , फंसी किसी की जान हो , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सागर की गहराई हो , या फिर गहरी खाई हो , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;रूका नहीं करता जिसका अभियान , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो है हिन्दुस्तानी सेना का जवान ... &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सीमा उच्च हिमालय की हो ,या फिर राजस्थान की , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सदा रहे रक्षा में रत जो भारत के सम्मान की , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;रखे तिरंगे की ऊंची जो शान , वो है हिन्दुस्तानी सेना का जवान ... &lt;/p&gt;&lt;p&gt;होता कहीं विवाद हो , दंगा और फसाद हो , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;तन्मयता से रक्षा करता , कैसा भी उन्माद हो , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;हिन्दू ,सिख हो या वह मुसलमान , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो है हिन्दुस्तानी सेना का जवान ... &lt;/p&gt;&lt;p&gt;गमीZ हो या सदीZ हो , या मौसम बेददीZ हो , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;कर्तव्यों से नहीं डिगे वह, जब तक तन पर वदीZ हो , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;चाहे उसकी निकल ही जाये जान , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो है हिन्दुस्तानी सेना का जवान ... &lt;/p&gt;&lt;p&gt;वन्दे मातरम् , वन्दे मातरम् ...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आशीष&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;गणपति से आशीष ले करो नई शुरूआत , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;खुिशयों से भरपूर हों अब सारे दिन रात ,&lt;br /&gt;प्रीति बनी राजीव के जीवन की हमराह , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मिले सदा आशीष बड़ों का रखकर दिल में चाह ,&lt;br /&gt;प्रीति और राजीव रहें खुिशयों से आबाद , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;देते हैं हम आज यह इनको आशीर्वाद ,&lt;br /&gt;जीवन भर मुस्कान का पावें दोनो साथ , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जीवन के हर दौर में कभी ना छूूटे हाथ ,&lt;br /&gt;खुिशयां जीवन भर मिलें और प्यार भरपूर , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मिलकर दोनों ही करें सब बाधायें दूर ,&lt;br /&gt;आशा और प्रताप पुत्र को है ऐसा आशीष , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;खुिशयों की इन पर हुआ नित्य करे बारिश ,&lt;br /&gt;चाहत ना कम हो कभी ,इच्छायें हो पूरी , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;नवदम्पति के बीच में कभी ना आये दूरी ,&lt;br /&gt;जीवन भर बढ़ता रहे इन दोनों में प्यार , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;दें यह आशीर्वाद सरस्वती और राजेश सोनार ,&lt;br /&gt;आशीर्वाद ईश्वर के आशीष से आज घड़ी यह आई है , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;िशल्पराज और नेहा खातिर गूंज रही शहनाई है ,&lt;br /&gt;गणपति के आशीष से हुई नई शुरूआत , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;खुिशयों से भरपूर हों अब सारे दिन रात ,&lt;br /&gt;िशल्पराज की बन गई अब नेहा हमराह , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मिले सदा आशीष बड़ों का है दिल मे यह चाह,&lt;br /&gt;जीवन भर मुस्कान का पावें दोनो साथ , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जीवन के हर दौर में कभी ना छूूटे हाथ ,&lt;br /&gt;खुिशयां जीवन भर मिलें और प्यार भरपूर , मिलकर&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;दोनों ही करें सब बाधायें दूर , चाहत ना कम हो कभी ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इच्छायें हो पूरी , नवदम्पति के बीच में कभी ना आये दूरी ,&lt;br /&gt;जीवन भर बढ़ता रहे इन दोनों में प्यार ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दें यह आशीर्वाद सरस्वती और राजेश सोनार ।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;गम और खुशी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;खुिशयां या गम मिलती है अपने जीवन में सबको ज्यादा या कम । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;कोई खुशी को रखता संजो कर कोई जरा पाके इतराता है &lt;/p&gt;&lt;p&gt;खुिशयां सदा ही रहती नहीं है जाने वो पर भूल जाता है । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;रखा संजोकर जिसने खुशी को हों उसके नैना खुिशयों से नम ...&lt;br /&gt;आये जो गम तो रोती हैं ऑखें &lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिल में निराशा सी जगने लगे कितने दिनो तक छाया हुआ &lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब गम का अंधेरा ये कैसे टले &lt;/p&gt;&lt;p&gt;गम से है मिलती जीवन की िशक्षा गम से ही टूटा करें सब भरम ...&lt;br /&gt;गम है अंधेरा खुिशयां उजाला एक के बाद एक आया करें &lt;/p&gt;&lt;p&gt;गम के बिना हैं खुिशयां अधूरी पाठ यही सब पढ़ाया करें &lt;/p&gt;&lt;p&gt;गम पाकर हंसता जो भी रहेगा उसका ही जीवन बनता कुदन ... &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;विश्वास&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;संचित पूंजी जो रखा हमने अपने पास ।उससे भी है कीमती अपनो का विश्वास । पूंजी लुट भी जाये तो दुख थोड़ा सा होये ।पर टूटे विश्वास तो दिल फिर हर पल रोये ।&lt;br /&gt;पत्थर पर विश्वास किया तो वह बनता भगवान है ।खुदा प्रभु भगवान वाहेगुरू सब विश्वास के नाम हैं ।बिन विश्वास के सूरज के यह जीवन रहे अंधेरे में ।और बिना विश्वास के उसका होता सत्यानाश है ।&lt;br /&gt;राम नाम की महिमा पर जब तुलसी ने विश्वास किया ।रामचरितमानस रच मर्यादा को नव आकाश दिया ।अगर करो विश्वास तो दिखता कण कण में भगवान है ।और यही विश्वास बनाता पत्थर को हनुमान है ।&lt;br /&gt;सारे जहां की दौलत चाहे रख लो अपने पास तुम ।चाहे दुनिया में कहलाते हो कितने भी खास तुम ।मगर अकेले में खुद को कंगाल समझते ही होगे ।अगर खो दिया तुमने अपने लोगों का विश्वास है ं।&lt;br /&gt;है यह विनती आपसे खोना ना विश्वास ।पूंजी जीवन भर यही रखना अपने पास ।इस पूंजी से ही मिला करता सच्चा स्नेह ।आनंदित मन हो सदा औश्र स्वस्थ हो देह ।पढ़ाई&lt;br /&gt;करें पढ़ाईचलो हम करें पढ़ाई ।हिन्दू रामचरितमानस पढ़ते हैं मुस्लिम पढं़े कुरान गुरूग्रंथ का पाठ करे सिखबाइबिल पढ़े ईसाई ,करें पढ़ाईचलो हम करें पढ़ाई ।पुस्तक से संपर्क रखेंगे शब्दज्ञान हम पायेंगे ज्ञानकोष पाने पर ही तो हम विद्वान कहायेंगे ।रहें निरक्षर तो फिर जग में होगी सदा हंसाई ,करें पढ़ाई चलो हम करें पढ़ाई।आदत अगर रखें पढ़ने की नित्य नया कुछ पायेंगेअपने जीवन के रस्ते में उसका लाभ उठायेंगेपुस्तक के सत्संग से पायेंगे हम सदा बड़ाई करे पढ़ाई चलो हम करें पढ़ाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजेश कुमार सोनार&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;कोषाध्यक्ष , अक्षर साहित्य परिषद् , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;वरिष्ठ सहायक, भारतीय स्टेेट बैंक, &lt;/p&gt;&lt;p&gt;चाम्पा, जिला जांजगीर-चाम्पा (छ.ग.) ( 07819) 245759(निवास)&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-504526418533814738?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/504526418533814738/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=504526418533814738' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/504526418533814738'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/504526418533814738'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html' title='राजेश कुमार सोनार के बिखरे मोती'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp0.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R7ri5aRvcAI/AAAAAAAAAGw/j9SjppFQ93w/s72-c/sonar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-5601387823028038355</id><published>2008-02-18T06:31:00.000-08:00</published><updated>2008-02-18T06:44:42.581-08:00</updated><title type='text'>अपंगता जीवन में बाधक नहीं होता : इंद्राणी केशरवानी</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R7mZd6Rvb9I/AAAAAAAAAGY/PPAQU2HnQDw/s1600-h/mai+mela+ka+aayojan.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5168330786523279314" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R7mZd6Rvb9I/AAAAAAAAAGY/PPAQU2HnQDw/s200/mai+mela+ka+aayojan.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R7mZeKRvb-I/AAAAAAAAAGg/V1hJ1E4f5b0/s1600-h/indrani+ko+samajik+puruskar.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5168330790818246626" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R7mZeKRvb-I/AAAAAAAAAGg/V1hJ1E4f5b0/s200/indrani+ko+samajik+puruskar.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R7mZfaRvb_I/AAAAAAAAAGo/gIIRatJo_8o/s1600-h/indrani.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5168330812293083122" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R7mZfaRvb_I/AAAAAAAAAGo/gIIRatJo_8o/s200/indrani.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;अपंगता जीवन में बाधक नहीं होता : इंद्राणी केशरवानी &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;मुंगेली के प्रतििष्ठत मालगुजार भवानी साव दानी के परिवार का वहां दबदबा आज भी बरकरार है। जब वे मालगुजार थे तब की बातें हम क्या जाने, लेकिन आज हमें जो किंवदंति के रूप में सुनने को मिलती है उसे ही जानते हैं। भवानी के तीन पुत्र क्रमश: रामलाल साव, िशवदयाल साव और अिम्बका साव हुए। रामलाल साव का कोई बच्चा नहीं था इसलिए वे अपनी सम्पत्ति को `रामलाल-भवानी साव धर्मादा ट्रस्ट` बनाकर सामाजिक सेवा में समर्पित कर दिया। लेकिन िशवदयाल साव के तीन पुत्र क्रमश: ओंकारप्रसाद, श्रीराम और अनुजराम हुए जबकि अिम्बका साव के दो पुत्र निरंजन प्रसाद और निर्मल प्रसाद हुए। सभी राजसी ठाठ से जीवन व्यतीत कर रहे थे। सबके अपने शौक थे। कोई संगीत और नृत्य को अपने जीवन का अंग बनाया तो कोई राजा-महाराजा के साथ दोस्ती करके गौरवािन्वत होता रहा, तो कोई मालगुजारी का काम देखने में मगन था। 1947 में देश आजाद हुआ और 1952 में देश और प्रदेश में प्रथम आम चुनाव हुए। राजा, जमींदार और मालगुजारों ने रामराज्य परिषद बनाकर चुनाव लड़े और उन्हें सफलता भी मिली। श्री अिम्बका साव भी रामराज्य परिषद से चुनाव लड़कर विधायक बने। तब छत्तीसगढ़ मध्य भारत के अंतर्गत आता था और नागपुर उसकी राजधानी थी। अिम्बका साव का राजधानी नागपुर अक्सर जाना होता था। संयोग से वहां उनकी सुपुत्री निराशा का परिवार था। उन्होंने अपने दोनों पुत्रों निरंजन और निर्मल को वहां पढ़ने के लिए भेजा। इस प्रकार उनका आधा परिवार नागपुर में रहने लगा। निरंजन प्रसाद तो वहां के मारिश कालेज से लॉ की डिग्री प्राप्त किया। अध्ययन के दौरान एक एक्सीडेंट में उनका एक पैर काटना पड़ा। लेकिन उनका आत्म विश्वास उन्हें राजनीति के िशखर तक ले गया। वे दो बार विधायक, एक बार सांसद, नगरपालिका अध्यक्ष, जिला सहकारी बैंक के संचालक और पार्टी के जिलाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों में रहे। वे छत्तीसगढ़ में `अलख निरंजन` के रूप में जन सेवा को अंजाम दिये। राजनीति की िशक्षा उन्हें अपने पिता के चुनाव संचालन से मिली थी। लेकिन निर्मलप्रसाद की सैद्धांतिक पढ़ाई में कम रूचि थी और वे तकनीकी बारीकियों को बड़ी गंभीरता से समझने का प्रयास करते थे। पिता और भाई की राजनीति में रहने से चौपट हो रहे अपने पैत्रिक व्यवसाय को सम्हालने के लिए पढ़ाई को अधूरा छोड़कर मुंगेली लौट आये। यहां उन्होंने एक मोटर गेरेज खोला लेकिन ज्यादा दिन इसमें उनका मन नहीं लगा और इलेिक्ट्रशयन का काम सम्हालने लगे। इसमें भी उनका मन नहीं लगा और वे मजगांव की खेती देखने लगे। उनका विवाह भी जल्द कर दिया गया। शहर की भागम भाग से दूर वे गांव की प्राकृतिक सौंदर्य में जैसे रम से गये थे। एक एक करके विमल, कला, प्रदीप, कल्याणी, इंद्राणी और राजेश का आगमन सहज ही हुआ। इंद्राणी जब छ: माह की थी तब इस क्षेत्र में हैजा का प्रकोप हुआ। मजगांव भी उसके प्रकोप से नहीं बच सका। सम्हलते सम्हलते भी इंद्राणी को उल्टी-दस्त होने लगा। छोटी सी बच्ची और उपर से उल्टी-दस्त, गांव में इलाज तो संभव नहीं था, बाबु जी की दवा भी असर नहीं किया। मां तो एकदम परेशान हो गयी। उस समय 10-12 कि. मी. दूर मुगेली तक आने जाने का कोई साधन जल्दी नहीं मिलता था। एक बैल गाड़ी में मां इंद्राणी को लेकर मुुंगेली आ गयी। तत्काल डॉक्टर को दिखाया गया। परीक्षण के बाद डॉक्टर ने इंजेक्शन लगा दिया और खाने को दवाई भी दे दिया। हप्ते दिन बाद इंद्राणी ठीक हो गयी। जब वह चलने योग्य हुई तब उसे चलने में कठिनाई होने लगी। उम्र बढ़ने के साथ जब वह नहीं चल सकी तो उसकी पुन: डॉक्टरी परीक्षण हुआ। दिल्ली, बंबई और नागपुर सभी जगह परीक्षण के बाद पता चला कि बचपन में उल्टी दस्त रोकने के लिए जो इंजेक्शन लगाई गई थी वह एक्सपाइरी डेट की थी जिसके कारण उन्हें पोलियो हो गया। लड़की और उपर से चलने के अयोग्यण्ण्ण् मालगुजार परिवार को बड़ा अघात लगा। पर्याप्त इलाज कराया गया, उसके पैर का कई बार आपरेशन किया गया लेकिन सब बेकार। उम्र बढ़ने लगा और परेशानियां बढ़ने लगी। डॉक्टरों का आश्वासन अब मन को ज्यादा दिन धीरज नहीं दे सका और इसे ईश्वर की मजीZ समझकर सभी आत्मसात करने लगे। उनसे सभी स्नेह करने लगे, उन्हें कभी किसी बात की कमी न हो, इसका सभी ख्याल रखते थे। एक वाकिये का जिक्र करते हुए इंद्राणी बताने लगी कि एक बार दूसरे बच्चों को अच्छी सेंडिल पहनते देखकर उन्हें भी लगने लगा कि वह भी ऐसे ही सेंडिल पहनेगी। फिर एक बार दूसरे की साइकिल में चलाने के लिए बैठने पर गिर गयी और रोने लगी तब उनके बाबु जी उनके लिए तत्काल एक नई साइकिल खरीदी। बचपन से ही उनके मन में सभी काम करने की ललक थी, इसके लिए उनमें आत्म विश्वास की कमी नहीं थी। धीरे धीरे इंद्राणी स्कूल जाने लगी। पढ़ने में वह होिशयार थी, क्लास में हमेशा अव्वल आती थी। जब वह स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली और कालेज की पढ़ाई के लिए बिलासपुर में दाखिला ली तो शुरू शुरू में उन्हेंं घर की बहुत याद आती थी। कमरे में बैठकर खूब रोती थी। धीरे धीरे सब ठीक हो गया और वह ग्रेजुएट हो गयी। फिर अपने कल्याणी दीदी के पास रायगढ़ एम.एस-सी. करने आ गयी। यहां से एम.एस-सी करके रविशंकर विश्व विद्यालय रायपुर से एम. फिल की परीक्षा उत्तीर्ण की। इस प्रकार जीवन के अनमोल क्षण उन्होंने पढ़ाई करते गुजार दी। अपने भाई के साथ रहते हुए उन्होंने समाजशास्त्र में एम. ए. की। अ. जा. हायर सेकंडरी स्कूल नारायणपुर, जशपुर में उनकी व्याख्याता के पद पर नियुक्ति हो गयी। वह अकेली जाने को तैयारी थी लेकिन परिवार के लोग दूर वनांचल में उन्हें अकेली नौकरी करने के लिए भेजने के पक्ष में नहीं थे। बाद में उनका स्थानान्तरण कोरबा के पास कराने के लिए प्रयास किया गया फलस्वरूप उनका स्थानान्तरण रामपुर हो गया। लेकिन यहां भी वही समस्या थी। कुल मिलाकर उन्हें इस नौकरी से वंचित होना पड़ा। उन्हें थोड़ी निराशा अवश्य हुई मगर उन्होंने हार नहीं मानी। फिर वह क्षण भी आया जब उन्हें शासकीय कन्या हायर सेकंडरी स्कूल मुंगेली में उच्च श्रेणी िशक्षिका के रूप में पदस्थापना मिली। वह तत्काल वहां कार्यभार ग्रहण की और विवाहोपरांत कोरबा आ गयी। ईश्वर की लीला देखिये कि उनकी शादी में भी भरी बरसात रूकावट बनी और बारात दूसरे दिन पहुंची। बहरहाल, विवाहोपरांत उनका दाम्पत्य जीवन कोरबा में अच्छे से चलने लगा। उन्होंने कम्प्यूटर की ट्रेनिंग ली। इस प्रकार अच्छी से अच्छी िशक्षा प्राप्त कर उन्होंने अपना दाम्पत्य जीवन की शुरूवात की। अपने जीजा के संपर्क में रहकर उन्होंने लेखन की शुरूवात की। उनके सामाजिक, पारिवारिक लेख आये दिन पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे। एक नन्ही सी गुिड़या के आगमन से उसकी जिंदगी जैसे बदल सी गयी। उनका नाम समृिद्ध रखा गया। नाम के अनुरूप समृिद्ध के आगमन से उनके छोटे से परिवार में सुख और समृिद्ध आ गयी। फिर वह सामाजिक संस्थाओं से जुड़ने लगी और सर्वप्रथम उन्हें छत्तीसगढ़ केशरवानी वैश्य सभा में महिला प्रतिनिधि के रूप में प्रदेश उपाध्यक्ष मनोनित किया गया। उन्होंने कोरबा नगर केशरवानी वैश्य सभा और महिला सभा के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निबाही और तब से वह नगर केशरवानी वैश्य महिला सभा की अध्यक्ष हैं। वह प्रदेश केशरवानी वैश्य महिला सभा की महामंत्री की जिम्मेदारी सम्हालने के बाद वर्तमान में समाज की राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष हैं। यही नहीं बल्कि वह नारी संचेतना समिति कोरबा की सचिव पद पर कार्य करते हुए आज पुलिस विभाग के साथ मिलकर बालिकाओं को आत्म सुरक्षा के लिए माशZल आट्Zस का प्रिशक्षण का आयोजन करवाकर प्रशंसा का पात्र बन चुकी हैं। इसी प्रकार स्वास्थ्य िशविर और छात्र-अभिभावकों में मोबाइल तथा गािड़यों के दुरूपयोग आदि पर जन जागृति अभियान चलाकर लोगों से प्रशस्ति प्राप्त कर चुकी है। आज वह लायंस क्लब कोरबा एवरेस्ट की सचिव रहकर सेवाकार्य कर रही हैं। उनका मानना है कि शारीरिक अपंगता जीवन की सफलता में कभी बाधक नहीं होता बशतेZ मन में विश्वास और कार्य करने की लगन हो। जीवन के इस पड़ाव में मुझे मेरे माता-पिता, भाई-भाभी और दीदी-जीजा के साथ मेरे पति का साथ मिला। मैं सोचती हूं कि जीवन तो ईश्वर की देन है, माता-पिता जननी हैं लेकिन उसे सफलता पूर्वक जीने के लिए आत्म विश्वास, ध्ौर्य और लगन बहुत जरूरी है। यही कारण है कि आज मैं पैदल भी चलती हूं, हल्की गाड़ी (स्कूटी) भी चलाती हूं और ईश्वर ने साथ दिया तो कार भी चलाऊंगी। उनकी इस कामना के लिए हमारी हािर्दक शुभकामनाएं, ईश्वर उनकी कामना पूरी करे।&lt;br /&gt;जीवन परिचय :-&lt;br /&gt;नाम : श्रीमती इन्द्राणी केशरवानी&lt;br /&gt;1. माता-पिता : श्रीमती शुकवारा-निर्मल केशरवानी&lt;br /&gt;2. पति : अश्वनी कुमार केशरवानी&lt;br /&gt;3. िशक्षा : एम. एस-सी. (प्राणीशास्त्र), एम. फिल. एम. ए. (समाजशास्त्र), बी. एड.&lt;br /&gt;4. जन्म : 02. 10. 1965 (दो अक्टूबर उन्नीस सौ पैंसठ), मुंगेली के प्रतििष्ठत मालगुजार स्वण् अिम्बका साव की पौत्री एवं स्वण् निरंजन केशरवानी की भतीजी)&lt;br /&gt;5. पद : 0 प्रभारी प्राचार्य, शासकीय आदिमजाति हाई स्कूल गोपालपुर, कोरबा (छत्तीसगढ़) 0 सचिव, नारी संचेतना समिति कोरबा 0 सचिव, लायंस क्लब कोरबा एवरेस्ट 0 राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष, अखिल भारतीय केशरवानी वैश्य महिला महासभा 0 अध्यक्ष, केशरवानी वैश्य महिला सभा कोरबा&lt;br /&gt;6. पूर्व धारित पद : 0 उपाध्यक्ष, लायंस क्लब कोरबा एवरेस्ट 0 उपाध्यक्ष, छत्तीसगढ़ प्रदेश केशरवानी वैश्य सभा 0 महामंत्री, छत्तीसगढ़ प्रदेश केशरवानी वैश्य महिला सभा&lt;br /&gt;7. अभिरूचि : पत्र-पत्रिकाओं में समाजिक एवं पारिवारिक लेख, कहानी एवं कविता प्रकािशत।&lt;br /&gt;8. आयोजन : 0 युवतियों में आत्म रक्षा के लिए ``पुलिस-छात्र संचेतना कार्यक्रम`` के अंतर्गत का लड़कियों को मार्सल आट्Zस का प्रिशक्षण का आयोजन। 0 छात्र-छात्राओं के द्वारा मोबाइल एवं गाड़ी का दुरूपयोग न करने के लिए जागृति कार्यक्रम।&lt;br /&gt;9. पुरस्कार/सम्मान विभिन्न सामाजिक एवं स्वैच्छिक संस्थाओं से सम्मानित और पुरस्कृत।&lt;br /&gt;10. संदेश : शारीरिक अपंगता जीवन में किसी प्रकार बाधक नहीं होता बशतेZ आत्म विश्वास हो। 11. संपर्क : पायल इंटरप्राइजेज, विकास काम्पलेक्स के पास, पावर हाउस रोड कोरबा (छ.्ग.) फोन नं. 07759-222686, 223686&lt;br /&gt;रचना, लेखन, फोटो एवं प्रस्तुति,&lt;br /&gt;प्रो. अिश्वनी केशरवानी&lt;br /&gt;राघव, डागा कालोनीचांपा-495671 (छत्तीसगढ़)&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1818952243348394177-5601387823028038355?l=ashvinik.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ashvinik.blogspot.com/feeds/5601387823028038355/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1818952243348394177&amp;postID=5601387823028038355' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/5601387823028038355'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1818952243348394177/posts/default/5601387823028038355'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ashvinik.blogspot.com/2008/02/blog-post.html' title='अपंगता जीवन में बाधक नहीं होता : इंद्राणी केशरवानी'/><author><name>अश्विनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10226892055070250744</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R7mZd6Rvb9I/AAAAAAAAAGY/PPAQU2HnQDw/s72-c/mai+mela+ka+aayojan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1818952243348394177.post-8715223137769507053</id><published>2008-01-26T00:29:00.001-08:00</published><updated>2008-01-27T04:59:37.727-08:00</updated><title type='text'>लखनेश्वर दर्शन करि कंचन होत शरीर ...</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R5x_2kdRaII/AAAAAAAAAFg/HmxchmbT7Vs/s1600-h/Kharod+visit.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5160139848535861378" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R5x_2kdRaII/AAAAAAAAAFg/HmxchmbT7Vs/s200/Kharod+visit.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_a3axkWLu5LM/R5x_20dRaJI/AAAAAAAAAFo/R6eGzDd9pBY/s1600-h/Lakshmaneshwer+Temple+Front.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5160139852830828690" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" 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होत शरीर ...&lt;br /&gt;प्रो. अिश्वनी केशरवानी &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;खरौद, महानदी के किनारे बिलासपुर से 64 कि. मी., जांजगीर-चांपा जिला मुख्यालय से 55 कि. मी., कोरबा से 105 कि. मी., राजधानी रायपुर से बलौदाबाजार होकर 120 कि. मी. और रायगढ़ से सारंगढ़ होकर 108 कि. मी. और शिवरीनारायण से मात्र 02 कि. मी. की दूरी पर बसा एक नगर है। शैव परम्परा यहां स्थित लक्ष्मणेश्वर महादेव और शैव मठ से स्पष्ट परिलक्षित होता है। जबकि शिवरीनारायण वैष्णव मठ, नारायण मंदिर और चतुभुZजी मूर्तियों के कारण वैष्णव परम्परा का द्योतक है। संभवत: इसी कारण खरौद और शिवरीनारायण को क्रमश: शिवाकांक्षी और विष्णुकांक्षी कहा जाता है और इसकी तुलना भुवनेश्वर के लिंगराज और पुरी के जगन्नाथ मंदिर से की जाती है। प्राचीन काल में ज्रगन्नाथ पुरी जाने का रास्ता खरौद और शिवरीनारायण से होकर जाता था। भगवान जगन्नाथ को शिवरीनारायण से ही पुरी ले जाने की बात कही जाती है। इसी प्रकार यहां सतयुग और त्रेतायुग में मतंग ऋषि के गुरूकुल आश्रम होने की जानकारी मिलती है। शबरी यहां रहकर निर्वासित जीवन व्यतीत की और उनके जूठे बेर भगवान श्रीराम और लक्ष्मण यहीं खाये थे ... उनका उद्धार करके उनकी मंशानुरूप शबरीनारायण नगर बसाकर उनकी स्मृति को चिरस्थायी बना गए थे।&lt;br /&gt;ऐसे पतित पावन नगर में पिकनिक जाने का पिछले दिनों प्रोग्राम बना। कॉलेज के छात्र-छात्राओं का विशेष आग्रह था कि मैं उनके साथ अवश्य चलूं। वे सब मेरे लेखकीय दृष्टि का लाभ उठाना चाहते थे। मैं भी खुश था, पिकनिक का पिकनिक और तीर्थयात्रा, यानी एक पंथ दो काज ..। खरौद, चांपा से 65 कि. मी. की दूरी पर स्थित है। हमने वहां बस से जाने का निर्णय किया। सबका मन बड़ा प्रसन्न था। निर्धारित तिथि में हम खरौद के लिए रवाना हुए। रास्ता बहुत खराब होने के कारण हमारी बस हिचकोले खाती हुई धीरे धीरे चल रही थी .. दूर से सेंचुरी सीमेंट और रेमंड सीमेंट (अब लाफार्ज सीमेंट) फैक्टरी से धुआं उगलती चिमनियां दिखाई दे रही थी। मैंने विद्यार्थियों को बताया कि राजगांगपुर (उड़ीसा) से राजनांदगांव तक चूने की खान हैं और सीमेंट उद्योग के लिए उपयुक्त हैं। अब तक कई सीमेंट फैक्टरियां लग चुकी हैं और आगे भी लगने की संभावनाएं हैं। फिर भी सीेमेंट यहां मंहगी मिलती है। चिमनियों के धुओं से वायुमंडल प्रदूषित होता है और धुंआ जब नीचे आकर पेड़ों की पित्तयों और खेतों में गिरकर परत जमा लेती हैं तो पेड़-पौधे मर जाते हैं और खेत बंजर हो जाती है। इसकी किसे चिंता है ? औद्यौगिक क्रांति आयेगी तो अपने साथ कुछ बुराईयां तो लायेंगी ही। खैर, थोड़ी देरी में हम पामगढ़ पहुंचे। सड़क से ही लगा गढ़ के अवशेष दिखाई देता है-तीन तरफ खाई और उसमें पानी भरा था। विद्यार्थियों की उत्सुकता गढ़ देखकर ही शांत हुई। रास्ते में मेंहदी के सिद्ध बीर बजरंगबली के दर्शन किये। रास्ते में ही राहौद और धरदेई के तालाबनुमा प्राचीन खाईयों को देखते हुए खरौद के मुहाने पर पहुंचे। दूर से महानदी का चौड़ा पाट देखकर विद्यार्थी खुशी से चिल्ला उठे- सर, देखिये नदी। मैंने उन्हें बताया कि हम खरौद की सीमा में प्रवेश कर रहे हैं। देखो, इस नदी में शिवनाथ और जोंक नदी आकर मिलती हैं और त्रिधारा संगम बनाती है। विद्यार्थी बड़े प्रसन्न थे तभी हमारी बस सड़क किनारे स्थित जल संसाधन विभाग के निरीक्षण गृह में झटके के साथ रूकी। सभी वहां हाथ-मुंह धोकर नास्ता किये और मंदिर दर्शन करने निकल पड़े। एक-डेढ़ किण् मीण् की दूरी पर अत्यंत प्राचीन शबरी मंदिर है। ईंट से बना पूर्वाभिमुख इस मंदिर को ``सौराइन दाई`` का मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर के गर्भगृह में श्रीराम और लक्ष्मण धनुष बाण लिये विराजमान हैं। पुजारी ने बताया कि श्रीराम और लक्ष्मण जी शबरी के जूठे बेर यहीे खाये थे। द्वार पर एक अर्द्धनारीश्वर की टूटी मूर्ति रखी है। मूर्ति के चेहरे पर सिंदूर मल दिया गया है जिससे अर्द्धनारीश्वर का स्वरूप स्पष्ट दिखाई नहीं देता। लोग श्रद्धावश किसी भी मूर्ति में जल चढ़ाने लगते हैं जिससे उसका क्षरण होने लगता है। इस मूर्ति की भी यही स्थिति है। मंदिर से लगा मिट्टी से बना एक गढ़ है जिसमें दशहरा के दिन प्रदर्शन होता है, जिसे गढ़ भेदन कहा जाता है। पुरातत्व विभाग द्वारा पूरा मंदिर परिसर को घेर दिया गया है। पास में ही हरिशंकर तालाब और उसमें बैरागियों की समाधि है।&lt;br /&gt;स्कंद पुराण के उत्कल खंड में वर्णन मिलता है कि पुरी में वहां के राजा ने एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया तब उसमें मूर्ति स्थापना की समस्या आयी। देव संयोग से आकाशवाणी हुई कि दक्षिण पश्चिम दिशा में चित्रोत्पला-गंगा के तट पर सिंदूरगिरि में रोहिणी कुंड के निकट स्थित मूर्ति को लाकर यहां स्थापना करो। उस काल में खरौद क्षेत्र में शबरों का अधिपत्य था। जरा नाम के शबर का उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है। शबरी इसी कुल की थी जिसके जूठे बेर श्रीराम और लक्ष्मण ने खाये थे। द्वापर युग के उत्तरार्द्ध में श्रीकृष्ण की मृत्यु जरा नाम के शबर के तीर से हो जाती है। तब उनके अधजले मृत शरीर को इसी क्षेत्र में लाकर रोहिणी कुंड के किनारे रखकर नित्य उसकी पूजा अर्चना करने लगा। आगे चलकर उन्हें अनेक प्रकार की सििद्धयां प्राप्त हुई। प्राचीन काल में इस क्षेत्र में तांत्रिकों के प्रभाव का पता चलता है और ऐसा प्रतीत होता है कि जरा भी तंत्र मंत्र की सििद्ध इस मूर्ति के सामने बैठकर करता था। स्कंद पुराण के अनुसार पुरी के राजपुरोहित विद्यापति ने छल से इस मूर्ति को पुरी ले जाकर उस मंदिर में स्थापित करा दिया था। लेकिन डॉ. जे. पी. सिंहदेव ने ``कल्ट ऑफ जगन्नाथ`` में लिखा है कि `सिंदूरगिरि से मूर्ति को पुरी ले जानेवाले विद्यापति नहीं थे बल्कि उसे ले जाने वाले प्रसिद्ध तांत्रिक इंद्रभूति थे। उन्होंने इस मूर्ति को ले जाकर संबलपुर की पहाड़ी में स्थित संभल गुफा में रखकर तंत्र मंत्र की सििद्ध करता था। यहां उन्होंने अनेक तांत्रिक पुस्तकों का लेखन किया। उन्होंने तिब्बत में लामा सम्प्रदाय की स्थापना भी की। प्राप्त जानकारी के अनुसार इंद्रभूति की तीन पीढ़ियों ने यहां तंत्र मंत्र की सििद्ध की और चौथी पीढ़ी के वंशजों ने उसे पुरी ले जाकर उस मंदिर में भगवान जगन्नाथ के रूप में स्थापित कर दिया। जगन्नाथ पुरी और खरौद-शिवरीनारायण क्षेत्र में तांत्रिकों के प्रभाव का उल्लेख मिलता है। शिवरीनारायण में तांत्रिकों के गुरू नगफड़ा और कनफड़ा की मूर्ति तथा नगर के बाहर कनफड़ा गुफा की उपस्थिति इस तथ्य की पुष्टि करता है। खरौद के दक्षिण द्वार पर स्थित `शबरी मंदिर` और सौंरापारा इसके प्रमाण माने जा सकते हैं। सौंरा जाति अपने को शबरों का वंशज मानती है। प्राचीन साहित्य में ``रोहिणी कुंड`` को एक धाम बताया गया है :-&lt;br /&gt;रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बंदरी से नारी भई, कंचन होत शरीर। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जो कोई नर जाइके, दरशन करे वही धाम &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बटु सिंह दरशन करी, पाये पद निर्वाण।। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;इस मंदिर को देखकर हमें बहुत अच्छा लगा। अब हम नगर के पश्चिम दिशा में स्थित लक्ष्मणेश्वर महादेव के मंदिर की ओर बढ़े। मंदिर भव्य और आकर्षक है। मंदिर के द्वार पर पुरातत्व विभाग का एक बोर्ड लगाा है जिसमें मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी में इंद्रबल के पुत्र ईशानदेव के द्वारा कराये जाने का उल्लेख है। यहां स्थित शिलालेख के अनुसार इस मंदिर का जीणोZद्धार रत्नपुर के कलचुरि राजा खड्गदेव ने कराया था। इस मंदिर में भगवान महावीर की मूर्ति देखने को मिली। मंदिर के प्रवेश द्वार के उभय पाश्र्व में कलाकृति से सुसज्जित दो पाषाण स्तंभ है। इनमें से एक स्तंभ में रावण द्वारा कैलासोत्तालन तथा अर्द्धनारीश्वर के दृश्य अंकित है। इसी प्रकार दूसरे स्तंभ में श्रीराम चरित्र से सम्बंधित दृश्य जैसे बाली वध, श्रीराम सुग्रीव मित्रता के अलावा शिव तांडव और सामान्य जन जीवन से सम्बंधित एक बालक के साथ स्त्री-पुरूष और एक दंडधारी पुरूष की मूर्ति है। उसके पाश्र्व में नारी प्रतिमा है। गर्भगृह में लक्ष्मण के द्वारा स्थापित ``लक्ष्मणेश्वर महादेव`` का पार्थिव लिंग है। इस अद्भूत लिंग के बारे में पता चलता है कि लंका विजय के उपरांत लक्ष्मण के उपर ब्रह्महत्या का पाप लगाया गया और इसकी मुक्ति के लिए उन्हें चारोंधाम की यात्रा करने और वहां के अभिमंत्रित जल से शिवलिंग की स्थापना करने की सलाह दी गयी। लक्ष्मण ने चारोंधाम की यात्रा की। जगन्नाथ पुरी से लौटकर उन्होंने गुप्तधाम शिवरीनारायण की यात्रा की। यहां चित्रोत्पला गंगा में स्नान कर आगे बढ़ते ही उन्हें क्षय रोग हो गया। आकाशवाणी हुई कि शिव आराधना से उन्हें क्षय रोग से मुक्ति मिल सकती है। उनकी आराधना से शिवजी प्रसन्न हुये और उन्हें दर्शन देकर पार्थिव लिंग स्थापित करने को कहा। तब उन्होंने यहां इस अद्भूत शिवलिंग की स्थापना की और क्षयरोग से मुक्ति पायी। इस शिवलिंग को ``लक्ष्मणेश्वर महादेव`` कहा गया। आज भी क्षयरोग निवारणाय लक्ष्मणेश्वर दर्शनम् प्रसिद्ध है। उनके दर्शन करके हमें लगा कि हमारा जीवन कृतार्थ हो गया। पुजारी ने हमें बताया कि यहां लखेसर (एक लाख साबूत चांवल) चढ़ाने का रिवाज है। इससे मनौतियां पूरी होती हैं।&lt;br /&gt;पवित्र मन लिए जब हम मंदिर से बाहर आये तब हमें प्राचीन गढ़ के अवशेष देखने को मिला जिसका अंतिम छोर माझापारा तक जाता है। यहां पर ईंट से बना अति प्राचीन पश्चिमाभिमुख इंदलदेव का मंदिर है। उत्कृष्ट मूर्तिकला से सुसज्जित इस मंदिर के गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है। मंदिर की दीवारों में पेड़ पौधे उग आये हैं। यह मंदिर केंद्रीय पुरातत्व संस्थान के संरक्षण में है लेकिन उचित देखरेख के अभाव में मंदिर जीर्ण शीर्ण हो गया है। दोपहर होने को आयी और हमारे पेट में चूहे दौड़ने लगे। सभी विद्यार्थी पुन: निरीक्षण गृह में आकर खाना खाये। लक्ष्मणेश्वर मंदिर से लौटते समय संस्कृति प्रचार केंद्र में विक्रम संवत् 2042, ज्येष्ठ शुक्ल 10 गंगा दशहरा के पावन पर्व के दिन शिव के आठ तत्वों के समिष्ट रूप ``अष्टमुख शिव`` और पांच मुख वाले अनुमान की प्रतिमा के दशZन हुए। भारत में मंदसौर के बाद खरौद में स्थापित अष्टमुख िशव की यह प्रतिमा अद्वितीय, अनुपम और दर्शनीय है। संस्कृति प्रचार केंद्र के संचालक डॉ. नन्हेप्रसाद द्विवेदी हैं। पूरे छत्तीसगढ़ में संस्कृत भाषा के प्रचार प्रसार में यह संस्था लगी है। डॉ. द्विवेदी के द्वारा लिखित ``खरौद परिचय`` में खरौद नामकरण के बारे में लक्ष्मणेश्वर मंदिर के शिलालेख के 30 वें लाइन में लिखा है। इसके अनुसार महाराजा खड्गदेव ने भूतभत्ताZ शिव के इस मंदिर का जीणोZद्धार कराया जो केवल मंडप मात्र था। यह घटना इस ग्राम के लिए ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। खड्गदेव शब्द में खड्ग का अपभ्रंश खरग तथा देव का अपभ्रंश ओद बना प्रतीत होता है। ``ग`` वर्ग के लोप हो जाने तथा `खर` और `ओद` के मिलने से ``खरौद`` शब्द की सििद्ध होती है। इस प्रकार खड्गदेव का बिगड़ा रूप खरौद हुआ ऐसा प्रतीत होता है।&lt;br /&gt;खरौद, छत्तीसगढ़ का एक गढ़ भी रहा है। इसे ``खरौदराज`` भी कहा जाता था। यहां के गढ़ाधीश के रूप में पंडित ज्वालाप्रसाद मिश्र का उल्लेख मिलता है जो कोटगढ़ के भी गढ़ाधीश थे। हमें बताया गया कि सन् 1835 में सोनाखान के जमींदार वीर नारायण सिंह ने उनके परिवार को समूल नष्ट करने का प्रयास किया था। मगर उस कुल के बीज को अपने गर्भ में लिए एक महिला किसी तरह बचकर कोटगढ़ आ गयी और मिसिर परिवार का वंश नष्ट होने से बच गया। आगे चलकर उनका परिवार कसडोल में निवास करने लगा।&lt;br /&gt;खरौद, कलचुरी कालीन गढ़ था। कलचुरी वंश के पतन के बाद मराठा वंश के शासक इसे ``परगना`` बना दिया। उस समय इस परगना में अकलतरा, खोखरा, नवागढ़, जांजगीर और किकिरदा के 459 गांव सिम्मलित था। ब्रिट्रिश काल में तहसील मुख्यालय सन् 1861 से 1891 तक शिवरीनारायण में था और फिर जांजगीर ले जाया गया। इसके बाद खरौद उपेक्षित होता चला गया। हमें लोगों ने बताया कि यहां के श्री परसराम भारद्वाज ने सारंगढ़ लोकसभा क्षेत्र का पांच बार प्रतिनिधित्व किया है। लेकिन हमारी उनसे भेंट नहीं हो सकी।&lt;br /&gt;संध्या होने को आयी और मेरा लेखक मन जैसे सबको समेट लेना चाहता था। मैंने सबको समझाया कि दो-ढाई किण्मीण् पर सुप्रसिद्ध सांस्कृतिक नगर शिवरीनारायण है, वहां वोटिंग का भी मजा लिया जाये उसके बाद वहां भगवान नारायण, श्रीराम लक्ष्मण जानकी, मां अन्नपूर्णा और चंद्रचूढ़ तथा महेश्वर महादेव के दर्शन भी कर लिया जाये। मेरी बात मानकर सभी शिवरीनारायण रवाना हो गये। वहां महानदी का मुहाना और बोटिंग का मजा लेकर सभी प्रसन्न मन से भगवानों के दर्शन किये और वापसी के लिए तैयार हो गये। मेरा लेखक मन भूतभत्ताZ भगवान लक्ष्मणेश्वर का आभारी रहेगा जिनके बुलावे पर खरौद जाने का संयोग बना और यहां के बारे में लिखने के लिए मुझे प्रेरित किया। मुझे पंडित मालिकराम भोगहा कृत ``श्री शबरीनारायण माहात्म्य`` पढ़ने को मिला जिसके पांचवें अध्याय के 95-96 श्लोक में लक्ष्मण जी श्रीरामचंद्रजी से कहते हैं :- हे नाथ ! मेरी एक इच्छा है उसे आप पूरी करें तो बड़ी कृपा होगी कि इहां रावध के वध हेतु ``लक्ष्मणेश्वर महादेव`` थापना आप अपने हाथ कर देते तो उत्तम होता :-&lt;br /&gt;रावण के वध हेतु करि चहे चलन रघुनाथ &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;वीर लखन बोले भई मैं चलिहौं तुव साथ।। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;वह रावण के मारन कारन किये प्रयोग यथाविधि हम। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सो अब इहां थापि लखनेश्वर करें जाइ वध दुष्ट अधम।।&lt;br /&gt;यह सुन श्रीरामचंद्रजी ने बड़े 2 मुनियों को बुलवाकर शबरीनारायण के ईशान कोण में वेद विहित संस्कार कर लक्ष्मणेश्वर महादेव की थापना की :-&lt;br /&gt;यह सुनि 
